
वर्ष 2020 से 2025 के बीच, लगभग 17 करोड़ नए डिमैट खाते खोले गए हैं, जो दिसंबर 2025 तक बढ़कर 21.6 करोड़ से अधिक हो गए हैं। केवल वित्त वर्ष 2025 में ही 4 करोड़ से ज्यादा नए खाते खुले। 2019-20 में करीब 4 करोड़ डिमैट खाते थे, जो अब 22 करोड़ से ऊपर पहुंच गए हैं, यानी पिछले 5 वर्षों में इसकी संख्या पांच गुना से अधिक बढ़ी है। कोविड महामारी के दौरान, डिमैट खातों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। लॉकडाउन के दौरान, कुछ लोगों ने शेयर बाजार में अपना ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बाजार की लगातार निगरानी कर निवेश से लाभ कमाने का प्रयास किया, जिनमें से कुछ ने लालच पर नियंत्रण रखते हुए सफलता प्राप्त की।
डिपॉजिटरी एनएसडीएल और सीडएसएल के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के मार्च तक लगभग 3.2 करोड़ नए डिमैट खाते खुले हैं, जिससे कुल खातों की संख्या बढ़कर 22.5 करोड़ से अधिक हो गई है। हालांकि,यह 2025 की तुलना में लगभग 22 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है, जब इस अवधि के दौरान कुल 4.1 करोड़ डिमैट खाते खुले थे। दरअसल,बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव बने रहने और शेयरों में अपेक्षित रिटर्न न मिलने से खुदरा निवेशकों का भरोसा शेयर बाजार से कम हो रहा है। इसी वजह से हाल में जारी आईपीओ में औसत आईपीओ आवेदन संख्या 21.3 लाख से घटकर 13 लाख रह गई है।
वित्त वर्ष 2026 में बेंचमार्क इंडेक्स का प्रदर्शन पिछली 6 वर्षों में सबसे कमजोर रहा, जिसमें निफ्टी 50 में 5.1 प्रतिशत और बीएसई सेंसेक्स में 7.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। वहीं, निफ्टी मिडकैप 100 में 1.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि निफ्टी स्मालकैप 100 लगभग 6 प्रतिशत गिर गया। गौरतलब है कि बेंचमार्क इंडेक्स शेयर बाजार में निवेश के प्रदर्शन को मापने का एक मानक पैमाना है, जो सेंसेक्स या निफ्टी जैसी शीर्ष कंपनियों के शेयरों के समूह का प्रतिनिधित्व करता है। यह निवेशकों को यह बताने में मदद करता है कि उनका पोर्टफोलियो कुल बाजार की तुलना में कैसा प्रदर्शन कर रहा है।
बहरहाल, शेयर बाजार में अनिश्चितता की स्थिति के बने रहने और आईपीओ की सुस्त लिस्टिंग से भी छोटे निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है और वे आईपीओ से दूरी बना रहे हैं। वर्ष 2026 की पहली तिमाही, यानी जनवरी से मार्च, के दौरान 18 में से 10, यानी करीब 60 प्रतिशत, आईपीओ ऐसे रहे, जिनमें रिटेल श्रेणी पूरी तरह से सब्सक्राइब नहीं हुई। यह स्थिति वित्त वर्ष 2024-25 के उस स्थिति से बिलकुल विपरीत है, जब निवेशकों के बीच शेयर खरीदने की होड़ मची रहती थी। इतना ही नहीं, भारतीय शेयर बाजार में 31 मार्च 2026 तक हुई 18 लिस्टिंग में से 12 शेयर अपने आईपीओ की कीमत इश्यू प्राइस से नीचे खुले। वहीं, 9 आईपीओ अभी भी अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं। वैश्विक अस्थिरता में बढ़ोतरी, ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष ने निवेशकों का भरोसा शेयर बाजार से कम कर दिया है।
वैसे, निवेशकों का शेयर बाजार से मोहभंग होने के कुछ अन्य कारण भी हैं। उदाहरण के लिए, बाजार का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ओवरवैल्यूड, यानी अपनी वास्तविक कीमत से महंगा है। इससे छोटे निवेशकों को डर हो रहा है कि अब ऊंचे भाव पर शेयर खरीदने से उन्हें नुकसान हो सकता है। 2025 में भारतीय बाजार ने निवेशकों को निराश किया, खासकर स्मॉल और मिडकैप शेयरों में भारी गिरावट के कारण, जिससे उनके पोर्टफोलियो घाटे में गए। वित्त वर्ष 2025-26 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली की है, जिससे बाजार की स्थिरता पर भरोसा कम हुआ है। बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों में बढ़ोतरी का कंपनियों की कमाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिससे निवेशकों का आत्मविश्वास घट रहा है।
वैसे, इन सबके बीच अच्छी खबर यह है कि वित्त वर्ष 2027 तक डिमैट खातों की संख्या स्थिर रहने की संभावना है। इसके साथ ही, बचत को प्रोत्साहित करने, डिजिटल तकनीक को अपनाने और निवेशकों के बीच जागरूकता बढ़ाने जैसे मजबूत कारणों से नई डिमैट खातों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि, कमजोर रिटर्न और आईपीओ गतिविधियों में मंदी के कारण, इस वृद्धि की दर वित्त वर्ष 2025 के उच्च स्तर से नीचे रह सकती है। अंतत: यह कहा जा सकता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं, पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई के निरंतर बढ़ने, धीमे होते विकास और रुपये के लगातार कमजोर होने जैसी अनेक वजहों से भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। इससे निवेशक या तो नुकसान झेल रहे हैं या उन्हें वांछित लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो छोटे निवेशकों के बीच शेयर बाजार के प्रति रुचि कम कर रहा है।

