Thursday, May 21, 2026
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वाचिक परंपरा से मिली कहानियों की आधुनिक प्रस्तुति

 

Ravivani 7


Sudhanshu Gupta 2वरिष्ठ कथाकार एवं पत्रकार मृणाल पाण्डे की हाल ही में एक किताब आई है ‘माया ने घुमायो’ (राधाकृष्ण प्रकाशन)। इस किताब के आवरण पर ही लिखा है-बच्चों को न सुनाने लायक बाल कथाएं। मृणाल पाण्डे पुस्तक की प्रस्तावना में लिखती हैं, ‘कई सरकारें आजकल हमारे जीवन पर तरह-तरह की सेंसरशिप लागू करने पर तुली दिखती हैं। उनकी राय में बच्चों को (और माताओं बहनों को खासकर) हम वयस्कों की दुनिया के स्याह सेक्स, हत्या, युद्ध और अन्याय के ब्योरों से कतई अलग-थलग रखना जरूरी है। यह सब बकवास है। सामान्य बुद्धि का कोई भी बच्चा जब इन तमाम ब्योरों से ठसाठस भरी लोककथाओं को सुनता है, तो वे उसे बड़ों की जटिल दुनिया में प्रवेश के लिए बहुत सहज-सरल तरीके से तैयार करती हैं। इस संकलन में मैंने यही किया है कि अपनी तरह से बड़ों और बच्चों की दुनिया के बीच लापरवाही से उढ़काकर रखा गया दरवाजा तनिक चौड़ा कर दिया है।’ यानी अब ये कहानियां बच्चों के पढ़ने लायक हो गई हैं।

कहानियां क्या हैं? इस पुस्तक की सभी कहानियों का उत्स कहीं न कहीं वाचिक पंरपराओं, लोककथाओं, बोधिकथाओं, नीति कथाओं में छिपा है। यह अकारण नहीं है कि हर देश की लोककथाओं में कुछ बातें आपको सनातन मिलेंगी। मसलन महामारियां, अकाल, बाढ़ की विभीषिका से जूझना, जर-जोरू या जमीन पर लड़ मरने को बार-बार जूझते लोग और बच्चों की सार संभाल को दाना पानी लिए सुख सेज या युद्ध के मैदान से मुंह फेरकर वापिस आने की यादें। वास्तव में ‘माया ने घुमायो’ की सभी कहानियां वाचक परंपरा से आई हैं।

मृणाल पाण्डे ने इन कहानियों को हल्के से स्पर्श से आधुनिक रूप दिया है। ये कहानियां अपनी कल्पनाओं, अतिरंजनाओँ और अपने पात्रों के साथ सुदूर अतीत से हमारे साथ हैं और मानव समाज, उसके मन मस्तिष्क के साथ मनुष्य की निर्बलताओं का अध्ययन करती दिखाई देती हैं। इन कहानियों में वर्चस्व की इच्छा है, आतंक है, कमजोरों की दीनता और असहायता है, चालाकियां हैं, मूर्खताएं हैं और साथ ही हमारी समकालीन राजनीति और आसपास के सामाजिक-आर्थिक तंत्र में नए-नए आए जुमलों और शब्दों की बुनत है, जो इन कथाओं को अनायास ही हमारे आज के समय की ‘सत्यकथा’ में बदल देती हैं।

संभवत: यही वह बिन्दु है, जहां बच्चों को पूरी-पूरी समझ में आ जाने वाली ये कहानियां पाठक से एक वयस्क मस्तिष्क की मांग करती हैं। इन कहानियों की खास बात यह है कि इन्हें पढ़ते हुए आपको वर्तमान समय, समाज और राजनीति सब कुछ दिखाई देगा। ‘चतुर, मूर्ख और बेवकूफ राजा की कथा’ एक ऐसे राजा की कथा है, जो अपने को बहुत बुद्धिमान और सर्वज्ञ समझता है। बड़े से बड़ विद्वान को भी वह ‘देशद्रोही-राजद्रोही’ कहकर कालकोठरी में डलवा देता है। वह रात को दिन कहता तो प्रजा दिन कहती, वह दिन को रात कहता तो प्रजा रात कहती। प्रजा की तकलीफें जब बढ़ने लगीं तभी भारी महामारी फैल गई। राजा अपने महल के झरोखे पर आकर कहता, अच्छे दिन आने वाले हैं…फिर पूछता क्या आने वालें हैं, प्रजा कहती, अच्छे दिन। राजा मुस्कराकर कहता, इसी बात पर ताली बजाओ, सब हारी बीमारी भाग जाएगी। प्रजा ऐसा ही करती। राजा अंतत: चापलूसों से दुखी आ गया और उसने अपने महामंत्री से दो घंटे के भीतर चार मूर्खों को पकड़कर लाने के लिए कहा। महामंत्री को दो ही मूर्ख मिले। लेकिन इन दोनों मूर्खों ने यह साबित कर दिया कि महामंत्री और राजा सबसे बड़े मूर्ख हैं। कहानी बताती है कि अपने को बहुत अक्लमंद समझने वाले राजाओं को सदा याद रखना चाहिए कि मूर्ख भी कई बार उनसे चतुर निकलते हैं। एक अन्य कथा इस प्रकार है। ‘नकाबपोश नकटापंथ की उत्थान-पतन कथा’ एक ऐसे ठग की कथा है जो एक बार ठगी के चक्कर में पकड़ा जाता है और प्रधान न्यायधीश उसे सजा सुनाते हैं कि उसकी नाक काटकर उसे जिला बदर कर दिया जाए। नए शहर में आकर वह देखता है कि यहां के लोग बड़े धार्मिक हैं।

