
इंसानियत का जबरदस्त तकाजा है कि हजारों बेगुनाह इस्राइली नागरिकों का कत्ल ओ गारत अंजाम देने वाली हमास तंजीम और गाजा पट्टी में इस्राइल हुकूमत द्वारा अंजाम दिए जा रहे भीषण नरसंहार की विश्वव्यापी निंदा और भर्त्सना की जानी चाहिए थी। किंतु विश्व पटल पर, यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के विराट पटल पर ऐसा कुछ भी संभव नहीं हो सका है। अमेरिका सहित पश्चिम पूर्णत: इस्राइल द्वारा गाजा पट्टी में अंजाम दिए जा रहे भीषण नरसंहार के समर्थन में खड़ा हो गए हैं। तकरीबन तेईस लाख आबादी वाली तकरीबन 40 किलोमीटर लंबी और 9 किलोमीटर चौड़ी है गाजा पट्टी। गाजा पट्टी पर इस्राइल के सैन्य आक्रमण की दास्तान नृशंसता और बर्बरता की सारी हदों को पार कर चुकी हैं। इस्राइल फौज द्वारा हमलावर हमास तंजीम का सफाया अंजाम देने के नाम पर गाजा में रहने वाले फलिस्तीन नागरिकों का नृशंस नरसंहार अंजाम दिया जा रहा है। 21 वीं सदी में गाजा पट्टी में बर्बरता परिपूर्ण नृशंस नरसंहार की संभवतया पहली सैन्य मिसाल बन चुकी है। इससे पहले 20 वीं सदी में जर्मनी में नाजी तानाशाह हिटलर द्वारा 60 लाख यहूदियों का नृशंस नरसंहार अंजाम दिया गया था। इसके पश्चात बोस्निया और रवांडा में सैन्य नरसंहार अंजाम दिया गया था। गाजा में हलाक किए जाने वाले फलस्तीनियों में सत्तर फीसदी बच्चे और महिलाएं हैं। इक्कीसवीं सदीं में नृशंस नरसंहार का सबसे अधिक बर्बर कारनामा इस्राइल हुकूमत द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।
गाजा के आम बेगुनाह नागरिकों की हिफाजत के लिए अभी तक कोई देश कुछ भी नहीं कर सका है। संयुक्त राष्ट्र महासभा तो जॉर्डन द्वारा पेश किए गए युद्ध विराम के प्रस्ताव तक को पारित नहीं कर सकी है। अमेरिकन सरकार ने जिस दिन शांति स्थापना की अपील जारी की, उसी दिन हथियारों की एक बड़ी खेप अपने दो नेवलशिप्स के साथ इस्राइल के लिए रवाना कर दी गई। विडंबना है मध्य पूर्व के बाईस अरब राष्ट्र गाजा पट्टी में निरंतर जारी भीषण नरसंहार की महज निंदा करने तक खुद को सीमित रखे हुए हैं। अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण तौर पर विश्व को शांति और सद्भाव का प्रबल पैगाम देने वाले भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र में पेश किए गए युद्ध विराम प्रस्ताव पर बैठक का बहिष्कार कर दिया। भारत सरकार ने फिलिस्तीनियों के प्रति अपनी सदाशयता प्रदर्शित करते हुए भारी मात्रा में सहायता सामग्री भेज दी है। यह कैसा वीभत्स आलम है कि समस्त विश्व शक्तियां गाजा पट्टी में जारी नृशंस नरसंहार का केवल नजारा देख रही हैं।
इस्राइल बनाम फलस्तीन के जटिल प्रश्न पर अमेरिकी की कयादत में पश्चिमी देशों का घनघोर पाखंडी आचरण वर्ष 1947 से ही बदस्तूर जारी रहा है, 1947 में फलस्तीन की सरजमीन विभाजन करके केवल सात प्रतिशत आबादी वाले यहूदियों को फिलिस्तीन की सरजमीं का 55 फीसदी हिस्सा प्रदान कर दिया गया और तिरानवे फीसदी फिलिस्तीनियों को महज 45 फीसदी जमीन प्रदान की गई थी। 14 मई 1948 में इजरायल ने अपने अस्तित्व में आने के साथ ही साथ पड़ोसी अरब देशों के विरुद्ध एक विकट जंग जीत कर फिलिस्तीन के 75 फीसदी भूभाग पर अपना प्रबल आधिपत्य स्थापित कर लिया था। 1967 की अरब-इस्राइल जंग के दौर में इस्राइल ने पड़ोसी अरब देशों के बड़े भू-भाग को हथिया लिया था।
