Tuesday, January 25, 2022
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प्रवासी पक्षी कुरंजा पर बर्ड फ्लू का संकट

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हर वर्ष साइबेरिया और मंगोलिया से हजारों किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर प्रवासी पक्षी कुरंजा (डेमोसाइल क्रेन) शीतकालीन प्रवास पर राजस्थान आते हैं। इस बार भी शीतकालीन प्रवास पर कुरंजा बड़ी संख्या में राजस्थान आए हैं। राजस्थान के जोधपुर जिले का खींचन स्थल कुरंजा के लिए बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन इस बार दुखद खबर यह सामने आ रही है कि जोधपुर जिले के कई स्थलों पर कुरंजा पक्षी मौत का शिकार हो रहे हैं। जोधपुर जिले के कापरड़ा, ओलवी एवं रामासनी जैसे क्षेत्रों में अब तक 150 से अधिक कुरंजा पक्षियों की मौत हो गई है। वहीं जोधपुर से सटे पाली जिले में भी इन पक्षियों की मौत हुई है। पाली जिले के सरदारसमंद में शुक्रवार को करीब दस कुरंजा की मृत्यु हो चुकी है। जोधपुर जिले में 6 नवंबर से 22 नवंबर के मध्य जलाशयों के आसपास 230 कुरंजा पक्षी मृत अवस्था में और 57 गंभीर घायल अवस्था में मिले। जिनमें से उपचार के दौरान 56 की मौत हो गई। इन सब के बीच यह तथ्य कम चौंकाने वाला नहीं है कि जोधपुर जिले के खींचन में करीब 20 हजार से अधिक कुरंजा पक्षी पहुंचे हैं, परंतु यहां एक भी मौत नहीं हुई है।

गौरतलब है कि जोधपुर जिले के कापरड़ा सेज के लवणीय क्षेत्र में दीपावली के दिन से कुरंजा की मौत का शुरू हुआ सिलसिला फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है।

जबकि यह सिलसिला देवली नाडा, रामासनी तालाब, चांदीलाव, ओलवी, मामा नाडा बासनी आदि जलाशयों तक जा पहुंचा है। ऐसे में यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया कि आखिर कुरंजा पक्षी की मौत का कारण क्या है?

शुरुआत में कुरंजा के पोस्टमार्टम के बाद बीमार पक्षियों का इलाज रानीखेत बीमार मानकर किया जा रहा था। लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हाई सिक्योरिटी एनिमल्स डिजीज भोपाल की रिपोर्ट में जोधपुर जिले के कापरड़ा में मरी कुरंजा में बर्ड फ्लू होने की पुष्टि हुई है।

पिछले सप्ताह इन पक्षियों के बीमार पड़ने एवं मरने का सिलसिला शुरू होने पर जांच के लिए मृत कुरंजा के नमूने भोपाल भेजे गए थे। जोधपुर माचिया बायोलॉजिकल पार्क के डॉक्टर ज्ञान प्रकाश ने बताया कि भोपाल से शुक्रवार को प्राप्त हुई रिपोर्ट में एवियन इनफ्लुएंजा वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई है, जो एच-5 एवं एन-1 प्रकार का है।

उन्होंने बताया कि बर्ड फ्लू की पुष्टि होने के बाद कुरंजा वाले क्षेत्रों में आम लोगों को दूर रखने, बीमार कुरंजा के इलाज एवं मृत पक्षियों के निस्तारण के दौरान वहां काम में लगे चिकित्सक सहित अन्य लोग पीपीई कीट पहनने तथा अन्य जरूरी सावधानी बरती जा रही है।

अब सवाल यह कि खींचन क्षेत्र में एक भी कुरंजा की मौत नहीं हुई है लेकिन अन्य क्षेत्रों में कुरंजा पक्षी के मौत के मामले क्यों सामने आ रहे हैं? इस सवाल के जवाब में विशेषज्ञों की मानें तो जोधपुर एवं पाली जिले में हजारों की संख्या में पहुंचने वाले कुरंजा पक्षियों का उड़ान भरने का रूट बिलकुल अलग-अलग है।

खींचन में पहुंचने वाली कुरंजा मंगोलिया से अलग रूट होकर आते हैं? जबकि अन्य कुरंजा के समूह उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अफगानिस्तान व पाकिस्तान में कुछ दिनों तक पड़ाव डालने के बाद जोधपुर पहुंचते हैं। उड़ान व पड़ाव के दौरान बीमारी पक्षियों में प्रवेश कर सकती है।

लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल कि आखिर हम मेहमान परिंदों की सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? राजस्थान में प्रवासी पक्षियों के जीवन पर संकट का यह कोई पहला मामला नहीं है, सांभर झील में पिछले वर्ष सैकड़ों पक्षियों की मौत की खबर आई थी।

आज बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण वजह से जलवायु परिवर्तन का संकट खड़ा हो गया है। पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में जीव-जंतुओं की अहम भूमिका है। लेकिन मनुष्य के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण इन सभी के जीवन पर संकट खड़ा हो गया है।

कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से पक्षियों की संख्या लगातार कम हो रही है। कुछ प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। खेतों में कीटनाशकयुक्त बीजों का प्रयोग पक्षियों के लिए सर्वाधिक नुकसानदायक है। इसे खाने से पक्षी विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।

यह बात सही है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ कर रहा है, इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। हालांकि पर्यावरणविदों का कहना है कि यह दुष्परिणाम लंबी अवधि के होते हैं और अभी जो नजर आ रहे हैं वे सौवें हिस्से के बराबर है।

आज हम धीरे-धीरे करके पारिस्थितिकी तंत्र को खराब करते जा रहा है। जैसा कि पारिस्थितिकी तंत्र में हर जीव जन्तु की अहम भूमिका होती है। इसके खराब होने का असर हर क्षेत्र में दिखाई पड़ रहा है।


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