राजकाज से लेकर समाज तक में साधु संतों की चलती है। ठग की नाक भले ही कट गई थी लेकिन उसका दिमाग शातिर था। धीरे-धीरे वह नकटा पूरे शहर का सबसे बड़ा बाबा बन गया और प्रजा उसकी भक्त। बाबा ने अपने भक्तों की भी चालाकी से नाक कटवा दी। नकटा संप्रदाय की ताकत बढ़ती गई। उन्हें यह भी उम्मीद थी कि उन्हें बहुमत मिल जाएगा। लेकिन उससे पहले ही नकटापंथियों की पोल खुल गई और नकटापंथी मठ का खात्मा हो गया। ‘माया ने घुमायो’ की सभी कहानियों में आज का समय दिखाई देता है, शायद यही वजह है कि लोककथाएं, नीति कथाओं और बौद्ध कथाएं कभी नहीं मरतीं, वे पाठकों, श्रोताओं के जेहन में हमेशा जीवित रहती हैं-अलग-अलग रूपों में। पुस्तक की पहली कहानी है ‘बच्चों को न सुनाने लायक एक बालकथा।’ इसमें महामारी से बचने के लिए मां अपने युवा बेटे को दूसरे शहर भेज देती है। बेटा एक कुएं के पास पहुंचता है। कुएं से सात परियां निकलती हैं और उसे दो जुड़वा शंख देती हैं। ढपोरशंख और करामाती शंख। ढपोरशंख लच्छेदार बोली बोलता है, बहुत देने का शोर मचाता है पर वादे कभी पूरे नहीं करते। करामाती शंख मालिक की सभी इच्छाएं पूरी करता है। पूरी कथा यह बताती है कि ढपोरशंख के माध्यम से लोगों को कुछ समय तक तो मूर्ख बनाया जा सकता है, लेकिन हमेशा नहीं। वह युवक इन शंखों के माध्यम से राजा तक बन जाता है। लेकिन एक दिन उसके अपने ही बच्चे उस करामाती शंख को चुरा लेते हैं। अंतत: वह युवक (राजा) किसी गहरे गढ्ढे में गिरकर मर जाता है। कहानी कहती है कि ढपोरशंख पर भरोसा करने वालों की भी यही गति होती है।

पुस्तक की सभी कहानियां इसलिए भी पठनीय हैं कि इन कथाओं को हम सबने ही कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सुना है या पढ़ा है। इसलिए इनसे हमारी जुड़ाव तत्काल हो जाता है। लालची हूहू की कथा, लोल लठैत और विद्या का घड़ा, निर्बुद्धि राजा और देश भक्त राजा की कथा, मूर्ख महामूर्ख और वज्रमूर्खों की कथा, मेंढक और चींटी की कथा, बहरुपिए राक्षस और दो भाइयों की कथा, बहरुपिया गुरु और चतुर चेले की कथा…और अन्य सभी कथाएं न केवल पठनीय हैं बल्कि आपको समाज की मौजूदा तस्वीर भी दिखाती हैं। लिहाजा ये बाल कथाएं बच्चों को न सुनाने लायक हैं या सुनाने लायक इस फेर में न पड़कर इन्हें पढ़ा जाना चाहिए और यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि किस तरह ये कथाएं अपने भीतर मौजूद समय को संजोए हैं। वाचिक परंपरा से मिली कहानियों की आधुनिक प्रस्तुति है माया ने घुमायो।

सुधांशु गुप्त


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