Wednesday, June 16, 2021
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बिस्मिल ने शायरी से लिखी इंकलाब की इबारत

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यदि देशहित में मरना पड़े मुझको सहस़्त्र बार भी, तो भी न इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊं कभी। हे ईश! भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो, कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो’…जेल की कोठरी में लिखी अपनी आत्मकथा मे फांसी से तीन दिन पहले ऐसी पंक्तियां लिखकर, अपनी शहादत को भी शायराना बनाने वाले ये असाधारण वीर पुरुष थे ‘रामप्रसाद‘। जी हां! वही.. काकोरी नायक, जो बंदूक के साथ ‘पंडित रामप्रसाद’ तो कलम के साथ ‘बिस्मिल’ के नाम से जाने जाते हैं। वही…जो कहते थे कि मेरा दृढ विश्वास है कि मै नई शक्ति के साथ पुन: भारतवर्ष के किसी घर में जन्म ग्रहण करूंगा, ताकि भारत माता को आजाद करा सकूं। वही…जिनके लिए शहीद भगत सिंह ने कहा था कि बिस्मिल अगर किसी और देश व समय में पैदा होते तो निष्चित ही सेनाध्यक्ष होते। वही… जिन्होंने एक ओर काकोरी घटना को अंजाम देकर अंग्रेजी साम्राज्य की चूलें हिला दीं, वहीं दूसरी ओर ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ जैसी कालजयी पंक्तियां लिखीं, जो पिछले 93 वर्षों से हमारे दिलों में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर रही हैं।

1897 में आज ही के दिन यानि 11 जून को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर मे जन्मे क्रांतिकारी रामप्रसाद के बारे में यह तो सभी जानते हंै कि अंग्रेजों ने ऐतिहासिक काकोरी कांड मे मुकदमे के नाटक के बाद 19 दिसंबर 1927 में उन्हे फांसी चढ़ा दिया, लेकिन बहुत कम लोग इस सरफरोश क्रांतिकारी के दूसरे रूप यानि एक संवेदनशील कवि, शायर, साहित्यकार इतिहासकार के साथ एक बहुभाषा अनुवादक को जानते हैं, और यह भी कि लेखन के लिए उनके ‘बिस्मिल’ के अलावा दो और उपनाम थे, ‘राम’ और ‘अज्ञात’।

बिस्मिल को अधिकांश लोग 1925 के काकोरी ट्रेन कांड मे उनके अभूतपूर्व साहस से ही अधिक जानते हैं, पर उससे बहुत पहले 1918 में उनके द्वारा मैनपुरी में एक कारनामा किया गया था। जिसमें उनके ‘मातृदेवी’ संगठन ने चंबल के पंचम सिंह से मिलकर 1857 की तरह क्रांति करने के तहत 500 घुड़सवारों, 200 पैदल सैनिकों व लाखों रुपये का कोष बनाकर सवेतन संगठन तैयार किया था। परंतु एक देशद्रोही की सूचना पर अंग्रेजों ने इन्हें घेर लिया और दिसंबर 1918 में भीषण संघर्ष में 50 अंग्रेज व 35 क्रांतिकारी मारे गए। रामप्रसाद बिस्मिल उस समय पकड़े नहीं गए, परंतु गेंदालाल दीक्षित व अन्य प्रमुख क्रांतिकाारी पकडे गए और यह संस्था लगभग समाप्त हो गई। यह पहली ऐसी क्रं्रातिकारी घटना थी जो पूर्ण रूप से उत्तर प्रदेश के युवकों द्वारा संचालित थी।

मैनपुरी की घटना के बाद इनके खिलाफ भी वारंट था। अत: ये वेश बदलकर घूमते रहे। इसी समय इन्होंने अनेक पुस्तकें व कविताएं लिखीं। जिनमें ‘अमेरिका का स्वाधीनता इतिहास’ ‘बोल्शेविकों की करतूत’, ‘यौगिक साधना’, ‘कैथेराइन-स्वतंत्रता की देवी’,‘जार्ज वाशिंगटन की जीवनी’ तथा कविता संग्रह ‘मन की लहर’, ‘स्वदेशी रंग’ प्रमुख हैं। उनका कहना था कि कुछ कविताएं मुश्किल समय में जादू का काम करती हैं। ऐसा हुआ भी, इनकी लिखी उर्दू कविता ‘जज्वये-शहीद’ क्रांतिकारियों मे बहुत प्रसिद्ध रही। इसका एक बड़ा प्रसिद्ध वाकया देखने को मिलता है। 1930-31 में लाहौर षडयंत्र केस की सुनवाई में एक नौजवान प्रेमदत्त ने एक दिन अदालत में इसकी पंक्तियां ‘हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर, हमको भी पाला था मां-बाप ने दु:ख सह-सहकर। सर फिदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं, पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं। खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफर करते हैं।’ गाकर सुनाई तो वहां मौजूद हरएक शख्स की आंखें भीग गर्इं और न्यायाधीश को भी अपना फैसला बदलकर प्रेमदत्त की सजा कम करनी पड़ी।

1923 में बिस्मिल ने शचींद्र नाथ सान्याल, जोगेशचंद्र चटर्जी के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ का गठन किया। 1 जनवरी 1925 को दल का संविधान व भविष्य के भारत को लेकर 4 पृष्ठों का एक पीला पैम्फलेट ‘दि रिवोल्यूशनरी’ के नाम से पूरे भारत में बांटा गया। इसमें उन्होंने जातिवाद, क्रांति, आर्थिक असामनता, शोषण, शिक्षा व लोकतंत्र आदि पर दल की नीतियां स्पष्ट की थीं। वे कहते भी हैं, ‘दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा, एक बार जमाने को आजाद बना दूंगा। बेचारे गरीबों से नफरत है जिन्हें, एक दिन मैं उनकी अमीरी को मिट्टी में मिला दूंगा।’ हिंदू-मुस्लिम एकता के बारे में वे कहते हैं, ‘अशफाकउल्ला अगर मुसलमान होकर भी आर्यसमाजी रामप्रसाद के दाहिने हाथ बनकर क्रांति कर सकते हैं तो क्या भारतवर्ष के हिंदू मुसलमान अपने फायदों का ख्याल छोड़कर एक नहीं हो सकते। हिंदू-मुस्लिम एकता ही हम लोगों की यादगार और अंतिम इच्छा है।’

काकोरी ट्रेन डकैती के बाद वे पकड़े गए और 18 महीने तक चली मुकदमे की नाटकबाजी के बाद जब उन्हे फांसी की सजा का पता चला तो उन्होंने बड़े खूबसूरत अंदाज में अपनी मौत का स्वागत करते हुए लिखा था, ‘बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से, लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से। लबे दम भी न खोली जालिमों ने हथकड़ी मेरी, तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।’ फांसी पर जाते बिस्मिल की आग उगलती पंक्तियों ने क्रांतिकारियों के खून में उबाल ला दिया। उन्होंने कहा, ‘मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे, बाकि ना मैं रहूं ना मेरी आरजू रहे। जब तक कि तन मे जान रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।’ फिर अंतिम इच्छा पूछने पर यह महानायक दहाड़ता है, ‘मेरी अंतिम इच्छा है कि अंगे्रजी साम्राज्य का पूर्ण नाश हो।’ यह कहकर यह महान सेनानी फांसी पर झूल गया।


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