Wednesday, April 22, 2026
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बागियों की आसान नहीं राह

Samvad 50

rajesh jainसीरिया में तख्तापलट हो गया है। इसके साथ ही वहां असद परिवार का 53 साल से चला आ रहा शासन भी खत्म हो गया। राष्ट्रपति बशर अल-असद देश छोड़कर रूस भाग चुके हैं। विपक्षी लड़ाकों ने सत्ता अपने हाथों में ले ली है। लेकिन असलियत यह है कि सत्ता पर कब्जे के बाद भी विद्रोहियों के लिए देश चलाना आसान नहीं होगा। ऐसा क्यों है, ये जानने के लिए पहले विद्रोह की पूरी कहानी समझना होगी। सीरिया में बशर के पिता हाफिज अल-असद 1971 में सीरिया के राष्ट्रपति बने थे और अगले 29 साल तक देश के राष्ट्रपति रहे। साल 2000 में हाफिज की मौत के बाद बशर ने सीरिया की सत्ता संभाली। इसके बाद से बशर सीरिया के राष्ट्रपति थे।

पश्चिमी एशिया का करीब 3.35 करोड़ आबादी वाला सीरिया, भू-राजनीतिक रूप से अहम देश माना जाता है। इसकी सीमा इराक, तुर्किये, जॉर्डन, लेबनान व इजराइल जैसे देशों से लगती है। सीरिया पर नियंत्रण अहम व्यापार मार्गों, ऊर्जा गलियारों तक पहुंच प्रदान करता है और पूरे क्षेत्र में प्रभाव डालने के लिए एक आधार प्रदान करता है। जहां तक भारत का सवाल है-भारत व सीरिया के रिश्ते अच्छे रहे हैं। 2008 में बशर भारत का दौरा कर चुके हैं। हाल में दोनों मुल्क पावर और सोलर प्लांट प्रोजेक्ट पर साथ काम कर रहे हैं। 2022 में भारत ने इसके लिए 28 करोड़ डॉलर की मदद की घोषणा की थी। विद्रोह से इन प्रोजेक्ट पर असर होगा।

2011 में जब मिडिल ईस्ट में अरब क्रांति की शुरूआत हुई। तभी सीरिया में भी असद के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए। इनको बेरहमी से कुचल दिया गया। इससे एक गृहयुद्ध शुरू हुआ, जिसमें 5 लाख से अधिक लोगों की जान गई और लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा। करीब आठ साल तक सीरिया के गृहयुद्ध में मोर्चे स्थिर रहे, जहां असद की सरकार रूस और ईरान के समर्थन से देश के सबसे बड़े हिस्से पर राज कर रही थी, वहीं, विभिन्न विपक्षी समूह उत्तर और पश्चिम में क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए हुए थे। सीरिया पश्चिमी एशिया में रूस का सबसे भरोसेमंद पार्टनर है। इसलिए रूस बशर को हर तरह की सैन्य, आर्थिक व रणनीतिक मदद देता रहा है।

इन दिनों बदले हालात में रूस और ईरान दोनों ही अपनी-अपनी समस्याओं में उलझे हुए हैं। ईरान जहां इजरायल से लड़ाई में लगा हुआ है तो वहीं रूस भी यूक्रेन के साथ लंबे समय से युद्ध में व्यस्त हैं। इसके मद्देनजर सीरिया के हालात पर उनका ध्यान नहीं है और असद अकेले पड़ गए। इस बीच, सीरियाई विद्रोही गुट हयात तहरीर अल शाम (एचटीएस) ने 2020 की सीजफायर के बाद 27 नवंबर को सेना से फिर जंग छेड़ दी। एचटीएस नामक यह इस्लामिक समूह, पिछले पांच साल से इडलीब प्रांत पर शासन कर रहा था। शुरू में इसने 13 गांवों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद एक दिसंबर को देश के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो पर अधिकार कर लिया। 4 दिन बाद विद्रोही गुटों ने एक और बड़े शहर हमा और फिर दक्षिणी शहर दारा पर कब्जा किया। दारा से ही 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोह की शुरूआत हुई थी और पूरे देश में जंग छिड़ गई थी। दारा से राजधानी दमिश्क की दूरी करीब 100 किमी है। इसके बाद 8 दिसंबर को दारा शहर की तरफ से विद्रोही लड़ाके राजधानी दमिश्क में घुस गए और कब्जा जमा लिया।

