
हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक विशेषज्ञ और विश्लेषक के साथ साधारण लोगों को भी भरपूर चौंकाया है। राजनीतिक दलों के लिए तो इन नतीजों में राजनीतिक संदेश है ही, समतामूलक समाज व्यवस्था के आग्रही नागरिक समाज के लिए भी इस में कुछ गंभीर संदेश है। क्या हैं वे संदेश? संदेश और संकेत पढ़ने-समझने के लिए राजनीतिक पृष्ठ-भूमि को याद किया जाना जरूरी है। लोकसभा 2024 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 240 पर सिमट गई थी। 543 के सदन में बहुमत का जादुई आंकड़ा 272 है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी बहुमत का आंकड़ा नहीं हासिल कर पाई, लेकिन यह कोई बहुत ही छोटी संख्या भी नहीं है। बहुमत भले न मिली हो, लेकिन संसद में सब से बड़ा दल तो वह अब भी बनी ही हुई है।
भारतीय जनता पार्टी कोई सामान्य पार्टी नहीं है। यह राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ की गढ़ी राजनीतिक पार्टी है। महात्मा गांधी जैसे नेता की हत्या की आरोपी रह चुकी है। यह आरोप निराधार नहीं था। राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ की विचारधारा भारत का आजादी के आंदोलन के विचारधारात्मक मूल्यों से न केवल भिन्न, बल्कि बिल्कुल विपरीत रही है। भारत के संविधान में मुख्य रूप से आजादी के आंदोलन के दौरान अर्जित मूल्य-बोध और नैतिक-दृष्टि को स्वाभाविक तौर पर जगह मिली। इस मूल्य-बोध नैतिक-दृष्टि सिर्फ का बनाव सिर्फ भारतीय अनुभवों से न बनकर दुनिया भर के अनुभवों के सहयोजन-संयोजन और सम्मानजनक समायोजन से बना था।
राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ का विचारधारात्मक लगाव वर्ण-व्यवस्था आधारित समाज व्यवस्था से ही रहा है, आज भी है। राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के विचारधारात्मक लगाव के प्रति राई-रत्ती सम्मान भारत के संविधान में नहीं है। संविधान परिषद की सभाओं में इन मुद्दों पर बहुत गंभीर चर्चा हुई थी। संविधान परिषद की सभाओं में विचार-विमर्श के प्रयोग और विवेक-पूर्ण पराक्रम को बिना किसी पूर्व-आग्रह के देखा जाये तो मोटे तौर पर तीन श्रेणियां बन सकती हैं। पहली श्रेणी, वह जो बहुत पुरानी शैली इस्लाम और मुसलमान के आगमन के पहले ब्राह्मण युग की समाज व्यवस्था की तरफ बढ़ना चाहते थे। उन के अनुसार यही वह समय था जब भारत ह्यसोने की चिड़ियाह्ण था। दूसरी श्रेणी, वह जो बौद्ध मूल्य-बोध के आधार पर सामाजिक संरचना का पुनर्गठन चाहते थे। उन के अनुसार समतामूलक मानवतावादी समाज व्यवस्था को इसी पुनर्गठन के माध्यम से हासिल किया जा सकता है। तीसरी श्रेणी वह, जो ब्राह्मण-बौद्ध दोनों के सार्थक मूल्य-बोध को आत्मसात कर उन से आगे निकलते हुए आधुनिक, समतामूलक और प्रगतिशील समाज व्यवस्था कायम करना चाहते थे।
बन रही नई विश्व-व्यवस्था में यह तीसरी श्रेणी सब से अधिक उपयुक्त थी। बन रही इस नई विश्व-व्यवस्था की तरफ हल्का इशारा करना यहां जरूरी है। भारत की आजादी के आंदोलन के दौर की चार बड़ी घटनाओं को संदर्भ में लेने से उस बन रही नई विश्व-व्यवस्था की झलक जरूर दिख सकती है। औद्योगिक क्रांति, सोवियत संघ का अस्तित्व में आना, फासीवाद की जकड़न और दो-दो विश्व-युद्ध का होना। हां। निश्चित ही, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना और संबंधित विश्व संस्थाओं को भी बन रही नई विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक मानने से इनकार नहीं किया जा सकता है। आजादी के आंदोलन के प्रतीक महात्मा गांधी जिस नैतिक-लोकतंत्र की बात करते थे। उस नैतिक-लोकतंत्र की तात्विक अवधारणा पहली श्रेणी के अधिक निकट थी। इस नैतिक-लोकतंत्र के मूल में यह विश्वास सक्रिय था कि शोषण करनेवाला शोषित होनेवाले की सहन सीमा का उल्लंघन न करे। शोषक को चाहिए कि शोषण के वक्त ईश्वर का ध्यान रखे और ‘आध्यात्मिक चेतना’ को जागृत रखे।
