Thursday, May 21, 2026
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गैर-बराबरी को गायब मानता बजट

 

Ravivani 6


Bharat Dograहाल के बरसों में तीखी होती गैर-बराबरी ने दुनियाभर की सरकारों का ध्यान खींचा है और वे अपनी-अपनी तरह से इस संकट से निपटने की मशक्कत कर रही हैं। ऐसे में भारत सरकार क्या कर रही है? आर्थिक बदहाली से पार पाने का एक मौका केन्द्रीय और राज्यों के बजट बनाते और पेश करते समय मिलता है, लेकिन हमारी सरकार संकट से दो-चार होने की बजाए उसे अनदेखा करने में लगी है।

इस वर्ष का केंद्रीय बजट ऐसे समय में आया है जब निर्धन वर्ग गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। एक बड़े आंदोलन के बाद किसान भी सोच रहे थे कि यह बजट उनकी समस्याओं के बेहतर समाधान पर अधिक ध्यान देगा, पर इन उम्मीदों पर यह बजट खरा नहीं उतरा है। टिकाऊ व प्राकृतिक खेती के लिए प्रतिबद्ध अनेक किसान संगठनों व संस्थानों से जुड़े ‘आशा किसान स्वराज’ ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि पिछले वर्ष भी कृषि व उससे जुड़े मुद्दों से संबंधित आवंटन कम था, पर इस वर्ष उसमें और भी कमी हुई है। यह क्षेत्र लगभग 16000 करोड़ रुपयों से वंचित हुआ है। यदि कुल बजट के प्रतिशत के रूप में देखा जाए तो कृषि व उससे जुड़े कार्यों का आवंटन पहले 3.87 प्रतिशत था जो अब 3.51 प्रतिशत हो गया है।

अपनी प्रतिक्रिया में आशा किसान स्वराज ने कहा कि वर्ष 2022 में तो किसानों की आय दोगुनी करने का वायदा था, पर इस वर्ष के बजट भाषण में यह मुद्दा उठाया तक नहीं गया। इस बारे में आंकड़े प्रस्तुत करते हुए संगठन ने बताया है कि इस लक्ष्य से तो अभी किसान बहुत दूर हैं। विभिन्न सरकारी प्रयासों से लाभांवित होने वाले किसानों व लाभ की मात्रा में कमी आई है। आशा किसान स्वराज ने बताया है कि कृषि विकास की कुछ महत्त्वपूर्ण योजनाओं व कार्यक्रमों में कटौतियां हुई हैं। उदाहरण के लिए किसान उत्पादन संगठन या एफपीओ के लिए वर्ष 2021-22 में 700 करोड़ रुपए का आवंटन हुआ था, जिसे संशोधित अनुमान में काटकर 250 करोड़ रुपए कर दिया गया है। कुछ अन्य कृषि विकास कार्यक्रमों के बजट में भी कटौती हुई है।

यह कोई सामान्य समय नहीं है और ऐसे में बहुत जरूरी था कि सरकार गरीबी व बेरोजगारी को कम करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करती। संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 की विकट स्थितियों में विश्व में जितने नए लोग गरीबी की चपेट में आए, उनमें से लगभग आधे, करीब 4 करोड़ से अधिक भारत में थे। दूसरी ओर प्राईज संस्थान, मुम्बई के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 2015-16 और 2020-21 के बाद भारत के सबसे निर्धन 20 प्रतिशत परिवारों की आय में 53 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि इससे पहले के दशक में वर्ष 2005-06 से 2015-16 के दौरान उन्होंने उल्लेखनीय आय वृद्धि दर्ज की थी।

वर्ष 2021 के उपभोक्ता आंकड़ों के विश्लेषण से सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी ने बताया है कि लगभग 84 प्रतिशत भारतीयों की स्थिति में कुछ-न-कुछ गिरावट हुई है। इस तरह की गिरावट की स्थिति ने अधिकांश भारतीयों को अपनी चपेट में लिया है। इसी सेंटर के एक अन्य विश्लेषण ने बताया गया है कि 20-24 वर्ष आयु वर्ग के स्नातकों में बेरोजगारी 60 प्रतिशत तक पंहुच गई है, जबकि वर्ष 20-29 आयु वर्ग में यह 43 प्रतिशत तक पहुंच गई है। निश्चय ही यह बहुत चिंताजनक स्थिति है।

