Tuesday, January 18, 2022
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जलवायु परिवर्तन के खतरे से जूझते बच्चे

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जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव जीवधारियों तथा वनस्पतियों पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन को बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना जा रहा है। यूनिसेफ (यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रेंस इमरजेंसी फण्ड) की ताजा रिपोर्ट में दुनिया भर के आधे से अधिक बच्चों के ऊपर जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे का उल्लेख किया गया है। दक्षिण एशिया के जलवायु परिवर्तन के संकट वाले चार देशों में भारत भी शामिल है। तीन अन्य देश पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान हैं। जलवायु प्रभावित प्रथम 10 देशों में मोजाम्बिक पहले, जिम्बाब्वे दूसरे, द बहमास तीसरे, जापान चैथे, मलावी पांचवें, इस्लामिक रिपब्लिक आॅफ अफगानिस्तान छठवें, भारत सातवें, दक्षिण सूडान आठवें, नाइजर नवें और बोलीविया दसवें स्थान पर हैं। 90 प्रतिशत से अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन करने वाले 57 देशों और यूरोपीय संघ के जलवायु संरक्षण संबंधी उपायों के प्रदर्शन पर नजर रखने वाले जर्मनवॉच, न्यूक्लरइमेट इंस्टीट्यूट और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क द्वारा जारी क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स में भारत का स्थान 10वां है,

जबकि पिछले साल यह नवें मुकाम पर था। बच्चों पर केंद्रित चिल्ड्रेंस क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स (सीसीआरआई) में बाढ़, वायु प्रदूषण, चक्रवात और लू आदि से प्रभावित देशों को शामिल किया जाता है। बच्चों पर जलवायु एवं पर्यावरण संबंधी खतरों के जोखिम, उनसे बचाव और आवश्यक सेवाओं तक उनकी पहुंच के आधार पर देशों को क्रमबद्ध किया जाता है। जिस देश के अंक ज्यादा होते हैं उसे उतना ही गंभीर जोखिम वाला देश माना जाता है।

भारत भी ऐसी आपदाओं को झेलने पर मजबूर है। जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरों से मासूमों का वर्तमान तो प्रभावित होता ही है, उनका भविष्य भी इससे अछूता नहीं रहता। सूची में भारत 26वें, अफगानिस्तान 25वें, बांगलादेश 15वें और पाकिस्तान 14वें स्थान पर है। रिपोर्ट के मुताबिक जहां दुनिया के हर बच्चे को जलवायु और पर्यावरण से जुड़े किसी न किसी जोखिम का सामना है, वहीं कई देशों के बच्चे एक साथ कई खतरों का सामना करने पर मजबूर हैं।

बच्चों के जीवन और विकास की राह के खतरे को कोविड-19 महामारी ने और बढ़ा दिया है। विश्व के एक अरब से अधिक बच्चे जलवायु परिवर्तन के उच्च जोखिम वाले 33 देशों में रहते हैं। इन बदनसीब बच्चों को शुद्ध पेयजल, स्वच्छ परिवेश और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक देखभाल जैसी मूलभूत सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हैं। बाल अधिकारों की वैश्विक संस्था सेव द चिल्डेज्न द्वारा जारी फीलिंग द हीट चाइल्ड सरवाईवल इन चेंजिंग क्लाइमेट रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा और दूरगामी प्रभाव गरीब देशों पर पड़ेगा। बीमारियों की प्रकृति तब्दील हो जाएगाी।

रोगियों की तादाद बढ़ेगी तथा आर्थिक दृष्टि से कमजोर देशों के सामाजिक, आर्थिक व स्वास्थ्य ढांचे पर भार बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक हर साल 90 लाख बच्चे पांच वर्ष से पहले ही मर जाते हैं। कुपोषण, निमानिया, खसरा, डायरिया, मलेरिया, शुद्ध पेयजल, प्रसव बाद देखभाल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मरने वाले 98 प्रतिशत बच्चों का संबंध निर्धन देशों के हाशिए पर रहने वाले परिवारों से होता है। हर साल 10 लाख बच्चे मलेरिया और 20 लाख बच्चे अतिसार से मर जाते हैं। 1.30 अरब बच्चों को शुद्ध पेयजल नहीं मिलता।

पिछली कई सदियों से जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि विभिन्न देशों और महा़द्वीपों में सैकड़ों वर्षों में बना हुआ औसत मौसम तब्दील हो रहा है। इसे तरह समझा जा सकता है कि भारत में मुख्य रूप से तीन प्रमुख मौसम जाड़ा, गर्मी और बरसात हैं। इसके विरीत यूरोपीय देशों में सर्दी, बसंत, गर्मी और पतझड़ के मौसम पाए जाते हैं। हालांकि, मौसम और ऋतुओं का खास समय और विशेषताएं होती हैं,

लेकिन पिछले कई दशकों से वर्षा का तरीका बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक और मानव जनित दोनों प्रकार का हो सकता है। यह परिवर्तन मुख्यतय: कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने के चलते पृथ्वी के वातावरण में तेजी से बढ़ती ग्रीनहाउस गैसों के कारण होता है। ये गैसें महासागरों को गर्म कर रही हैं, जिसके नतीजे में समुद्र का स्तर बढ़ रहा है।

तूफान के पैटर्न, समुद्र की धाराओं एवं वर्षा में बदलाव के अलावा बर्फ का बनना व पिघलना, अधिक गर्मी, आग और सूखा आदि घटनाएं इसी पर आधारित हैं। जेराल्ड नेलसन का कहना है कि विश्व का तापमान बढ़ने के कारण कुछ अवधि के लिए उत्तरी क्षेत्र में चावल की उपज तो बढ़ जाएगी, लेकिन तापमान में वृद्धि भी हो जाएगी। गत शताब्दी में जहां तापक्रम में एक डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ, वहीं 2050 तक इसके दो डिग्री संल्सियस बढ़ने की संभावना है।

पृथ्वी का औसतन तापमान करीब 15 डिग्री सेल्सियस है। यद्यपि भूगर्भीय प्रमाण बताते हैं कि पूर्व में यह बहुत ज्यादा या फिर कम रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जलवायु में तेजी से बदलाव हो रहा है। इस कारण दुनिया भर में गर्मियां लंबी और सर्दियां छोटी होती जा रही हैं।

दक्षिण एशिया यूनिसेफ के क्षेत्रीय निदेशक जॉर्ज लारिया अडजेई ने तसलीम किया कि अब दक्षिण एशिया में लाखों बच्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के स्पष्ट सबूत मौजूद हैं। इनसे इस दिशा में कार्य करने में मदद मिलेगी। बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर किया जाने के लिए स्वास्थ्य, पोषण, आजीविका व जलवायु प्रभाव के प्रति जागरूकता के अलावा वातावरण खराब करने वाली मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने की भी जरूरत है।


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