विशेषज्ञों ने दमिश्क पर कब्जे की तुलना अफगान सरकार के पतन से की है, क्योंकि यहां भी सेनाओं ने बिना किसी संघर्ष के आत्मसमर्पण कर दिया। सीरिया पर बारीकी से नजर रखने वाले लोगों ने बताया कि जैसे ही एचटीएस के नेतृत्व वाले विद्रोहियों के समूह ने राजधानी में प्रवेश किया वैसे ही राष्ट्रपति असद देश से भाग निकले। इसके बाद व्यापक भ्रष्टाचार और लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध से थकान के कारण सेना ने भी घुटने टेक दिए।

सबसे बड़ा क्षेत्र सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेस (एसडीएफ ) के पास है, जो अमेरिका द्वारा समर्थित है और जो पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में कुर्दों द्वारा बसाए गए क्षेत्रों पर नियंत्रण रखता है। उत्तर में, जो तुर्की के साथ सीमा लगती है, वहां अंकारा द्वारा समर्थित सीरियाई राष्ट्रीय सेना एचटीएस द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों से भी बड़े क्षेत्र पर काबिज है। दमिश्क पर कब्जा करने के बाद, एचटीएस अब सीरिया में सबसे महत्वपूर्ण ताकत बन गई है और माना जा रहा है कि वह अब असद शासन द्वारा शासित क्षेत्रों पर नियंत्रण कर चुकी है। इनमें एकता आसान नहीं होगी क्योंकि सीरिया जैसे जटिल क्षेत्र में सशस्त्र समूहों के बीच नियंत्रण और प्रभाव के लिए लड़ाई चलती रहती है। दक्षिण में, स्थानीय मिलिशिया समूहों ने स्वेइदा और दारा पर नियंत्रण स्थापित किया है। सीरियाई राष्ट्रीय सेना ने एचटीएस के साथ इस हमले में भाग लिया था, लेकिन उनके बीच अतीत में मतभेद रहे हैं और उनके हित अब भी अलग हैं।

असद के सत्ता से हटने के साथ ही सीरिया में करीब 54 साल लंबे असद परिवार के शासन का अंत हो गया। सीरिया के प्रधानमंत्री घाजी अल-जाली ने कहा कि वह शांति से सत्ता हस्तांतरण के लिए विपक्षी समूहों के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं। लेकिन सीरिया के लोगों के लिए आगे क्या होगा, यह एक जटिल सवाल है। एचटीएस के नेता अल-जुलानी ने लोगों द्वारा चुने गए ‘काउंसिल’ के आधार पर संस्थाओं द्वारा शासित एक सरकार बनाने की योजना के बारे में बात की है। उन्होंने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने का वादा किया है। लेकिन यह भी कहा है कि शासन इस्लामिक सिद्धांतों पर आधारित होगा। यह तय है कि एचटीएस दमिश्क में किसी भी राजनीतिक सत्ता में एक केंद्रीय भूमिका निभाएगा। लेकिन क्या एसडीएफ या तुर्की समर्थित सीरियाई राष्ट्रीय सेना एचटीएस-नेतृत्व वाले समूहों के साथ मिलकर एक सरकार बनाएगी, यह सवाल अब भी अनुत्तरित है। इन तीन गुटों के बीच गहरी दुश्मनी है। उदाहरण के लिए, सीरियाई राष्ट्रीय सेना के सदस्यों ने एचटीएस के अलेप्पो पर कब्जा करने के बाद एसडीएफ द्वारा क्षेत्रों में कई लोगों की हत्या की थी। वहीं, अमेरिका ने रविवार को सीरिया में आई एसआईएस के 75 से ज्यादा ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। इन हमलों के लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा- सीरिया में शक्ति संतुलन बदल गया है। एसआईएस इसका फायदा उठाने की कोशिश में है लेकिन हम ऐसा होने नहीं देंगे।

दूसरी ओर तथ्य यह है कि विद्रोही गुट में हयात तहरीर अल-शम और उसके सहयोगी संगठनों को अलकायदा का समर्थन हासिल है। एचटीएस का नेतृत्व अबू मोहम्मद अल-जुलानी कर रहा है। जुलानी ने 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़कर अल-कायदा ज्वाइन कर लिया था। वह अल कायदा में अबू मुसाब अल-जरकावी का करीबी रहा। 2006 में जरकावी की हत्या के बाद जुलानी को इराक में अमेरिकी सेना ने गिरफ्तार 5 साल जेल रखा था। इसके बाद वह इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ गया था। अमेरिका ने जुलानी पर साल 2017 में 84 करोड़ 67 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा है।

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