यह समझ में आने लायक बात है कि कांग्रेस की विभिन्न सरकारों ने संविधान के कई लोक कल्याणकरी प्रावधानों को लागू करने कि दिशा में वैसा प्रयास नहीं किया जैसे प्रयास की उम्मीद कांग्रेस से थी। गैर-कांग्रेसवाद का आह्वान करनेवाले डॉ राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी आंदोलन की लंबी कतार खड़ी हो गई। विचारधारात्मक कारणों के अलावा भी समाजवादी दलों के बिखरावों के कई कारण रहे हैं। सत्ता की राजनीति में समाजवादी आंदोलन को बनाये रखकर भी समाजवादी नेता विचारधारात्मक लक्ष्य को प्राथमिकता देते हुए अपनी राजनीति से समाजवादी कार्रवाई को आगे बढ़ाने से वे लगातार चूकते रहे। वैसे यहां केवल समाजवादी आंदोलन के ‘फिनिश्ड प्रोडक्ट’
नीतीश कुमार की ही बात नहीं की जा रही है। लेकिन करनेवाले ऐसा कर ही सकते हैं।
कांग्रेस के संस्करण की विभिन्न पार्टियों, समाजवादी धारा की पार्टियों, बहुजन राजनीति की पार्टियों और कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीतिक और सांगठनिक चेतना में जितना भी फर्क हो भेद-भाव मुक्त जाति-वर्ण-धर्म निरपेक्ष समाज व्यवस्था को हासिल करने की आकांक्षा में कोई मौलिक फर्क नहीं है, हां अपनी-अपनी सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठ-भूमि के कारण तेजी और तीखेपन में जरूर फर्क है। इस अर्थ में भारतीय जनता पार्टी इन सभी पार्टियों से भिन्न दृष्टि और दिशा की राजनीतिक पार्टी है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ की विचारधारात्मक पृष्ठ-भूमि के कारण हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ी शिव सेना भी भारतीय जनता पार्टी से भिन्न मिजाज की राजनीतिक पार्टी रही है। राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ की पृष्ठ-भूमि के अलावा अन्य कारणों की अनदेखी नहीं की जा रही है, लेकिन यहां इतना ही प्रयोज्य है।
आज कांग्रेस पर सभी हमलावर हो रहे हैं। कांग्रेस खुद भी हरियाणा विधानसभा चुनाव में ‘हार की समीक्षा’ कर रही है। ‘न्याय योद्धा’ राहुल गांधी कांग्रेस की ‘हार की समीक्षा’ करते हुए चुनावी तंत्र के साथ-साथ कांग्रेस के अंदर भी हार के कारणों की तलाश कर रहे हैं। चुनावी तंत्र सहित कांग्रेस के बाहर व्याप्त कारणों को चिह्नित करना बहुत मुश्किल नहीं भी हो, साबित करना थोड़ा मुश्किल तो जरूर होगा। हां, कांग्रेस के अंदर चिह्नित हार के कारणों को किस तरह से निष्पक्ष होकर निष्क्रिय करते हैं यह देखने की बात है।
नागरिक समाज को भी नागरिक कारणों से कांग्रेस की ‘हार की समीक्षा’ करनी चाहिए। इस समीक्षा के दौरान कांग्रेस को हुई राजनीतिक क्षति को विश्लेषित करते हुए भारत के लोकतंत्र को होनेवाली क्षति को चिह्नित करना अधिक जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत अंतत: जन-हित से जुड़ा मामला भी होता है। यह बात साफ-साफ कहना जरूरी है कि गैर-कांग्रेसवाद की बची हुई किसी भी प्रेरणा का कोई भी अंश यदि कांग्रेस की हार में अपनी जीत देखता है तो वह हिंदुत्व की राजनीति के ही पक्ष में खड़ा साबित होने की अनिवार्यता से खुद को बचा नहीं सकता है।


