Monday, March 23, 2026
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नर्सरी राजकीय, प्राइवेट लोगों को बेचते हैं पौधे

  • न तो काटी जा रही रसीद और न ही राजकीय कोष में जा रही धनराशि

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सर्किट हाउस में उद्यान विभाग की राजकीय नर्सरी हैं। नर्सरी से एक पौधा भी यहां से बाहर जाएगा तो सरकारी रसीद कटेगी, जिसकी धनराशि राजकीय कोष में जमा होगी। नियम तो यहीं कहता हैं, मगर यहां पर बड़ा खेल चल रहा है। नर्सरी राजकीय हैं, लेकिन जेब प्राइवेट भरी जा रही है।

राजकीय कोष में फूटी कोड़ी भी जमा नहीं कराई जा रही है। यह हाल तो वीवीआईपी सर्किट हाउस की राजकीय नर्सरी का है, जहां पर हर रोज आला अफसरों का आना-जाना लगा रहता हैं। किसी भी समय अधिकारी निरीक्षण भी कर सकते हैं, लेकिन इससे उद्यान विभाग के अधिकारी व कर्मचारी कतई घबराते नहीं है। इससे स्पष्ट है कि यह पूरा खेल अफसरों के भी संज्ञान में हैं। क्या इसके जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी?

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सर्किट हाउस कैंपस में राजकीय नर्सरी हैं। एंट्री करते ही बाये हाथ पर बड़े स्तर पर नर्सरी की जा रही है। इसमें प्रत्येक मौसम के फूलों के पौधे मिल जाएंगे। सब्जी की पौध भी तैयार की जाती हैं। सर्दी के मौसम से पहले से ही पौध यहां फूलों की तैयार की जाती हैं, जो लाइन लगाकर प्राइवेट लोगों को बेची जाती है।

इसकी कोई रशीद नहीं काटी जाती। प्राइवेट लोगों से पैसा तो लिया जाता हैं, लेकिन राजकीय कोष में यह जमा ही नहीं किया जाता। इस तरह से राजकीय कोष को चोट पहुंचाई जा रही है। राजकीय नर्सरी में ‘जनवाणी’ टीम पहुंची तो वहां पर बड़ी तादाद में प्राइवेट लोग फूलों की पौध खरीद रहे थे। दस से बीस रुपये के पौधे बेचे जा रहे थे। प्राइवेट लोगों से यह धनराशि ली भी जा रही थी, लेकिन इसकी रशीद किसी को नहीं दी जा रही थी।

बड़ी तादाद में यहां से पौधे खरीदने के लिए प्राइवेट लोग आ रहे थे। कहा जा रहा था कि वर्षों से पौधे खरीदने के लिए यहां लोग पहुंचते हैं। सरकारी खजाने से खर्च करने के बाद प्रत्येक वर्ष पौध तैयार की जाती हैं, लेकिन बाद में इस पौध को प्राइवेट लोगों को बेच दिया जाता है। इसमें पर्दे के पीछे रखते हुए कितनी धनराशि कागजी पेट भरने के लिए दिखाई जाती है, यह भी कुछ पता नहीं हैं।

जब राजकीय नर्सरी है तो मौके पर ही रशीद काटकर क्यों नहीं दी जाती हैं? प्राइवेट महिलाएं इसमें काम करती रहती हैं, वहीं पैसा भी ले लेती है और पौधे बेच देती है। बुधवार को तो कुछ वैसा ही चल रहा था। एक-दिन नहीं, बल्कि हर रोज इसी तरह से पौधों की बिक्री यहां की जाती हैं। सरकारी खजाने में धनराशि जमा की भी जाती है या फिर नहीं? इसका कुछ पता नहीं है।

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