Saturday, March 14, 2026
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मौत को क्यों गले लगा रहे छात्र?

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लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। जो न केवल चिंताजनक है बल्कि डरावनी भी है। आत्महत्या के तेजी से बढ़ते आंकड़े यह दशार्ते हैं कि लोग मानसिक रूप से इतने कमजोर होते जा रहे हैं कि छोटी-छोटी बातों पर जिंदगी खत्म कर लेने जैसा बड़ा कदम उठा ले रहे। शोध और सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि छात्रों की आत्महत्याओं के पीछे मुख्य कारण शैक्षणिक और सामाजिक तनाव के साथ-साथ कॉलेजों या संस्थाओं से मदद ना मिलना और जागरूकता का अभाव है। बीती 31 अक्टूबर से 3 नवंबर चानी चार दिनों में यूपी के प्रयागराज जिले में एक दर्जन लोगों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली। इनमें सबसे बड़ी संख्या किशोरों और युवाओं की है। बीती 31 अक्टूबर को करेली के जीटीबी नगर के 15 वर्षीय इमरान ने फांसी लगाकर जान दे दी। उसे मां ने पढ़ाई के लिए डांट दिया था। युवाओं की आत्महत्या के मामले देश में तेजी से बढ़ रहे हैं।

राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में देश की शिक्षण संस्थाओं में 13,892 छात्रों की मौत को गले लगाया। यह तथ्य हृदयविदारक ही है कि देश में एक साल के दौरान करीब चौदह हजार छात्रों ने आत्महत्या की। पहली नजर में आत्मघात के मूल में पढ़ाई का दबाव, छात्रों की संवेदनशीलता और तंत्र की नाकामी बताई जा सकती है। लेकिन सवाल है कि हमारा तंत्र क्यों संवेदनहीन बना हुआ है? सबसे दुखद स्थिति यह है कि यह संख्या पिछले एक दशक में पैंसठ प्रतिशत बढ़ी है। वहीं इस आंकड़े की तुलना यदि वर्ष 2019 से करें तो यह वृद्धि चौंतीस फीसदी दर्ज की गई है। जाहिर बात है कि यह वृद्धि छात्रों की मानसिक पीड़ा, हताशा और भविष्य के प्रति निराश होने की स्थिति को ही दशार्ती है। निश्चित रूप से हमारी शिक्षा की विसंगतियां भी इन आत्महत्याओं के मूल में हैं। देश में भाषा व बोर्ड स्तर पर पाठ्यक्रम व शिक्षण की स्थिति में खासा अंतर है।

इन मामलों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को तलब करके इस बाबत विस्तृत विवरण मांगा है। साथ ही सवाल पूछा है कि क्या देश के सभी शिक्षण संस्थान छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी निभा रहे हैं? विडंबना यह है कि देश में मोटी पगार वाली नौकरियों की गलाकाट स्पर्धा में शिक्षण संस्थाएं व शिक्षक उस दायित्व को भूल गए हैं, जो छात्रों को विषयगत शिक्षा के साथ विषम परिस्थितियों के बीच जीवन जीने की कला सिखा सके। उन्हें व्यावहारिक जीवन का कौशल सिखाने के साथ ही चुनौतियों से जूझने की मानसिक शक्ति विकसित करने के लिए तैयार कर सकें। आखिर किसी परिवार की उम्मीद को किस स्थिति में यह सोचना पड़ता है कि मौत को गले लगाना अंतिम विकल्प है?

अहज सवाल यह भी है कि शिक्षा परिसरों में ऐसी स्थितियां क्यों विकसित हो रही हैं कि विद्यार्थी जीवन से हार मानने लगे हैं? निस्संदेह, शिक्षण संस्थानों का एक मात्र लक्ष्य किताबी ज्ञान देकर डिग्री बांटने तक ही नहीं हो सकता। शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन तंत्र को अपने परिसर में समता, ममता और सहजता का वातावरण तैयार करना होगा। जहां किसी भी तरह तनाव, मानसिक कष्ट व भेदभाव नजर न आए और कारगर शिकायत निवारण तंत्र विकसित हो। ऐसा न होने पर ही सरस्वती के मंदिरों में तनाव की फसल उग रही है। हमारे नीति-नियंता इस दुखदायी स्थिति पर अंकुश लगाने हेतु किसी तरह की गंभीर पहल करते नजर नहीं आते। यदि गाल बजाने वाले राजनेता कोई कदम उठाने की लोकलुभावनी घोषणा करते भी हैं तो भी जमीनी हकीकत बदलती नजर नहीं आती। घोषणाएं प्रभावी भी होनी चाहिए।

