नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं। अदालत ने साफ किया कि अगर कोई बिल राज्य की विधानसभा से पास होकर दूसरी बार राज्यपाल के पास आता है, तो राज्यपाल को उस पर फैसला करना ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चल सकतीं और राज्यपाल विधानसभा से पारित विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते। अदालत ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास चार विकल्प हैं:
बिल को मंजूरी देना
बिल को मंजूरी रोकना
बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना
बिल को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटाना
लेकिन अगर विधानसभा दोबारा उसी बिल को पारित करके राज्यपाल के पास भेजती है, तो राज्यपाल के पास कोई विकल्प नहीं बचता और उन्हें उस बिल को अनिवार्य रूप से मंजूरी देनी होगी।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि अगर राज्यपाल विधानसभा से पारित बिल को बिना पुनर्विचार के ही मंजूरी रोकते हैं, तो यह स्थिति चुनी हुई सरकारों को राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर बना देगी। ज्यपाल का काम निर्वाचित सरकार को बाधित करना नहीं, बल्कि संवैधानिक दायरे में रहकर सहयोग करना है। राज्यपाल को यह अधिकार नहीं है कि वे विधानसभा से पारित किसी बिल को अनिश्चितकाल तक लंबित रखें।
सुप्रीम कोर्ट में राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर चल रही महत्वपूर्ण सुनवाई गुरुवार को लगातार तीसरे दिन जारी रही। यह मामला विधानसभा से पारित बिलों पर मंजूरी, रोक या राष्ट्रपति के पास रिजर्वेशन से जुड़ा है।
केंद्र ने कहा- राज्यपाल को पोस्टमैन नहीं बनाया जा सकता सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल को केवल पोस्टमैन की भूमिका में नहीं रखा जा सकता। उनके पास कुछ संवैधानिक अधिकार हैं और वे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होते हैं।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने केंद्र की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि अगर राज्यपाल को यह अधिकार है, तो फिर राष्ट्रपति भी केंद्र सरकार के बिलों पर मंजूरी रोक सकते हैं। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान की व्याख्या राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर नहीं की जाएगी।
जस्टिस नरसिम्हा बोले- संविधान एक जीवंत दस्तावेज है जस्टिस नरसिंहा ने कहा कि राज्यपाल की शक्तियों की व्याख्या सीमित दायरे में नहीं की जा सकती। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और उसकी व्याख्या समय के अनुसार होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल पहले बिल को संशोधन के लिए लौटा सकते हैं और अगर विधानसभा संशोधन कर देती है, तो राज्यपाल बाद में मंजूरी भी दे सकते हैं।
सरकार बोली- क्या कोर्ट संविधान दोबारा लिख सकती है इस मामले पर पहले दिन की सुनवाई में केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 वाले फैसले पर कहा कि क्या अदालत संविधान को फिर से लिख सकती है? कोर्ट ने गवर्नर और राष्ट्रपति को आम प्रशासनिक अधिकारी की तरह देखा, जबकि वे संवैधानिक पद हैं।
राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे थे 15 मई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों को लेकर 14 सवाल पूछे थे। राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से यह राय मांगी थी कि क्या कोर्ट राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा से पास बिलों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा तय कर सकता है?
तमिलनाडु से शुरू हुआ था विवाद यह मामला तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद से उठा था। जहां गवर्नर से राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सामने आया था।

