जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कैंट बोर्ड की बैठक आगामी 21 जनवरी दिन गुरुवार को होगी। हालांकि अभी कैंट बोर्ड प्रशासन ने बोर्ड के सदस्यों को बैठक का एजेंडा नहीं भेजा है, लेकिन पता चला है कि बैठक में प्रमुख मुद्दों पर चर्चा होगी।
म्युटेशन व टैक्स के भी कई मामलों पर चर्चा होनी है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वाहन एंट्री फीस यानि टोल के ठेके को लेकर बोर्ड का क्या रूख रहेगा। एक्सटेंशन दिए जाने के बाद अभी फरवरी माह तक ठेकेदार के पाले में गेंद हैं।
दरअसल, ये सवाल इसलिए पूछा जा रहा है कि बोर्ड कि विगत बैठक से एन पूर्व उपाध्यक्ष ने तीन टोल वसूली के तीन प्वाइंटों जिनमें रूड़की रोड, दिल्ली रोड व मवाना रोड शामिल हैं को खत्म करा दिए जाने का दावा किया था। जिला प्रशासन के प्रतिनिधि एडीएम सिटी का भी बैठक में कुछ इसी प्रकार का रूख था, लेकिन कैंट बोर्ड के खजाने की माली हालत और स्टाफ के वेतन व पेंशन आदि व्यवस्थाओं की मजबूरी के चलते सीईओ कैंट की चिंता के मद्देनजर बाद में तय किया गया कि फिलहाल वसूली प्वाइंटों पर यथास्थिति रहने दी जाए।
जिसके चलते एक्सटेंशन दिए जाने में सभी 11 प्वाइंटों को शामिल कर लिया गया, लेकिन बड़ा सवाल, एक्सटेंशन की अवधि पूरी होने के बाद जो नया ठेका दिया जाना है उसको लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है। कैंट बोर्ड स्टाफ चाहता है कि सभी जो वर्तमान वसूली प्वाइंट हैं उनको ठेके की शर्तों में शामिल किया जाए ताकि जरूरी खर्च के लिए धन की समुचित व्यवस्था होती रहे, इसके इतर उपाध्यक्ष खेमा तीन प्वाइंटों को बाहर किए जाने की बात कहता रहा। वहीं कैंट विधायक भी बार-बार जन मंशानुरूप तीनों प्वाइंटों को ठेके से बाहर रखने की बात कह चुके हैं। उन्होंने इसको प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया हुआ है।
स्टाफ और सदस्यों में बेचैनी
भले ही जानलेवा सर्दी पड़ रही हो, लेकिन कैंट बोर्ड के स्टाफ और बोर्ड के सदस्यों की बात की जाए तो उनमें सीईओ के कामकाज के तरीके को लेकर बेचैनी साफ झलक रही है। हालांकि जहां तक अन्य लोगों की बात है तो सीईओ के तौर पर नवेन्द्र नाथ के आने के बाद सभी राहत महसूस कर रहे हैं। स्टाफ की जहां तक बात है तो उनकी परेशानी और बेचैनी का मुख्य कारण इन दिनों पुरानी फाइलों की धुल झाड़ना और फाइलों के पेज पलटे जाना है। इस दौरान कुछ पूर्व की कारगुजारियां भी पकड़ में आ रही हैं।
बस पुरानी फाइलों के पेज पलटे जाना और उन्हें कस्टडी में लिए जाना ही रास नहीं आ रहा है। इससे स्टाफ में भारी बेचैनी है। वहीं, दूसरी ओर यदि सदस्यों की बात की जाए तो कुछ सदस्य पूर्व की भांति सीईओ कक्ष में दरबार न लगने से भी परेशान हैं।
जिन सदस्यों को पूर्व में सीईओ कक्ष में दरबार सजाने की आदत बन गई थी और स्टाफ पर रौब गालिब किया करते थे उनके लिए अब बोर्ड में आने का समय तय कर दिया गया है। एक-दूसरे से पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों किया गया। दरअसल हो यह रहा है कि अब सिर्फ काम की बातों और काम पर ही जोर दिया जा रहा है। वो भले ही बोर्ड सदस्य हों या फिर ठेकेदार अथवा आफिस का स्टाफ।