2019 में भारत में कॉलेज के छात्रों के बीच आत्महत्या के मामलों पर एक अध्ययन किया गया. यह अध्ययन आॅस्ट्रेलिया की मेलबर्न यूनिवर्सिटी, भारत के नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस और कई भारतीय मेडिकल कॉलेजों ने मिलकर किया था। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं छात्रों पर किस हद तक असर डाल रही हैं और आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम उठाने पर मजबूर कर रही हैं। इस अध्ययन के लिए, भारत के नौ राज्यों के 30 विश्वविद्यालयों के 8,500 से ज्यादा छात्रों के बीच सर्वे किया गया। इसमें पाया गया कि पिछले एक साल में 12 फीसदी से ज्यादा छात्रों के मन में आत्महत्या के विचार आए थे। 6.7 फीसदी ने कभी ना कभी आत्महत्या का प्रयास किया।
अध्ययन में कहा गया है कि स्कूल-कॉलेजों में मानसिक सेहत से जुड़ी मदद और उपाय तुरंत शुरू करने चाहिए, ताकि इस बढ़ती हुई समस्या से निपटा जा सके। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थिति को ह्यआत्महत्या की महामारी’ बताया. उसने मार्च में 10 सदस्यों वाले एक राष्ट्रीय कार्यबल का गठन किया। यह कार्यबल अभी कई तरह की जांच, परामर्श, और संस्थागत समीक्षाओं में लगा हुआ है। इसका मकसद एक व्यापक नीतिगत खाका तैयार करना है। सवाल यह भी है कि शैक्षणिक परिसरों में आत्महत्या रोकने के लिये जो कदम केंद्र व राज्य सरकारों को उठाने चाहिए थे, उसके बाबत देश की शीर्ष अदालत को क्यों पहल करनी चाहिए? इस मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि केंद्र व राज्य सरकारें आठ सप्ताह के भीतर वह विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत करें, जो आत्महत्या रोकने के दिशा-निदेर्शों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।

एक व्यवहारिक दिक्कत यह भी है कि पैसे वालों के बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं। रही-सही कसर उनके महंगे कोचिंग सेंटरों द्वारा पूरी की जाती है। हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों की सारी ऊर्जा अपने ज्ञान को अंग्रेजी में ट्रांसलेट करने में चली जाती है। कालांतर में वे उच्च शिक्षा संस्थानों में हीन ग्रंथि का शिकार हो जाते हैं। ऐसी तमाम ग्रंथियां छात्रों को अपराधबोध से भर देती हैं। पढ़ाई के दबाव के अलावा शिक्षा संस्थानों के परिसर में रैगिंग, हिंसा और जातिगत भेदभाव की खबरें भी आती हैं जो संवेदनशील छात्रों को हताशा से भर देती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, स्कूलों में नियमित तौर पर मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा दी जानी चाहिए, ना कि कभी-कभार होने वाले सत्रों तक इसे सीमित रखना चाहिए। इसे हर रोज की पढ़ाई में शामिल करना होगा। बच्चों को ऐसा माहौल चाहिए जहां वे खुलकर बोल सकें और कोई उन्हें ध्यान से सुने। शिक्षकों को सिर्फ पढ़ाने नहीं, बल्कि सुनने की कला भी सिखाई जानी चाहिए। निश्चय ही सजगता व संवेदनशीलता से ऐसी परिस्थितियों से छात्रों को बचाया सकता है। यही वजह है कि देश की शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में शिक्षण संस्थानों और सरकार को जरूरी दिशा निर्देश दिए हैं। निस्संदेह, देश के युवाओं में आत्मघात की प्रवृत्ति राष्ट्र की गंभीर क्षति है, जिसे संवेदनशील ढंग से दूर करने की तत्काल जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या का हल तभी संभव है जब युवा अपनी जिंदगी से जुड़े फैसलों में खुद शामिल हों। उन्हें सही मार्गदर्शन मिले और ऐसे रोल मॉडल तैयार किए जाएं जिन्हें वे आसानी से अपना सकें, ताकि सफलता की परिभाषा सिर्फ अंकों या करियर तक सीमित ना रहे।

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