
किसी भी चुनाव में यदि दो दल एक दूसरे के सामने उतरते है तो यह निश्चित है कि एक की हार होगी तभी दूसरे दल की जीत होगी। यह बात सर्वविदित है। यही सब कुछ हुआ हरियाणा विधानसभा चुनाव में। चुनाव में भाजपा व इंडिया गठबंधन के घटक दल कांग्रेस का सीधा मुकाबला था। इसमें भाजपा की जीत हुई और कांग्रेस की हार। अब किसे तो हारना ही था। पर कांग्रेस की इस हार के साथ ही गठबंधन में जो उसका बार्गिन पॉवर था वो कम पड़ता दिख रहा है। उत्तरप्रदेश में अब राहुल गांधी अपनी तेजी से उड़ती पतंग देख अपने सहयोगियों पर ही दबाव बनाने की कोशिश करने लगे थे। बताया जाता है कि असल में उत्तरप्रदेश में 10 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव होना है। इसके लिए कांग्रेस 50-50 सीट शेयरिंग फॉर्मूला चाहती है यानी 5-5 सीटों पर दोनों दल लड़ें लेकिन अखिलेश यादव कांग्रेस को 2 से ज्यादा सीटें देने को तैयार ही नहीं हैं। माना जा रहा है कि अखिलेश यादव, राहुल गांधी से हरियाणा और जम्मू कश्मीर का बदला लेने की तैयारी कर रहे हैं।
समाजवादी पार्टी अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहती है। इसी कोशिश में अखिलेश यादव ने हरियाणा और जम्मू कश्मीर में राहुल गांधी से सीट की मांग की थी। लेकिन राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी हरियाणा और जम्मू कश्मीर में एक भी सीट नहीं दी। जिसके बाद मजबूरी में अखिलेश यादव ने जम्मू कश्मीर में अपने दम पर उम्मीदवार उतारे। राहुल गांधी से मिला ये धोखा अखिलेश शायद ही भूले होंगे और हरियाणा में इस मार के बाद हो सकता है कि उत्तरप्रदेश के उपचुनाव में कांग्रेस को यही सबक सिखाना चाहते हैं। वहीं भाजपा अखिलेश और राहुल की कथित दोस्ती पर कटाक्ष कर रही है। वैसे कांग्रेस ने भी अखिलेश यादव पर दबाव बनाने की रणनीति भी तैयार कर ली है। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने उन सभी 10 सीटों पर प्रभारी और पर्यवेक्षकों की तैनाती कर दी है, जहां-जहां उपचुनाव होने वाले हैं।
कांग्रेस ने 10 सीटों के लिए प्रत्याशियों के आवेदन मंगाने भी शुरू कर दिए हैं। इसके जरिए कांग्रेस ने अखिलेश तक ये संदेश पहुंचाने की कोशिश की है कि वो 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, जिसमें कांग्रेस 6 पर जीती थी। इसके बाद कहीं न कहीं अखिलेश यादव के कारण ही यूपी में अस्तित्व खोने की कगार पर खड़ी कांग्रेस पार्टी को संजीवनी मिली थी। अब विधानसभा उपचुनाव में भी कांग्रेस, अखिलेश यादव से उसी दरियादिली की उम्मीद जता रही है। साथ ही साथ उन्हें अकेले उपचुनाव लड़ने का तेवर भी दिखने लगी है। अब लगता है उसके यह तेवर नरम पड़ जाएंगे।
इस चुनाव परिणाम के बाद इंडिया गठबंधन का अन्य राज्यों में यह सवाल दूसरे जोर पकड़ रहा है। इसका तुरंत असर महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के अलावा उपचुनाव पर भी दिख सकता है। इस परिणाम ने सहयोगी दलों के इस अपरोक्ष आरोप को सही साबित किया कि अब भी कांग्रेस को भाजपा से मुकाबले के लिए क्षेत्रीय दलों के सहयोग की जरूरत है। साथ ही जब भी कांग्रेस अकेले भाजपा के सामने आती है वह कमजोर साबित हो जाती है। हरियाणा में चुनाव कांग्रेस हार गईस जहां वहां अकेले दम मैदान में थी। जम्मू-कश्मीर में जब नेशनल कॉन्फ्रेंस ने गठबंधन को लीड किया तो गठबंधन को जीत मिली।
