Tuesday, April 21, 2026
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अफसरों की लापरवाही बनी पशु डेयरी संचालकों के लिए वरदान

  • शहर को राहत दिलाने के बजाय जिम्मेदारी से भाग रहे हैं तमाम विभाग
  • शहर के नाले नालियां ले रहे हैं अंतिम सांस प्रतिदिन लाखों लीटर अवैध जल दोहन

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सफाई व स्वच्छता के लिए नासूर बन चुकी पशु डेयरियों को लेकर अफसरों की लापरवाही संचालकों के लिए वारदान साबित हो रही है। यह स्थिति तो तब है जब यह मामला हाईकोर्ट में चल रहा है। कोर्ट लगातार तमाम विभागों के अफसरों पर चाबुक चला रहा है, लेकिन इस मामले में खुद की खामियों को दूर करने के बजाय उन पर पर्दा डालने और दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी डालने की प्रवृत्ति की कीमत शहरवासियों को चुकानी पड़ रही है।

डेयरियों से निकलने वाले गोबर व गंदगी से केवल नाले नालियां ही अंतिम सांस नहीं ले रहे हैं, बल्कि इन डेयरियों से प्रति दिन अवैध तरीके से लाखों लीटर जल का दोहन भी किया जा रहा है। शहर में संचालित की जा रही पशु डेयरियों को लेकर साल 1998 में सूबे के तत्कालीन मुख्य सचिव योगेन्द्र नारायण ने पशु डेयरियों को आबादी से बाहर किए जाने व उनके लिए कैटल कालोनी विकसित किए जाने का शासनादेश जारी किया था।

तब से अब तक करीब 24 साल होने को आए, तमाम अफसर आए और गए, लेकिन इस शासनादेश का अनुपालन करने के बजाय हालात बद से बदतर ही बनाने का काम किया। आज हालत यह हो गयी है कि आधा घंटे की बारिश से पूरा शहर टापू में तब्दील हो जाता है। इसके लिए कोई और नहीं बल्कि अवैध कब्जे और पशु डेयरियों से निकलने वाला गोबर है जिसकी वजह से नाले नालियां बंद हो गयी हैं।

पशु डेयरियों के खिलाफ ठोस अभियान चलाने का काम साल 2003 में तत्कालीन नगर स्वास्थ्य अधिकारी स. प्रेम सिंह ने जरूर किया था। आबादी से बाहर डेयरियों को खदेड़ने के लिए उन्होंने बीड़ा उठाया था। काफी काम उस दौरान हुआ था, लेकिन उनके बाद हालात और बदतर होते चले गए। नौबत यहां तक आ गई कि आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना सरीखोें को सक्रिय होना पड़ा कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

अब तक 16 पिटिशन

शहर में चल रही पशु डेयरियों के खिलाफ अब तक कुल 16 पिटिशन दायर की जा चुकी हैं। पहली पिटिशन लोकेश खुराना ने साल 2012 में दायर की थी। तब से अब तक इनकी संख्या 16 पर जा पहुंची है। अनेकों तारीख लग चुकी हैं, लेकिन तारीख पर तारीख से आगे बात नहीं बढ़ पा रही है। इसके लिए कोर्ट जिम्मेदार नहीं बल्कि वो अफसर जिम्मेदार रहे जिनको कोर्ट आदेश किया करती है।

ये हैं हालात

निगम अफसरों का कहना है कि डेयरी हटाने का काम प्रशासन का है। निगम केवल सफाई व्यवस्था देखता है। मेरठ विकास प्राधिकरण ने जमीन की अनुपलब्धता की बात कहकर गेंद जिला प्रशासन के पाले में डाल दी है। इसका सबूत प्राधिकरण के टाउन प्लानर का इस साल मार्च माह में लिखा गया पत्र है। जबकि जिला प्रशासन को उम्मीद है कि निगम व प्राधिकरण तथा पुलिस मिलकर शायद कुछ करें।

एक्शन के बजाय अफसर दिखा रहे पीठ

हाईकोर्ट के आदेश पर बजाय एक्शन के तमाम विभागों के अधिकारियों का रवैया अब तक पीठ दिखाने सरीखा रहा है। जिम्मेदारी की बात की जाए तो जिला प्रशासन के अलावा पुलिस, एमडीए व नगर निगम सरीखे विभाग के अफसरों का दायित्व बनता है। बजाय आगे बढ़कर समस्या से निपटने के एक-दूसरे के पाले में गेंद डाल रहे हैं।

पशु डेयरी संचालकों की चांदी

जो हालात बने हुए हैं उनमें पशु डेयरी संचालकों की चांदी ही चांदी है। शहर से बाहर खदेड़े जाने की वजह से जो डेयरी संचालक डरे हुए थे, उनके चेहरे खिले हुए हैं। अफसरों से कुछ होने वाला नहीं है। जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा। शहर में 22 सौ डेयरियां हैं इनमें करीब 22 से 25 हजार पशु हैं। इनका गोबर बहाने में अवैध रूप से जल दोहन किया रहा है।

ये कहना है डेयरी संचालकों का

डेयरी संचालकों का कहना है कि कोर्ट ने कैटल कालोनी विकसित कर पशु डेयरियों को वहां भेजे जाने के आदेश दिए हैं। सभी डेयरी मालिक कैटल कालौनी में जाने को तैयार हैं। अधिकारी बताएं कि किस जगह कैटल कालोनी विकसित की गयी है।

ये कहना है निगम प्रशासन का

नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. गजेन्द्र सिंह का कहना है कि डेयरी संचालकों को गोबर नाले नालियों में न बहाने की हिदायत दी गयी है। न मानने पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।

ये कहता है प्राधिकरण का पत्र

टाउन प्लानर प्राधिकरण के पत्र में कहा गया है कि जिला प्रशासन ने जगह चिन्हित कर ली है। जब जगह प्राधिकरण को सौंप दी जाएगी तो वहां कैटल कालोनी विकसित कर दी जाएगी। यानि गेंद प्रशासन व नगर निगम के पाले में।

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