- रिश्वत का वायरस, सब काम आॅनलाइन फिर भी सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार चरम पर
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: तहसील में व्याप्त भ्रष्टाचार के सामने फरियादी लाचार और बेबस होते दिखाई दे रहे है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए घूस लेने और देने वालों पर कार्रवाई के लिए भले ही सूबे की सरकार कानून बना चुकी है। मगर इसके बावजूद तहसील में भ्रष्टाचार का बोलबाला है।
तहसील में जड़ जमा चुके लेखपालों के तिलिस्म को तोड़ने में सरकारी तंत्र पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। तहसील में भूमि की नपाई हो या फिर वसीयत का मामला, विवादित भूमि की रिपोर्ट हो या फिर तालाब, सरकारी भूमि पर कब्जे की शिकायत इस तरह के मामले आते ही लेखपालों के मुंह मांगी मुराद मिल जाती है।
इतना ही नहीं किसी को चरित्र प्रमाण पत्र बनवाना हो या आय जाती प्रमाण पत्र सभी के लिए वैसे तो आॅनलाइन आवेदन किए जाते हैं, लेकिन सभी जांच तहसील स्तर पर की जाती है, लेकिन बिना रिश्वत ये जांच आगे नहीं बढ़ पाती है। वहीं, वृद्धा पेंशन हो या विधवा पेंशन, कन्या की शादी समेत ढेरों योजनाओं के लिए आवेदन किए जाते हैं, वह भी बिना रिश्वत नहीं होते न ही उनका लाभ मिलता। पीड़ितों को जांच कराने तक के लिए तहसील के चक्कर लगाने पड़ते हैं और अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहते हैं।
चरित्र प्रमाण पत्र और हैसियत प्रमाण पत्र बनवाने को लोगों को लगाने पड़ते हैं चक्कर
तहसील में कहने को तो दलालों का कब्जा है, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि अधिकारियों के अर्दली ही सबसे बड़े दलाल बने हुए हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का हाल तो यह है कि वह पटवारी, नायक तहसीलदार और तहसीलदार के फाइल पर हस्ताक्षर कराने के लिए पहले तो चक्कर लगाते हैं और उसके बाद वह लोगों के साथ पैसों की सेटिंग-गेटिंग करते हैं यदि किसी को चरित्र प्रमाण पत्र बनवाना है तो उसके लिए दो से ढाई हजार रुपये और हैसियत प्रमाण पत्र के लिए वह 5 से 10 हजार रुपये की वसूली कर रहे हैं। अधिकारियों को इसके बारे में जानकारी तक नहीं है। सदर तहसील में यह सबकुछ रामभरोसे ही चल रहा है।

