आज के दौर का मीडिया, खासकर ‘सोशल मीडिया’ अपने द्वारा परोसी गई सूचनाओं से नागरिकों को जागरूक बनाए रखने की बुनियादी जिम्मेदारी से कहीं आगे बढ़ चुका है। उसकी इस ‘प्रगति’ ने जहां एक ओर नागरिकों को अपने आसपास की दुनिया के प्रति सचेत किया है, तो वहीं दूसरी ओर उसे तरह-तरह की फर्जी कहानियां गढ़कर पिछडा, फूहड और मूर्ख बनाया है। ऐसे में संसद की ‘स्थायी समिति’ की ताजा सिफारिशें मीडिया को संतुलित करने की पहल करती दिखाई देती हैं।
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
पिछले दिनों संसद की ‘स्थायी समिति’ ने फर्जी खबरों और सनसनीखेज समाचारों के प्रसार पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की सिफारिश की है। सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में विभिन्न मीडिया संगठनों को भी आमंत्रित किया गया, जहां उन्होंने फर्जी खबरों पर नियंत्रण और मीडिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के उपायों पर अपने सुझाव दिए।
समिति ने कहा कि कुछ टीवी चैनल केवल ‘टेलिविजन रेटिंग पाइंट’ या ‘टारगेट रेटिंग पाइंट’ (टीआरपी) बढ़ाने के लिए सनसनीखेज समाचारों का प्रसार कर रहे हैं, जिससे गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दे दब रहे हैं। समिति ने इंगित किया कि मीडिया मालिकों, पत्रकारों और राजनीतिक इकाइयों के बीच हितों का टकराव खबरों की विश्वसनीयता पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। इसीलिए समिति ने दंडात्मक प्रावधानों में संशोधन की सिफारिश की, ताकि फर्जी खबरों के प्रसार को रोका जा सके और जनता तक सही तथा भरोसेमंद सूचना पहुंचाई जा सके। पत्रकारिता के आरंभिक दौर में छापाखाने की शु्न०आत के समय से ही झूठी अफवाहें और गलत जानकारियां समाज में फैलाई जाती रही हैं, लेकिन इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के युग ने इसे एक नया रूप और नयी गति दी है। आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल फोन से वीडियो बनाकर तत्काल लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ‘एल्गोरिद्म’ आधारित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इस प्रसार को और तेज कर देते हैं क्योंकि वे सनसनीखेज या भावनात्मक रूप से उत्तेजक कंटेंट को प्राथमिकता से आगे बढ़ाते हैं। परिणामस्वरूप एक झूठी खबर देखते-ही-देखते पूरी दुनिया में फैल जाती है और बहुत लोग उसे बिना जांच-परख के सच भी मान लेते हैं।
हमारा देश भी इस संकट से अछूता नहीं है। इंटरनेट और स्मार्टफोन का प्रसार तेजी से हुआ है और आज लगभग 80 करोड़ से ज्यादा लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं, लेकिन यह विशाल संख्या एक ओर लोकतंत्र को अधिक सहभागी और जागरूक बना रही है तो दूसरी ओर जनसामान्य को ‘फेक न्यूज’ और अफवाहों का सबसे आसान शिकार भी बना रही है। भारत में व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर ‘फेक न्यूज’ सबसे जल्दी फैलती है। लाखों लोग बिना सोचे-समझे संदेश, वीडियो और तस्वीरें आगे बढा देते हैं जिससे कभी-कभी सामाजिक तनाव तक पैदा हो जाता है।
‘फेक न्यूज’ के पीछे कई कारण हैं। पहला है – राजनीतिक लाभ। चुनावों के दौरान फर्जी खबरें विपक्षियों की छवि खराब करने, मतदाताओं को प्रभावित करने या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए फैलाई जाती हैं। दूसरा कारण है – आर्थिक लाभ। ‘क्लिकबेट साइट्स’ (एक भ्रामक और सनसनीखेज शीर्षक, छवि या विवरण जिसका उद्देश्य लोगों की उत्सुकता या भावनाओं को जगाना होता है) का उपयोग आॅनलाइन सामग्री पर ट्रैफिक बढ़ाने और विज्ञापन राजस्व कमाने के लिए किया जाता है। तीसरा कारण है – तकनीकी। सोशल मीडिया के ‘एल्गोरिद्म’ ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देते हैं जो विवादित या भावनात्मक हों। चौथा कारण है – शिक्षा और जागरूकता की कमी, जिससे लोग हर जानकारी को सच मान लेते हैं।
