जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर गुरुवार को महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित तख्त श्री हजूर साहिब के पास हमला हुआ। सुखबीर बादल को जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है। इसके बावजूद धार्मिक स्थल पर उनके बेहद करीब हमलावर के पहुंचने से सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह पहली ऐसी घटना नहीं है। दिसंबर 2024 में अमृतसर के श्री हरमंदिर साहिब के बाहर धार्मिक सेवा कर रहे सुखबीर बादल पर भी गोली चलाने की कोशिश की गई थी। उस समय पुलिसकर्मी की तत्परता से उनकी जान बच गई थी। अब नांदेड़ की घटना के बाद उनकी सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की मांग उठना स्वाभाविक है।
जेड प्लस सुरक्षा कितनी प्रभावी?
जेड प्लस देश की सबसे ऊंची सुरक्षा श्रेणियों में से एक है। इसके तहत प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी और कमांडो तैनात किए जा सकते हैं। हालांकि सुरक्षा कर्मियों की संख्या कोई स्थायी आंकड़ा नहीं होती। यह संबंधित व्यक्ति को मौजूद खतरे, कार्यक्रम और स्थान की परिस्थितियों के आधार पर तय की जाती है।
सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता केवल सुरक्षाकर्मियों की संख्या से नहीं मापी जाती। किसी संरक्षित व्यक्ति की सुरक्षा में खतरे का आकलन, कार्यक्रम स्थल की जांच, प्रवेश और निकास मार्गों की निगरानी, भीड़ प्रबंधन, स्थानीय पुलिस तथा खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल और आपात स्थिति से निपटने की तैयारी महत्वपूर्ण होती है।
धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा की चुनौती बढ़ जाती है
धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती सामान्य आयोजनों की तुलना में अधिक होती है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहते हैं और लोगों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। इसके अलावा धार्मिक मर्यादाओं और परंपराओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।
जब कोई संरक्षित व्यक्ति धार्मिक सेवा या कार्यक्रम में आम श्रद्धालुओं के बीच शामिल होता है, तो सुरक्षा घेरा बनाए रखना और सामान्य धार्मिक गतिविधियों में बाधा न डालना दोनों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है।
अमृतसर और नांदेड़ की घटनाओं की समीक्षा जरूरी
सुखबीर बादल से जुड़ी दोनों घटनाओं के बाद सुरक्षा व्यवस्था की हर परत की समीक्षा जरूरी हो गई है। यह देखा जाना चाहिए कि कार्यक्रम से पहले पर्याप्त खतरा आकलन किया गया था या नहीं। साथ ही स्थानीय पुलिस, सुरक्षा कर्मियों और खुफिया तंत्र के बीच समन्वय तथा प्रवेश-निकास बिंदुओं पर निगरानी की भी जांच होनी चाहिए।
भीड़ के बीच संदिग्ध गतिविधियों या व्यक्तियों की पहचान के लिए पर्याप्त व्यवस्था थी या नहीं, यह भी जांच का अहम हिस्सा हो सकता है।
ब्लू बुक को लेकर भी स्थिति स्पष्ट होना जरूरी
सुखबीर बादल की सुरक्षा के संदर्भ में अक्सर ब्लू बुक का जिक्र होता है। हालांकि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति जैसे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा के विशेष प्रोटोकॉल और अन्य संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था को एक समान नहीं माना जा सकता।
सुरक्षा व्यवस्था खतरे के आकलन और लागू नियमों के आधार पर तय होती है। धार्मिक स्थलों पर सादी वर्दी में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती भी स्थानीय सुरक्षा योजना और खतरे के स्तर के अनुसार की जा सकती है। इसे हर स्थिति में ब्लू बुक का अनिवार्य प्रावधान बताना उचित नहीं होगा।
हमलावर इतनी नजदीक कैसे पहुंचा?
नांदेड़ की घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि कई स्तर की सुरक्षा के बावजूद हमलावर सुखबीर बादल के इतने करीब कैसे पहुंचा। सुरक्षा व्यवस्था में चूक किस स्तर पर हुई और संभावित खतरे की पहचान समय रहते क्यों नहीं हो सकी, इसका जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
करीब दो साल के भीतर सुखबीर बादल से जुड़ी ऐसी दूसरी बड़ी घटना ने उनकी सुरक्षा के साथ-साथ धार्मिक स्थलों पर वीआईपी सुरक्षा के तौर-तरीकों पर भी बहस छेड़ दी है।
पंथक नाराजगी का एंगल भी चर्चा में
दिसंबर 2024 में अमृतसर में सुखबीर बादल पर हुए हमले की कोशिश को उस समय उनके खिलाफ पंथक नाराजगी के संदर्भ में भी देखा गया था। नांदेड़ की घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनके खिलाफ नाराजगी अभी भी मौजूद है।
हालांकि नांदेड़ की घटना को सीधे पंथक नाराजगी से जोड़ना फिलहाल जल्दबाजी होगी। हमले की वजह और इसके पीछे की मंशा जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

