Sunday, May 24, 2026
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विकास बनाम बेरोजगारी और महंगाई

NAZARIYA 3


BRIJESH PATHAKदेश में विकास काफी पीछे छूटता नजर आ रहा है। लगातार बढ़ती बेरोजगारी महंगाई नें आम जनता की कमर तोड़ दी है। देश के युवा भ्रमित हैं। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, मंहगाई सब के सब आसमान छू रहे है। पेट्रोल या गैस सिलेंडर की बात करें तो हर व्यक्ति मजबूरी में ही भरवाना पसंद करता है। अन्यथा कई नें गैस चूल्हे के बजाय लकड़ी वाले चूल्हे का इस्तेमाल शुरू कर दिया। देश के प्रधानमंत्री महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते हैं। उज्जवला योजना के माध्यम से महिलाओं के हाथ से कालिख छुड़ाने का वादा किया था। इसके लिए ही मुख्य रूप से उज्जवला गैस योजना चलायी गयी थी। दूसरी तरफ महंगाई की वजह से उज्जवला गैस का सिलेंडर भी नही भरवाया जा रहा है। पेट्रोल डीजल की कीमत बढ़ने के कारण ट्रांसपोटेशन खर्च बढ़ गया है। जिसका परिणाम यह हुआ कि सभी जरूरत के सामान का मूल्य 40 से 50 रुपये बढ़ गया। देश में जहां चुनाव सिर पर हैं, देश के 5 राज्यों मे चुनाव है।

संभव है कि चुनाव बाद महंगाई और भी बढ़ेगी। देश की आधी से ज्यादा आबादी बेरोजगार ही है। लेकिन बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकार के पास ऐसा कोई मास्टर प्लान नजर नहीं आ रहा है, जिससे आम जनता का भला हो सके।
भारत कुछ सालों पहले विकसित देशों की श्रेणी में पहुंचने के लिये जद्दोजहद कर रहा था।

परंतु आज भारत हंगर इंडेक्स में पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और बंगलादेश से भी नीचे चला गया। मतलब अब देश विकासशील देशों की श्रेणी से भी बाहर होकर अल्प विकसीत देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है। जहां 2014 के बाद बड़े बड़े सपने दिखाए गए।

बेरोजगारी समाप्त करने, बुलेट ट्रेन, टोकियो जैसे शहर की अवधारणा विकसित की गई है। चमचमाती सड़कों की कल्पना, बनारस को टोकियो में परिवर्तन के सपने दिखाए गए। लेकिन 2022 में अब आपको अनुमान नहीं लगाना है।

सिर्फ 2014 के विकास का डाटा और 2022 का डाटा सामने रखकर विचार करना है कि परिवर्तन किन-किन क्षेत्रों मे हुआ है। बिना लाग लपेट, बिना अवधारण के सिर्फ आम नागरिक की भावना रखकर देखिए। क्या परिवर्तन हुआ। देख सकते हैं कि देश में विकास के सारे पैमाने ध्वस्त हो गए। देश में विकास तो दूर अब लोग जीविका बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इस समय देश के कई सारे उपक्रमों को चिन्हित किया गया जिन्हें बेचा सकता है या प्राइवेट हाथों सौप दिया गया है। हम जहां बेरोजगारी भूखमरी के गहरे खड्ड में पूरी तरह से धाराशाही हो गए। दूसरी तरफ देश में चुनावी घोषणा पत्रों और सपने सिर्फ गुब्बारे के रूप में ही नजर आए।

सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांव अब खेलने कूदने चाहिए थे। परंतु गावों की दशा थोड़ा बहुत इधर-उधर के अलावा और कुछ संभव नहीं हो सका। स्मार्ट सिटी की बात करें तो देश के स्मार्ट शहर सिर्फ विज्ञापन में ही नजर आ रहे हैं।

हालांकि देश के कई क्षेत्रों मे सरकार ने लोगों तक सहायता पहुंचाई। किसानों के साथ-साथ अन्य कई लोगों को सब्सिडी प्रदान की गई। कोरोना काल में सरकार ने आम नागरिकों को सहायता पहुंचायी परंतु वह भी पर्याप्त नहीं थी।

देश में विभिन्न राजनीतिक दलों की बात करें। आज देश में कई प्रकार की विचारधाराओं का उद्भव हो चुका है। हिंदू-मुस्लिम, जाति-धर्म आदि संकुचित विचार तेजी से पल्लवित हो रहे हैं।

विकास नामक शब्द भी आजकल कभी कभार ही सुनने को मिलता है। विकास के पहले सुशासन भी कुछ इसी भांति नजर आई थी। अभी कुछ दिनों पहले की बात करें तो एक निजी पोर्ट से 21000 करोड़ की ड्रग्स पकड़ी गई।

परंतु किसी ने कोई सवाल नहीं किया। जबकि आर्यन या फिल्म इंडस्ट्री इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि पल पल की सारी अपडेट लगातार हमारे मीडिया के साथी प्रदान करते रहे। पर्रंतु किसी ने महंगाई, बेरोजगारी पर सवाल नहीं किया। देश में लगातार सामाजिक राजनीतिक विभाजन की नई नई रेखाएं खींची जा रही हैं।

लेकिन बोलने वाला कौन है…? कसान कई महीनों से सड़क पर हैं। देश के अन्नदाता का सड़क पर होना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। देश की राजनीति में पूजीपतियों का बढ़ता हस्तक्षेप कहीं देश को पुन: किसी संकट में न डाल दे।

देश में कहीं विकास भले ही स्पष्ट आंखों से नजर न आए, लेकिन आईटी सेल ने ऐसी भूमिका बांध रखी है, जैसे की देश में चौमुखा विकास हुआ है। हां, हम जरूर कह सकते हैं देश में निर्णय लेने की क्षमता बलवती जरूर हुई है।

वैदेशिक मामलों में देश का कद बढ़ा है। परंतु देश की अर्थव्यवस्था संकट से गुजर रही है। देश में बढ़ रही महंगाई पर सरकार को तत्काल प्रभाव से लगाम लगाया जाना चाहिए। क्योंकि आम जनता के लिए अपनी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो रहा है।

भले ही चारों तरफ जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे हों, लेकिन सच्चाई से आप कब तक मुंह मोड़ सकते हैं। सरकार को महंगाई समय रहते नजर आनी चाहिए। अगर देश की अर्थव्यवस्था इसी तरह डांवाडोल रही तो विश्व में साख पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा।


SAMVAD

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