जनवाणी ब्यूरो |
यूपी: लंबे इंतजार, अनगिनत अटकलों और लखनऊ से दिल्ली तक चली कई दौर की बैठकों के बाद आखिरकार भाजपा की नई प्रदेश टीम की घोषणा हो गई। नई टीम पर प्रभावशाली नेताओं के बीच सामंजस्य, समझौते और संतुलन की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। संगठन में नए और पुराने चेहरों का मिश्रण, कुछ चौंकाने वाले नामों की एंट्री तथा जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन यह प्रयास पूरी तरह सफल नजर नहीं आता। दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर संगठन में स्थान दिया गया है।
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने करीब छह महीने की कवायद के बाद वर्षों से संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रहे कई नेताओं को हटाकर नए चेहरों को अवसर देने की कोशिश की है। कुछ पदाधिकारियों को पदोन्नति देकर संगठन में उत्साह और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को भी साधने का प्रयास किया गया है। हालांकि, जिस टीम के सहारे भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है, उसमें कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जो आलोचना का कारण बन सकते हैं।
नई टीम में विधान परिषद सदस्य विजय बहादुर पाठक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र और नोएडा विधायक पंकज सिंह जैसे कई प्रमुख नेताओं को जगह नहीं मिली। हालांकि, पंकज सिंह के छोटे भाई नीरज सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि टीम गठन में वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव निर्णायक रहा। संगठन में नए नेतृत्व को आगे लाने के उद्देश्य से पुरानी टीम के आधे से अधिक चेहरों को बदला गया, लेकिन जातीय प्रतिनिधित्व के लिहाज से संतुलन पूरी तरह नहीं बन सका।
भाजपा ने अपने पारंपरिक वोट बैंक—पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों—को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। साथ ही अगड़े और पिछड़े वर्गों के बीच संतुलन साधने का संदेश भी दिया गया है। इसके बावजूद विभिन्न जातियों की आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
आबादी के अनुपात में ब्राह्मणों को कम प्रतिनिधित्व
प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है, जबकि भूमिहार और त्यागी समुदाय की आबादी करीब एक प्रतिशत है। इसके बावजूद 48 सदस्यीय नई टीम में चार भूमिहार नेताओं को स्थान मिला है, जबकि ब्राह्मण समाज को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा है।
काम का मिला इनाम
2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक बनीं प्रयागराज की पूजा पाल को भाजपा ने प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया है। राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में मतदान करने के बाद उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने को राजनीतिक हलकों में उनके योगदान के पुरस्कार के रूप में देखा जा रहा है।
इसी तरह, भाजपा के हिंदुत्ववादी चेहरे और पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेश राणा की भी लंबे समय बाद संगठन में वापसी हुई है। उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में संगठनात्मक जिम्मेदारियों के दौरान किए गए कार्य के आधार पर उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
33 प्रतिशत महिला भागीदारी का लक्ष्य अधूरा
महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की भाजपा की प्रतिबद्धता के बावजूद नई प्रदेश टीम में केवल 12 महिलाओं को स्थान मिला है। यदि इस लक्ष्य का पालन किया जाता तो 48 सदस्यीय टीम में कम से कम 16 महिलाओं को शामिल किया जाना चाहिए था।
लखनऊ और बाराबंकी को मिली विशेष प्राथमिकता
नई टीम में लखनऊ और बाराबंकी जैसे कुछ जिलों से एक से अधिक नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है, जबकि कई जिले प्रतिनिधित्व से वंचित रह गए। बाराबंकी से प्रियंका रावत को प्रदेश उपाध्यक्ष, उपेंद्र रावत को प्रदेश महामंत्री और अवधेश श्रीवास्तव को प्रदेश मंत्री बनाया गया है। खास बात यह है कि प्रियंका रावत और उपेंद्र रावत दोनों रावत (पासी) समुदाय से आते हैं। इससे यह धारणा बनती है कि पदाधिकारियों के चयन में केवल सामाजिक संतुलन ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय और राजनीतिक समीकरणों का भी प्रभाव रहा।
पूर्व सांसद उपेंद्र रावत को प्रदेश महामंत्री बनाए जाने का फैसला भी चर्चा का विषय बना है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले एक महिला के साथ कथित विवादित वीडियो वायरल होने के बाद उनका टिकट काट दिया गया था। हालांकि, फोरेंसिक जांच में वीडियो में उनकी आवाज की पुष्टि नहीं हो सकी थी। ऐसे में उन्हें संगठन में इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने को राजनीतिक हलकों में एक चौंकाने वाला निर्णय माना जा रहा है।