1964 से इस्राइल के विरुद्ध फलस्तीनियों का सशस्त्र प्रतिरोध फलस्तीन लिबरेशन आॅगेर्नाइजेशन (पीएलओ) और यासिर अराफत के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ। पीएलओ को तत्कालीन सोवियत संघ सहित भारत एवं अन्य साम्राज्यवाद विरोधी देशों की जोरदार हिमायत हासिल हुई। प्रबल समाजवादी तेवर के लीडर यासिर अराफत ने सशस्त्र पीएलओ को वस्तुत: एक धर्मनिरपेक्ष तंजीम के तौर पर खड़ा किया था। सन् 1974 से पहले पश्चिमी देशों द्वारा पीएलओ को भी आतंकवादी तंजीम करार दिया जाता था। संयुक्त राष्ट्र द्वारा फलस्तीन के प्रतिनिधि के तौर पर पीएलओ को सदस्यता प्रदान कर देने के तत्पश्चात पीएलओ से आतंकवादी तंजीम होने की तोहमत स्वत: ही हट गई थी। अब को हमास को भारत सहित अनेक राष्ट्रों द्वारा आतंकवादी तंजीम नहीं माना जाता है। जबरदस्त सैन्य ताकत के तौर पर पीएलओ के उभार के परिणामस्वरूप अमेरिका के प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन द्वारा इजरायल और फिलिस्तीन के मध्य सन् 1993 में कैंप डेविड समझौता संपन्न कराया गया। कैंप डेविड समझौते के तहत फिलिस्तीनियों को वैस्ट बैंक और गाजा पट्टी पर स्वायत्त शासन का अधिकार हासिल हुआ। अंतत: कैंप डेविड समझौते को इस्राइल हुकूमत द्वारा नकार दिया गया और फिलिस्तीनियों को अभी तक एक स्वतंत्र और खुदमुख्तार राष्ट्र कदाचित प्राप्त नहीं हो सका।
इस्राइल के जुल्म ओ सितम के विरुद्ध 1985 से प्रारम्भ हुए प्रथम इंतिफादा संघर्ष के दौर में कट्टर इस्लाम से प्रेरित हमास तंजीम का उदय हुआ। पीएलओ और यासिर अराफत को कमजोर करने की नीयत से शुरूआत में हमास तंजीम को इजरायली खुफिया ऐजेंसी मोसाद द्वारा भरपूर समर्थन प्रदान किया गया। सन् 2004 में यासिर अराफत की मृत्यु के तत्पश्चात गाजा के फलिस्तिनियों के मध्य पीएलओ शनै: शनै: शक्तिहीन होता चला गया और कट्टरपंथी हमास निरंतर शक्तिशाली होता गया। गाजा की स्थानीय फिलिस्तीन अथॉरिटी पर पीएलओ को बाकायदा पराजित करके हमास ने अपना कब्जा जमा लिया है। पीएलओ केवल वैस्ट बैंक इलाके में ताकतवर रह गया है, जहां पर फिलिस्तीन अथॉरिटी के प्रेसिडेंट पीएलओ लीडर महमूदअब्बास हैं
फलिस्तीन की हमास और हिजबुल्ला तंजीमों को ईरान की खुली हिमायत हासिल रही है। कतर भी हमास का मददगार मुल्क रहा है। अमेरिका और पश्चिम के देशों द्वारा हमास द्वारा इस्राइल के तकरीबन चौदह सौ आम नागरिकों के कत्ल ओ गारत की तो निंदा बाकायदा अंजाम दी गई किंतु इनके द्वारा गाजा पट्टी पर जारी भीषण नरसंहार का सक्रिय समर्थन जारी है। इस्राइल हुकूमत द्वारा गाजा में इंसानियत का बेरहम कत्ल कथित उन्नत और सभ्य पश्चिमी राष्ट्रों की अंध हिमायत के बलबूते पर ही किया जा रहा है। मानव इतिहास संभवतया सबसे अधिक जुल्म ओ सितम झेलने वाली कौम यहूदी रहे हैं। यहूदियों के इस्राइली लीडरान इक्कीसवीं सदी में बेगुनाह फलस्तीनियों का ऐसा ही नरसंहार अंजाम दे रहे हैं, जैसा नृशंस नरसंहार यहूदियों का इतिहास में किया गया था। इस्राइल हुकूमत के हेरिटेज मंत्री महोदय इमयारइलियाहू फरमाते हैं कि गाजा पट्टी पर न्यूक्लियर बम इस्तेमाल करने का विकल्प संभव है। फिलहाल उनकी इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिननेतन्याहू द्वारा सरकार से निलंबित कर दिया गया है। किंतु यह बयान इशारा करता है इस्राइल हुकूमत के अंदर वहशियाना सोच कितनी दरिंदगी से परिपूर्ण है। अमेरिकन हुकूमत जिसके इशारे पर इस्राइल हुकूमत सैन्य कार्रवाई अंजाम देती रही है गाजा में युद्ध विराम को कदाचित समर्थन नहीं दे रही है। क्या समझ लिया जाए कि अमेरिका भी अप्रत्यक्ष तौर पर गाजा नरसंहार में शामिल है।


