Friday, May 8, 2026
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जानिए, कोरोना संकट में इलाज के नाम पर निजी अस्पताल कैसे कर रहे मनमानी ?

  • सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन है फिर भी मनमानी पर अंकुश लगाने में लाचार स्वास्थ्य विभाग

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं तो खुद ही बीमार हैं। ऐसे में कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी का इलाज करने वाले प्राइवेट संस्थान लूट खसोट का अड्डा बनकर रह गए हैं। हैरानी की बात तो यह है कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज को लेकर साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से कुछ गाइड लाइन तय की गयी हैं।

जिनमें प्रमुख है कि यदि किसी मरीज की उपचार के दौरान मौत हो जाती है तो पैसों के कमी के चलते परिजनों को शव देने से इनकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन तो हैं, लेकिन उनको लागू कराने में स्वास्थ्य विभाग खुद बीमार नजर आता है।

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सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं बीमार, मरीज लाचार

सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बीमार होने के चलते मरीज और तीमारदार प्राइवेट इलाज कराने को लाचार हैं। कोरोना के इलाज को लेकर सोशल मीडिया पर आए दिन वायरल होने वाले वीडियो ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से विश्वास को बुरी तरह से हिला दिया है।

इसलिए जो साधन संपन्न हैं वह प्राइवेट इलाज को तरजीह दे रहे हैं। मेरठ में भी अब कोरोना संक्रमण के प्राइवेट इलाज की सुविधा का दावा किया गया है। हालांकि कुछ ऐसे भी हैं जो चोरी छिपे बगैर किसी टेस्ट के कोरोना का इलाज कर संक्रमण काल को अवसर में बदल कर नोट छाप रहे हैं।

प्राइवेट इलाज के बेहद खराब तजुर्बे

कोरोना के प्राइवेट इलाज कराने वालों की बात की जाए तो कुछ को बेहद खराब तजुर्बे हुए हैं। नाम न छापे जाने की शर्त पर एक शख्स ने बताया कि उनके बहन बहनोई दोनों कोरोना संक्रमित हो गए।

इसके बाद शहर के एक परिचित सीनियर चिकित्सक की मार्फत उन्होंने एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज की बात की तो सात से 10 दिन के इलाज का एक मरीज का 1.60 लाख का पैकेज बताया।

पैकेज के हिसाब से अस्पताल संचालक ने पूरा पैसा पहले ही जमा करा लिया। सात दिन बाद जब डिस्चार्ज का मौका आया तो काउंटर पर उन्हें और दो लाख का बिल थमा दिया गया।

जब इसका कारण पूछा गया तो बताया कि चादर, तकिया और कंबल भी मरीज ने मांगा था। जनरल वार्ड के बेड में ये चीजें शामिल नहीं होती हैं। इसलिए देना ही होगा। इसको लेकर काफी विरोध किया।

तमाम जगह बात की गयी, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। दो लाख की रकम जमा कर दी तब कहीं जाकर वार्ड से मरीज को बाहर आने दिया गया। यह एक घटना बानगी भर है। ऐसे दर्जनों घटनाएं हैं जो साबित करती हैं कि प्राइवेट अस्पतालों के लिए कोरोना महामारी कमाई सरीखे किसी उत्सव से कम नहीं।

15 से 20 लाख तक के पैकेज

कोरोना के प्राइवेट इलाज करने वाले अस्पतालों की बातें की जाए तो जानकारों का कहना है कि हाइप्रोफाइल छवि वाले अस्पतालों में तो कोरोना के इलाज के नाम पर 15 से 20 लाख तक के पैकेज दिए जा रहे हैं।

फाइव स्टार संस्कृति वाले मरीजों के रूम में सुविधा के नाम पर वो चीजें जबरन परोस दी जाती हैं। जिनका मरीज के इलाज से कोई वास्ता ही नहीं हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि मरीज को क्या दिया जा रहा है। इसकी जानकारी तक परिजनों को नहीं दी जाती। शहर के कई नामी डाक्टर ऐसे हाइप्रोफाइल प्राइवेट अस्पतालों की दलाली कर रहे हैं।

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