
इंडिगो एयरलाइन द्वारा हजारों फ्लाइट्स रद्द करने से लाखों यात्री कई दिनों तक एयरपोर्ट पर बंधक बने रहेब इस दौरान, किसी की कनेक्टिंग फ्लाइट छूटी, दूल्हा मंडप तक नहीं पहुंच पाया, कमरों की बुकिंग कैंसिल हुई,कोई अपने माता-पिता या निकट रिश्तेदारों के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच सका, किसी की परीक्षा छूटी तो किसी का इंटरव्यू, कोई विदेश अपनी नौकरी पर नहीं जा सका तो कोई देश में आॅफिस नहीं पहुंच सका,हजारों यात्रियों के लगेज अभी भी गायब हैं, आदि।
इतना सब होने के बाद भी इंडिगो ने इसे परिचालन से जुड़ी समस्या बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। एयरलाइन के सीईओ पीटर एल्बर्स ने कहा कि यह सब मामूली तकनीकी गड़बड़ियों, मौसम की प्रतिकूल स्थिति, हवाई अड्डे पर भीड़-भाड़ और नएक्रू रोस्टरिंग नियमों (एफडीटीएल) के कारण हुआ। हालांकि, किसी भी यात्री को फ्लाइट के रद्द होने की सूचना नहीं दी गई। उन्हें कई घंटों तक एयरपोर्ट और विमान के अंदर बैठाने के बाद बताया गया कि विमान रद्द कर दी गई है। क्या यह सब भी परिचालन जनित समस्या थी?
एयरलाइन की हिम्मत और मनमानी इस कदर बढ़ी हुई है कि इसने एविएशन रेगुलेटर, डायरेक्टरेट जनरल आॅफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) के निर्देशों कीअवहेलना की और जानबूझकर पायलटों और केबिन क्रू की समय से भर्ती नहीं की। सबकुछ सुनियोजित था। इस फिल्म की स्क्रिप्ट इतनी परफेक्ट थी कि डीजीसीए और सरकार को अंत में बैकफुट पर आना ही पड़ा। डीजीसीए और सरकार सबकुछ जानकार भी अंजान बनी रही। उन्होंने न इंडिगो एयरलाइन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और न ही दूसरे एयरलाइन्स के खिलाफ। मामले में उड्डयन मंत्री श्री राम बाबु नायूड का 12 दिसंबर को लोकसभा में दिया गया बयान, ‘हवाई किराये पर अधिकतम सीमा की कैप लगाना व्यावहारिक नहीं है’ ने साफ कर दिया कि सरकार बाजारवाद के खिलाफ कार्रवाई करने में असमर्थ है। इंडिगो प्रकरण ने फिर से ईस्ट इंडिया कंपनी की याद को ताजा कर दिया है। क्या फिर से भारत किसी कंपनी का गुलाम बनने के लिए तैयार है? मौजूदा हालात इसी तरफ इशारा करते हैं। आज कई निजी कंपनियां देश की दशा और दिशा को तय कर रही हैं।
इंडिगो जनित संकट ने यह साफ कर दिया कि बड़ी और ताकतवर निजी कंपनियों चाहें तो कभी भी आमजन को कीड़े-मकौड़े की तरह अपने जूते के नीचे मसल सकती हैं। पहले, गरीबों की बेचारगी पर मध्यम वर्ग के लोग तटस्थया उदासीन रहते थे। इस संकट ने उन्हें भी असहाय, बेचारा, लाचार और बेबस बना दिया और यह भी साफ कर दिया कि लाख या करोड़ कमाने वाले भी इस देश में बेचारे ही हैं। सिर्फ अरबों-खरबों कमाने वाले ही बिना किसी समस्या के आराम से जीवन का आनंद ले सकते हैं
हमारे देश में कई निजी क्षेत्र ऐसे हैं,जिनकी बाजार हिस्सेदारी 50 प्रतिशत या उससे अधिक है। उदाहरण के तौर पर टेलीकॉम सेक्टर। रिलायंस जियो की बाजार हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है,जबकि भारती एयरटेल की लगभग 34 प्रतिशत और वोडाफोन की 18 प्रतिशत है। वहीं, शेष 8 प्रतिशत हिस्सेदारी सरकारी टेलीकॉम कंपनी,भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर संचार निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) की है। आज यही मोबाइल और इंटरनेट सेवा प्रदात्ता हैं और अगर इनका मिजाज बिगड़ा तो पूरा देश घुटने पर आ जाएगा।
इसके अतिरिक्त देश में और भी कई वर्चस्व वाले क्षेत्र हैं,जो जब चाहें आमजन को उसकी औकात बता सकते हैं। मसलन, बारहवीं कक्षा तक के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था का दारोमदार लगभग 90 प्रतिशत निजी क्षेत्र के हाथों में है,जबकि कॉलेजों में यह हिस्सेदारी लगभग 66 प्रतिशत है। इसी तरह लगभग 70 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान की जा रही है। मार्च 2025 तक बैंकिंग क्षेत्र में निजी क्षेत्र के बैंकों का ऋण बाजार में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी, जिसमें आगामी महीनों में और भी इजाफा होने की उम्मीद है, क्योंकि सरकार, सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को कम करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। सेवा क्षेत्र में यह हिस्सेदारी लगभग 55 प्रतिशत, खुदरा बाजार में 85 प्रतिशत, आईटी सेवाओं में 95 प्रतिशत,हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में 90 प्रतिशत और एयरलाइन क्षेत्र में 85 प्रतिशत है।
हमारे देश की आबादी लगभग 140 करोड़ है और इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी निजी कंपनियों की मेहरबानी से कीड़े-मकौड़े की तरह जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। शिक्षा का क्षेत्र हो हो या स्वास्थ्य का,सभी जगह निजी कंपनियां आमजन को लूट रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सरकार इनपर कोई नियंत्रण नहीं है या सरकार ने उन्हें मनमानी करने की खुली छूट दे रखा है। अब हमें तय करना होगा, देश को पूंजीवाद की जरूरत है या समाजवाद की।

