
लोकसभा चुनाव के परिणामों में जैसे-तैसे एनडीए गठबंधन की मोदी सरकार बनने की तस्दीक हो गई है। हालांकि ये चुनाव परिणाम न तो एनडीए के लिए सुखद कहे जा सकते हैं और ना ही भाजपा के लिए। एनडीए का चार सौ पार का नारा था, जिसकी हवा निकल गई है। भाजपा को भी अकेले अपने दम पर सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला है। 2019 के मुकाबले एनडीए को करीब 55 से अधिक सीटों का नुकसान हुआ है। भाजपा को भी करीब 60 सीटों का नुकसान होता दिखाई दे रहा है। हालांकि इतना तय है कि नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। हालांकि पीएम मोदी से जनता की नाराजगी नहीं है, लेकिन इस परिणाम की न तो एनडीए को उम्मीद होगी और न ही भाजपा को। अब मंथन का दौर तो चलेगा, लेकिन असल बातों पर मंथन होगा या नहीं, ये देखना बाकी रहेगा। आखिर एनडीए और भाजपा से कहां चूक हुई, इस पर कुछ चर्चा करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं मुद्दों की। भाजपा ने पिछले दस साल लगातार सत्ता में रहने से पहले कुछ वादे किए थे, जिनमें अधिकतर पूरे नहीं हुए। इनमें विदेशों से काला धन लाने का वादा पूरा नहीं हुआ। वहीं हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा भी अधूरा ही रहा। परिणामस्वरूप बेरोजगारी बढ़ती ही गई। महंगाई को रोकने की दिशा में अपेक्षाकृत बहुत काम किया जाना था, लेकिन नहीं किया गया। बड़े विकास के काम तो हुए, लेकिन गांवों में छोटे विकास कामों के लिए लोगों को आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। बिजली और पानी जैसी समस्याएं बरकरार हैं। पीएम मोदी का जिन भ्रष्ट नेताओं को जेल में डालने का वादा था, उनमें अधिकतर जमानत पर बाहर ही घूम रहे हैं। वैक्सीन पर आई हार्ट अटैक वाली रिपोर्ट ने भी भाजपा के खिलाफ काम किया, ऐसा माना जा सकता है। वहीं धारा 370, राम मंदिर और तीन तलाक जैसी सफलताओं का भी भाजपा को अपेक्षाकृत लाभ नहीं मिला।
कांग्रेस सहित दूसरे दलों के नेताओं को भाजपा में शामिल करना और उन्हें टिकट देने का दांव भाजपा को भारी पड़ गया। इनमें से अधिकतर नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा है। भाजपा ने थोक के भाव ऐसे नेताओं को भर्ती किया और अपने सक्षम कार्यकर्ताओं का टिकट काटकर इन लोगों को लोकसभा का चुनाव लड़ाया। परिणामस्वरूप इनमें से अधिकतर हार गए। इससे भाजपा की आम कार्यकर्ता को आगे बढ़ाने वाली छवि भी धूमिल हुई। यह कहना गलत नहीं होगा कि आम कार्यकर्ताओं का हक मारकर बाहरी नेताओं को टिकट दिया गया। इससे कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी थी। टिकट वितरण ठीक से नहीं होना भी एक अन्य कारण है। कई सीटों पर मौजूदा सांसदों के टिकट कटने की रिपोर्ट सर्वे में आई थी, उसके बावजूद भाजपा नेतृत्व ने उनके टिकट नहीं काटे। इनमें से अधिकतर सांसद हार गए। कई मामलों में भाजपा आलाकमान ने अपनी मनमर्जी की, जिससे भी कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया।
उत्तर प्रदेश में भाजपा को सबसे ज्यादा झटका लगा है। 2019 के मुकाबले उसकी सीटें यहां आधी ही रह गर्इं। ऐसा क्यों हुआ, इसे समझना जरूरी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की टिकट वितरण में की गई अनुशंसा को भाजपा आलाकमान ने दरकिनार करते हुए अपने हिसाब से टिकट वितरण किया। कहा जा रहा है कि भाजपा के चाणक्य और वरिष्ठ नेता अमित शाह ने टिकट वितरण में योगी आदित्यनाथ की जगह यूपी के संगठन महामंत्री रहे सुनील बंसल की राय को अधिक तवज्जो दी। इसके बावजूद योगी आदित्यनाथ ने सभी प्रत्याशियों के लिए जमकर प्रचार किया, लेकिन वे अधिकतर की हार को जीत में नहीं बदल पाए। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन बहुत कमजोर रहा है, जिस पर मंथन किया जाना बहुत जरूरी है।
वहीं राजस्थान में भाजपा को पिछली बार पूरी 25 सीट मिली थीं। इस बार उसे केवल 14 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। यहां पर भी भाजपा को बड़ा झटका लगा है। इसकी सबसे बड़ी वजह भाजपा आलाकमान की टिकटों में मनमानी और वसुंधरा राजे जैसे बड़े दिग्गजों की चुनाव प्रचार से दूरी मानी जा सकती है। असल में राजस्थान की भाजपानीत भजनलाल सरकार अपने गठन के छह महीने में भी कोई खास काम धरातल पर नहीं कर पाई, जिसकी वजह से लोग आकर्षित नहीं हुए। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री किरोड़ी लाल मीणा के दावों के बावजूद भाजपा को आदिवासी वोट भी नहीं मिले। इसका खामियाजा भाजपा को कई सीटों पर उठाना पड़ा। इधर, बिहार में भी भाजपा को करीब सात से आठ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है, जबकि दावा पूरी 40 सीट जीतने का किया गया था। वहीं पश्चिम बंगाल में भी छह से सात सीटें कम मिली हैं, जबकि यहां अमित शाह ने 30 सीटें जीतने का दावा किया था।
असल में भाजपा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसकी सरकार में कार्यकर्ताओं के काम उस तरह से नहीं होते, जिस तरह से कांग्रेस सरकार में होते हैं। काम न होने पर कार्यकर्ता निराश हो जाता है। दूसरा, आयातित और पैराशूटर नेताओं को टिकट मिलने से भी आम कार्यकर्ता खुद को ठगा सा महसूस करता है। भाजपा को चाहिए कि सभी राज्यों में नया नेतृत्व तैयार करे, ताकि सरकार बनाने के लिए किसी एक पर निर्भर नहीं होना पड़े। उसे अपने नेताओं के विकल्प भी तलाशने होंगे। केवल टिकट काटने या चेहरा बदलने भर से काम नहीं चलेगा। लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले अधिकतर नेता पीएम मोदी और अमित शाह के भरोसे रहे। इस पर अभी से गहन मंथन नहीं किया तो आगे परिणाम और भी निराशाजनक रहेगा।