आज यह विश्व स्तर पर चर्चा का विषय है कि जनसाधारण, विशेषकर निर्धन वर्ग की बढ़ती कठिनाइयों के दौर में विषमताएं तेजी से बढ़ी हैं। प्राईज के सर्वेक्षण के अनुसार जहां नीचे के 20 प्रतिशत परिवारों की आय वर्ष 2015-16 व वर्ष 2020-21 के बीच 53 प्रतिशत कम हुई, वहां ऊपर के 20 प्रतिशत परिवारों की आय ने 39 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की। ह्यआक्सफैम विषमता रिपोर्ट ने बताया है कि विशेषकर भारत के अरबपतियों की संपत्ति व आय में हाल के समय में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। सबसे धनी 98 अरबपतियों के पास जो संपत्ति है, वह देश के 55 करोड़ लोगों (नीचे की 40 प्रतिशत जनसंख्या) के बराबर है।

इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि बड़ी समतावादी पहल की जरूरत बहुत बढ़ गई है। इस संदर्भ में बजट की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो जाती है। बजट को चाहिए कि वह समतावादी सोच को आगे बढ़ाए, अरबपतियों व अति धनी वर्ग पर समुचित टैक्स लगाकर उनसे पर्याप्त संसाधन जुटाए व इन्हें निर्धन वर्ग को उपलब्ध करवाए। इससे निर्धन परिवारों को बहुत राहत तो मिलेगी ही, साथ ही अर्थव्यवस्था भी समतामूलक रिकवरी के दौर में आएगी। जब अति धनी व्यक्तियों की आय वृद्धि होती है, तो उसका अर्थव्यवस्था पर कोई सकारात्मक असर नहीं होता, जबकि यदि निर्धन परिवारों की आय वृद्धि होती है तो इससे अर्थव्यवस्था पर गुणात्मक या मल्टीप्लायर असर होता है। यानि निर्धन वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति से कई स्तरों पर अर्थव्यवस्था में सक्रियता आती है व समतामूलक वृद्धि होती है।

इस स्थिति में प्रस्तुत होने वाले बजट के लिए यह बहुत जरूरी था कि वह एक साधारण बजट की तरह न होकर निर्धन व जरूरतमंद को विशेष और बड़ी राहत देने वाला बजट सिद्ध हो। दुर्भाग्यवश वर्ष 2022-23 के बजट में निर्धन परिवारों को राहत देने के लिए, तेजी से बढ़ती विषमताओं को कम करने के लिए व समता लाने के लिए कोई बड़ी पहल नहीं हुई। निश्चय ही सरकार की गरीबी को कम करने की अनेक योजनाएं हैं, कार्यक्रम हैं, वे पहले की तरह चल रहे हैं (प्राय: लक्ष्यों से पीछे चल रहे हैं), पर आज की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए जो निर्धन पक्ष के लिए एक बड़ी पहल की जरूरत थी, वह कहीं नजर नहीं आती। इस तरह निर्धन परिवारों को बड़ी राहत देने का, विषमता कम करने का जो बड़ा अवसर सरकार के पास था, उसे सरकार ने गंवा दिया है।

बजट भाषण में हमने सुना है कि तराशे हुए हीरे-मोती पर कस्टम कम कर दिया गया है, नदी-जोड़ योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा, एक्सप्रेसवे व हाईवे को प्राथमिकता दी जाएगी, लेकिन इस समय यह सब देश की सबसे बड़ी जरूरतों के अनुकूल नहीं है। इस समय तो जरूरत इस बात की है कि निर्धन व जरूरतमंद वर्ग को सीधे-सीधे राहत मिले, उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक पैसा उनके हाथ में आए और देश की अर्थव्यवस्था की समतामूलक रिकवरी का मार्ग प्रशस्त हो।

सवाल यह है कि बजट ने तो जरूरतमंदों को वह राहत नहीं दी जिसका उन्हें इंतजार था, पर आगे क्या निर्धन जरूरतमंदों के लिए बड़ी पहल की जा सकती है। कम-से-कम सरकार को यह खुली सोच रखनी चाहिए कि मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में यदि रोजगार के लिए अधिक मांग उत्पन्न होती है तो वह आवंटन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि के लिए तैयार रहे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पहले ही मनरेगा में बकाया मजदूरी का भुगतान बाकी है व इसके तुरंत भुगतान में सरकार को जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए।

शहरी निर्धन परिवारों की बढ़ती हुई समस्याओं को देखते हुए उनके लिए भी एक रोजगार गांरटी योजना का प्रस्ताव अनेक मंचों से उठा है। निर्माण मजदूरों के कल्याणकारी कानूनों के बारे में कोडीफिकेशन की प्रक्रिया में अनिश्चय की स्थिति उत्पन्न हुई है। ऐसे में शहरी निर्धन वर्ग के लिए भी बहुत राहत और बड़ी पहल की जरूरत है।

भारत डोगरा


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