राजेंद्र बज
वर्तमान दौर में सारी दुनिया हमारी अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और धर्म संस्कृति की अवधारणाओं की ओर आशा भरी नजरों से निहारती नजर आती है। हमारे अपने सांस्कृतिक मूल्य प्रकारांतर से ही सही किंतु बेहतर जीवन जीने की सीख देते रहे हैं। जिसके चलते निराकुल अवस्था में हम अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक जन जीवन में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकें। जिसके चलते हर एक दृष्टि से परिपूर्ण राष्ट्र का निर्माण हो सके। जहां तक भौतिक साधन संसाधन की बात है, हमारी संस्कृति में सच्चे तथा वास्तविक सुख के लिए यह कतई आवश्यक नहीं है।
हमारी धार्मिक अवधारणाएं विज्ञान के ज्ञान का किसी न किसी रूप में आधार रही है। कहानी के तत्वों की भांति प्रारंभ, विकास, चरमोत्कर्ष और अंत की प्रक्रिया से गुजरते हुए दुनिया की कहानी के बनने और बिगड़ने का सिलसिला, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है, इस नियम से परे आज का ज्ञान-विज्ञान भी नहीं। ऐसे में जब सारी दुनिया तमाम तरह के संकट के साए में सांस ले रही हो, तब इसे भारतीय संस्कृति की परंपरा के अनुरुप ही सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर बड़े से बड़े संकट के दौर में भी हमारा आत्मबल डिगता नहीं।
अलग-अलग युगों की धार्मिक अवधारणाएं, हमारी अपनी जीवन शैली में आत्मसात की जाती है।। विकास की अंधी दौड़ के बावजूद इस दौड़ के अंध समर्थक हम कभी नहीं रहे। हालांकि हमने विज्ञान के ज्ञान से अपनी जीवन शैली में चाहे आमूल चूल परिवर्तन कर लिया हो, लेकिन हम अपनी संस्कृति और धर्म संस्कृति की जड़ों से कभी दूर नहीं रहे। इस तथ्य की पुष्टि इस आधार पर की जा सकती है कि आजकल के दौर में भी विभिन्न धर्म स्थल श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास के केंद्र बने हुए हैं। आज भी छोटे-छोटे नगर, गांव एवं कस्बों में छोटे बड़े धर्मस्थल हैं। जहां परम सत्ता के प्रति आस्था और विश्वास के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
आज भी धर्म शास्त्रों के मूल नायकों के चरित्र एवं व्यवहार के अनुरूप हमें हमारा अपना आचरण और व्यवहार सुनिश्चित करने की सीख अपने ही घर के बुजुर्गों से मिलती रही है। यही सीख मूल संस्कारों का बीजारोपण करते हुए हमारे अपने जीवन को संस्कारित बनाती रही है। बीते दशकों में सारी दुनिया का स्वरूप क्या से क्या होता गया। लेकिन हम अपनी मूल संस्कृति से कल भी जुड़े हुए थे और आज भी जुड़े हुए हैं। हमारे नैतिक मूल्य, हमारी उच्चस्तरीय विचारधारा और हमारे सहज स्वाभाविक शालीन संस्कार, हमें गौरवान्वित करते हैं। जिसके चलते हम विकट से विकट समस्याओं से पार पाने की प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय समय-समय पर देते रहे हैं।
बदलते दौर में अनेक परिवर्तन हुए किंतु इन तमाम परिवर्तनों के बावजूद हमारे सदियों से चले आ रहे मूल संस्कार किसी न किसी रूप में हमारे जीवन पथ को आलोकित करते रहे। आज भी ग्रामीण जनजीवन में धर्म ग्रंथों के नायकों के आचरण और व्यवहार को श्रद्धा और समर्पण के साथ आत्मसात किया जाता है। इतने परिवर्तनों के बावजूद हमारे मूल चरित्र में कभी बदलाव न आ सका। आज भी सदियों से प्रचलित परंपराओं को विज्ञान की कसौटी पर कसे जाने पर उसे वर्तमान संदर्भों में भी प्रासंगिक करार दिया जाता है। विज्ञान के तर्क की कसौटी पर हमारी मान्यताओं और अवधारणाओं के निहितार्थ को स्वीकार किया जाने लगा है। जीवन तो सभी जीते हैं, लेकिन बेहतर जीवन जीने का सलीका और तरीका हमें हमारी धर्म संस्कृति ही सिखाती है। आज भी जिन परंपराओं और रीति-रिवाजों को तथाकथित आधुनिक विचारधारा के चलते हम नकार दिया करते हैं, उसकी महत्ता को समूचा विश्व बारी-बारी से स्वीकार करता जा रहा है। भारतीय संस्कृति ने हमें यह सिखाया है कि शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों को भी आत्मसात करना मनुष्य को मनुष्य के रूप में प्रमाणित करता है। तरक्की की अंधी दौड़ में हम सहभागी अवश्य है, लेकिन आज भी किसी न किसी रूप में परिवार की परंपराओं से गूंथें हुए हैं।
हमने चाहे जितनी आधुनिकता अपना ली हो किंतु बचपन में मिली संस्कारों और संस्कृति की सीख को हम जीवन पर्यंत विस्मृत नहीं कर सकते। हम आधुनिक हुए जरूर लेकिन अपने माता-पिता से प्राप्त संस्कारों को अपने स्वभाव में सम्मिलित पाते हैं। आज भी ठेठ ग्रामीण परिवेश में जो ग्रामीण भारत की झलक दिखाई देती है, वह कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में हम आत्मसात कर ही रहे हैं। यह अलग बात है कि उसे हम चिन्हित नहीं कर सकेंगे, लेकिन आधुनिक से आधुनिक भारतीय भी अपने मूलभूत संस्कारों को अपनाएं नजर आता है।
यह निश्चित है कि परिवर्तन के दौर में हम परिवर्तित अवश्य हुए हैं, लेकिन यह परिवर्तित स्वरूप आज भी माटी का मान कराता है। हमारा चेतन स्वरूप कुछ भी हो किंतु हमारे अवचेतन मन में जो सात्विकता दिखाई देती है, वह हमारे संस्कारों की ही उपज है। अनेकता में एकता का ताना-बाना बुने हुए हम भारतीय अपनी विश्व वंदनीय गौरवशाली संस्कृति पर गर्व करते हैं। जब विज्ञान का ज्ञान असहाय हो जाता है तब विकल्प के रूप में भारतीय दर्शन को ही खंगाला जाता है। आशा की जानी चाहिए कि एक-एक करके हमारी सभ्यता और संस्कृति को समूचा विश्व आत्मसात करेगा।
आज भी जिन परंपराओं और रीति-रिवाजों का हेतु हम भी नहीं समझ पाए, उस हेतु को विज्ञान के ज्ञान की कसौटी पर कसकर देखा जा रहा है। इसके साथ-साथ उसे प्रमाणित करते हुए शिरोधार्य भी किया जा रहा है। आज समूचा विश्व भारत की ओर आशा भरी नजरों से निहार रहा है।