गौरतलब है कि 2014 से यह ट्रेंड लगातार जारी है, लेकिन 2023 दिसंबर में इस पर गंभीर बहस हुई थी। कांग्रेस ने अति आत्मविश्वास में मध्य प्रदेश में किसी भी सहयोगी दलों को न सिर्फ सीट देने से इनकार किया बल्कि पार्टी के सीएम उम्मीदवार कमलनाथ ने समाजवादी प्रमुख अखिलेश यादव के लिए उन्हें छोटा नेता बताते हुए टिप्पणी भी की थी। ऐसा तब हुआ था जब सभी विपक्षी दलों ने भाजपा से मुकाबले के लिए इंडिया गठबंधन बनाया गया था। उसी तरह छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने अपने ही सहयोगी दलों पर प्रतिकूल टिप्पणी की। नतीजा आया तब दोनों राज्य कांग्रेस हार गई। इसके बाद कांग्रेस ने अचानक डैमेज कंट्रोल करने की पहल भी की थी पर बाद में वाही ढ़ाक के तीन पात।
फिर आम चुनाव में जद्दोजहद के बाद अंतत: कांग्रेस गठबंधन करने में सफल रही। अगर आंकड़ों की बात की जाए तो आम चुनाव में भले कांग्रेस ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया लेकिन उसे उन्हीं राज्यों में अधिक सफलता मिली जहां उसके साथ दूसरे क्षेत्रीय दलों का मजबूत साथ था। मसलन, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी तो महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का साथ। परिणाम के तुरंत बाद जब हरियाणा चुनाव की बारी आई तो कांग्रेस अकेले लड़ी और आप या समाजवादी पार्टी को एक भी सीट नहीं दी। हालांकि, उनके साथ सीटों पर चर्चा हुई थी। इस पर क्षेत्रीय दल के एक सीनियर नेता ने कहा कि अगर कांग्रेस वास्तविकता को नहीं समझेगी तो पार्टी को हाल में मिली यह बढ़त गंवानी पड़ सकती है।
अधिकतर क्षेत्रीय दल अभी मानते हैं कि वे कितना भी एकजुट हो जाएं, अगर कांग्रेस ने अपनी स्थिति नहीं सुधारी तो इस लड़ाई का मतलब नहीं। इसके पीछे उनका तर्क है कि 2019 आम चुनाव में लगभग 225 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस-भाजपा का सीधा मुकाबला हुआ जिनमें 200 से अधिक सीटें भाजपा ने जीतीं। 2024 आम चुनाव में भी भाजपा ने अधिकतर सीटें कांग्रेस के साथ सीधे मुकाबले में जीतीं। विधानसभा चुनाव में भी हाल के वर्षों में बहुत कम ऐसे चुनाव हुए हैं जहां कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छीनी हो। ऐसा पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश में हुआ था, लेकिन हारी हुई राज्यों की लिस्ट लंबी है। मंगलवार को आए परिणाम के बाद अब क्षेत्रीय दलों का दबाव कांग्रेस पर बढ़ेगा इसमे कोई शक नहीं है। गठबंधन में शामिल कई दल बीते दिनों आरोप लगा चुके हैं कि कांग्रेस इसमें मनमानी कर रही है और उनके स्पेस को स्वीकार नहीं कर रही है।
मंगलवार को इंडिया गठबंधन के अपने सहयोगी दलों से महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली में अगले दौर के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए कुछ सलाह मिली। आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को कहा कि चुनाव परिणामों का सबसे बड़ा सबक यह है कि चुनाव में कभी भी अति आत्मविश्वासी नहीं होना चाहिए। हर चुनाव और हर सीट मुश्किल होती है। हरियाणा में सीट बंटवारे को लेकर मतभेद के कारण आप कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने में विफल रही थी। उसका नतीजा यह है। यदि समाजवादी व आप पार्टी भी साथ होती और उसके वोट भी कांग्रेस के साथ जुड़ते तो परिणाम अलग होते।
बता दें कि हरियाणा में सीट बंटवारे को लेकर मतभेद के कारण आम आदमी पार्टी, कांग्रेस के साथ चुनाव से पहले गठबंधन करने में विफल रही थी। हालांकि शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि हरियाणा चुनाव के नतीजों का महाराष्ट्र में कोई असर नहीं पड़ेगा, जहां अगले महीने चुनाव होने की संभावना है।