इन परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत में कई कानूनी व्यवस्थाएं और नियामक संस्थाएं मौजूद हैं। ‘भारतीय दंड संहिता’ की धारा – 153 और 295 का उपयोग दंगा भड़काने या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली ‘फेक न्यूज’ के मामलों में किया जा सकता है। धारा – 499 और 500 मानहानि के मामलों में लागू होती है। ‘सूचना प्रौद्योगिकीय अधिनियम, 2000’ की धारा – 66 भी कंप्यूटर और नेटवर्क से जुड़े अपराधों पर दंड का प्रावधान करती है। इसके अलावा ‘प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया,’ ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ और ‘ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल’ जैसी संस्थाएं भी ‘फेक न्यूज’ से निपटने की कोशिश करती हैं, लेकिन इन सभी के अधिकार सीमित हैं और अक्सर इनकी कार्रवाइयाँ केवल चेतावनी या निंदा तक सीमित रह जाती हैं।
हाल के वर्षों में सरकार ने नए प्रयास किए हैं। वर्ष 2023 में ‘भारतीय न्याय संहिता’ बनायी गयी जिसमें भ्रामक सूचना फैलाने वालों को तीन साल तक की जेल का प्रावधान है। सरकार ने ‘प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो’ की एक ‘फैक्ट-चेक यूनिट’ बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्थगित कर दिया क्योंकि यह प्रेस की स्वतंत्रता पर असर डाल सकता था। हालांकि इस पर आलोचना भी हुई कि यह कानून बहुत व्यापक है और इससे आम नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी खतरा हो सकता है।
‘फेक न्यूज’ की समस्या के साथ ही फर्जी पत्रकारों की बढ़ती संख्या स्वस्थ पत्रकारिता के सामने एक नयी चुनौती है। ऐसे लोग जो न तो पत्रकारिता की पढ़ाई किये होते हैं और न ही किसी संस्थान से जुड़े होते हैं, लेकिन खुद को पत्रकार बताकर अपना काम करते हैं। ये अक्सर ब्लैकमेलिंग, अफवाहें फैलाने या व्यक्तिगत लाभ के लिए झूठी खबरें बनाते हैं। जनता पत्रकार शब्द सुनकर उन पर विश्वास कर लेती है और फर्जी पत्रकार इसका दुरुपयोग समाज को गुमराह करने के लिए करते हैं।
‘फेक न्यूज’ से निपटने के लिए केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा। जनता को जागरूक करना भी जरूरी है। इटली जैसे देशों ने स्कूलों में ‘फेक न्यूज की पहचान’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। भारत में भी साइबर सुरक्षा, इंटरनेट शिक्षा और मीडिया साक्षरता को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करना चाहिए। इस कार्य में सोशल मीडिया कंपनियों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। उन्हें ऐसे ‘एल्गोरिद्म’ बनाने चाहिए जो झूठी खबरों की पहचान करें जिससे उनके प्रसार को रोका जा सके। मीडिया संस्थानों की भी जिम्मेदारी है कि वे ‘फैक्ट-चेकिंग’ को अपनी प्राथमिकता बनाएँ।
‘फेक न्यूज,’ फर्जी पत्रकार और ‘डिजिटल मैनिपुलेशन’ केवल पत्रकारिता पर संकट नहीं हैं, ये लोकतंत्र के लिए भी नयी चुनौती हैं। यदि इन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो समाज में अविश्वास, हिंसा और अस्थिरता बढ़ेगी। दूसरी ओर, अगर बहुत अधिक नियंत्रण किया गया तो यह प्रेस की स्वतंत्रता और सामान्यजन की अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करेगा, इसलिए इसमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

