Sunday, May 3, 2026
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जिपं अध्यक्ष के लिए चौसर पर सजने लगी मोहरें

  • सपा-रालोद के लिए भितरघात सबसे बड़ी चुनौती
  • सत्ता का प्रभाव भाजपा के लिए जीत में बड़ा मददगार
  • सबकी निगाहें सर्वाधिक 6 निर्दलीय सदस्यों पर टिकी

जनवाणी ब्यूरो |

शामली: राजनीतिक दलों ने जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए चौसर पर अपने-अपने मोहरें सजाने प्रारंभ कर दिए हैं। 19 सदस्यीय बोर्ड में कहने को तो रालोद 5 सदस्यों के साथ सबसे बड़ा दल है। सपा के दो सदस्य भी रालोद के साथ आ जाते हैं तो फिर, उसको जीत का आंकड़ा हासिल करने के लिए सिर्फ 3 सदस्य चाहिए लेकिन दोनों दलों के सामने भितरघात सबसे बड़ी चुनौती है।

दूसरी ओर, भाजपा के भले ही चार सदस्य हों लेकिन सत्ता का प्रभाव जीत के लिए बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित होगा, इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। इन सबके बीच छह निर्दलीय प्रत्याशियों पर सपा-रालोद गठबंधन के साथ-साथ भाजपा की निगाहें भी जमी हुई हैं। असल मायनों में तो जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में निर्दलीय ही किंग मेकर साबित होंगे।

जनपद शामली में जिला पंचायत अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित हैं। जिला पंचायत के 19 वार्डों से इतने ही सदस्य जीत कर आए हैं। तीन अनुसूचित जाति की महिलाएं चुनाव जीती हैं। इनमें एससी महिला के लिए आरक्षित वार्ड-1 से सपा की अंजली तथा वार्ड-8 से बबली चुनाव प्रमुख हैं जबकि महिला के लिए आरक्षित वार्ड-14 से भाजपा की मधु ने विजश्री हासिल की है। अंजली की जीत में सपा के निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य ठा. शेरसिंह राणा योगदान है तो बबली ने अपनी मेहनत के बल पर चुनाव जीता है।

भाजपा के 4 सदस्य चुनाव जीते हैं। इनमें डा. नीरज सैनी तथा डोली राणा की जीत को कैबिनेट मंत्री ने अपने कोटे की जीत करार दिया है तो मधु तथा शैफाली चौहान की जीत गुर्जर क्षत्रप वीरेंद्र सिंह की जीत मानी गई हैं। इस तरह से सुरेश राणा तथा तथा वीरेंद्र सिंह के पाले में 2-2 जिला पंचायत सदस्य हैं।

राजनीतिक गलियारों में निर्दलीय बबली के अध्यक्ष पद की लालसा में कैबिनेट मंत्री सुरेश राणा के दरबार में दस्तक देने की चर्चाएं हैं। इस तरह से भाजपा के पास 5 सदस्य हो जाते हैं। हालांकि भगवा खेमे के संपर्क में रालोद के दो तथा सपा के सदस्य होने की खबरें हैं।

अगर मान भी लिया जाए तो यह आंकड़ा 8 पर पहुंच जाता है। ऐसे में बबली के बाद 5 शेष निर्दलीय का महत्व बढ़ जाता है। इन परिस्थियों के बीच भाजपा को सिर्फ सत्ता का लाभ जीत के आंकड़े तक पहुंचा सकता है।

दूसरी ओर, सपा और रालोद के 7 सदस्य हैं। इनके अलावा दो निर्दलीय पहले से ही सपा-रालोद गठबंधन के साथ बताए जा रहे हैं। इनमें एक ठा. शेरसिंह राणा की करीबी शमिष्ठा हैं तो दूसरे उनके मित्र अनिल टीनू की माता ओमवती हैं।

इनके अलावा दो निर्दलीय मुस्लिम गुर्जर भाजपा से दूरी के चलते सपा-रालोद गठबंधन के साथ आते हैं तो फिर गठबंधन के लिए जीत की मंजिल आसान हो जाएगी लेकिन, इसमें सबसे बड़ी चुनौती भितरघात है। इसलिए निर्दलीय दो मुस्लिम गुर्जर सदस्य अजीम व परवेज का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा।

…तो गुर्जर क्षत्रप साबित हो सकते हैं गेम चेंजर

राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। समय और परिस्थियां पासा पलट देते हैं। इन परिस्थितियों के चलते कई बार देश और प्रदेशों में सरकारें बनती और गिरती रही हैं। राजनीति गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर गुजर्र क्षत्रप चाहे तो जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में गेम चेंजर साबित हो सकते हैं।

साथ ही, उनके पास 13 वोट होंगी। फिर, मधु को जिला पंचायत अध्यक्ष बनने से कोई नहीं रोक सकता। इसके लिए उनको सिर्फ पुरानी राह पर लौटना होगा। वैसे भी संख्या बल के आधार सत्ता के खिलाफ भी चुनाव जीते जाते रहे हैं। 2015 को ही देख लें प्रसन्न चौधरी की पत्नी संतोष देवी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सपा के खिलाफ जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था।

दरअसल, पूर्व कैबिनेट मंत्री वीरेंद्र सिंह पहले राष्ट्रीय लोकदल में हुआ करते थे। सपा-रालोद गठबंधन की 2002 की प्रदेश सरकार में वे कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। 2012 में प्रदेश में सपा की सरकार तो बनी लेकिन वीरेंद्र सिंह चुनाव हार गए थे।

फिर भी, मुलायम सिंह का नजदीकी होने के कारण उनको न केवल राज्यमंत्री का दरजा मिला था बल्कि सपा कोटे से एमएलसी भी बनाया गया था। इतना ही नहीं, मनीष चौहान सपा के जिला पंचायत अध्यक्ष भी बने थे। हालांकि बाद में उनकी अखिलेश यादव से दूरियां बढ़ती चली गई। अंतत: 2019 में वीरेंद्र सिंह ने सीधे लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपने पुत्र मनीष चौहान के साथ मुलाकात सपा का दामन छोड़ दिया था।


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