
देश में सेप्टिक टैंक में सफाई के दौरान जान गंवाने वाले के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। पिछले करीब पांच वर्ष में सीवर एवं सेप्टिक टैंक की सफाई करने के दौरान 400 लोगों अपनी जान गंवा चुके हैं। सरकार की तरफ से संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान यह जानकारी दी गई। दक्षिण पश्चिमी दिल्ली के सरोजिनी नगर इलाके में 09 अक्टूबर 2024 को एनबीसीसी की कंस्ट्रक्शन साइट पर मंगलवार को बड़ा हादसा हो गया। हादसे की चपेट में आने से दो मजदूरों की मौत हो गई जबकि एक मजदूर की हालत काफी गंभीर है। ये मजदूर मौके पर एक सीवर की सफाई करने के लिए अंदर गए थे लेकिन अंदर जाने के बाद अचेत हो गए। इन्हें सीवर से निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया तो वहां चिकित्सकों ने दो मजदूरों को मृत घोषित कर दिया जबकि तीसरे की हालत गंभीर है।
14 मई 2024 को दिल्ली के मॉल में सीवर लाइन की सफाई करते समय एक व्यक्ति की मौत हुई। 4 मई 2024 को नोएडा में सीवर की सफाई करने उतरे दो मजदूरों की हुई मौत हो चुकी है। 01 मई 2024 को लखनऊ में सीवर लाइन की सफाई करने उतरे पिता-बेटे की दम घुटने से मौत हुई। 23 अप्रैल 2024 को मुजफ्फरनगर में लाइन में सफाई कर रहे दो मजदूरों की दम घुटने से मौत। ये पिछले करीब एक महीने में उत्तर भारत के वो हादसे हैं, जिनमें सफाई मजदूर सीवर में उतरे और उसमें उनकी मौत हो गई। वैसे आंकड़े ये कहते हैं कि हर साल हमारे देश में सीवर सफाई के मामलों में कम से कम 100 से ज्यादा मौतें होती हैं। भारत में आमतौर पर सीवर सफाई का काम अब भी पुराने तौर तरीकों से चलता है। हालांकि कुछ मशीनें कुछ शहरों में जरूर विदेशों से मंगाई गर्इं, लेकिन मोटे तौर पर अब भी मजदूर मेनहोल में नीचे उतरते हैं। कई बार उसमें फंसने से तो कई बार उसकी गैस से दम घुटने के कारण जान से हाथ धो देते हैं। इस मामले में अमेरिका और यूरोप के देश तो बहुत आगे हैं, कुछ एशियाई देश भी पूरी तरह मशीनीकृत हो चुके हैं। इसे लेकर लंबे समय से आवाज उठाई जाती रही है। हैरानी की बात है कि हमारे देश में सीवर और सीवेज सफाई सिस्टम अब भी पूरी तरह पुराने तौर-तरीकों से चल रहा है। अदालती आदेशों के बावजूद इसका मशीनीकरण या आटोमेशन नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट और अदालतें सीवर की मैन्युअल यानि मानव-आधारित सफाई को गैरकानूनी ठहरा चुकी हैं।
पिछले साल सामाजिक न्याय और अधिकार राज्य मंत्री रामदास अठावले ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया था कि पिछले पांच सालों में (2018-2022) सीवर सफाई से संबंधित हादसों में कम से कम 308 लोगों की मृत्यु हो गई। नेशनल कमीशन फॉर क्लीनिंग लेबर के आंकड़े कहते हैं कि हर साल सीवर सफाई से संबंधित हादसों में 130 से ज्यादा लोगों की जान जाती है। हमारे देश में सीवेज प्लांट्स में हर तरह की गंदगी गिरती है। इसमें सूखा, गीला, प्लास्टिक और मलबा सभी कुछ होता है। इससे जानलेवा जहरीली गैस बनने लगती है और जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर या सैप्टिक टैंक में सफाई के लिए घुसता है तो दम घुटने की स्थिति बन जाती है। इस काम को अब पूरी तरह मशीनों से किया जाना चाहिए। भारत में 70 फीसदी सीवेज लाइनों की सफाई आमतौर पर होती ही नहीं। 2015 में एक सर्वे में पता लगा कि तब हमारे देश में 810 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स थे लेकिन चालू हालत में केवल 522 ही थे। बाकी या तो खराब थे या बनने की प्रक्रिया में थे।
दुनिया के ज्यादातर देशों ने इसके लिए मशीनीकृत और आटोमेटेड बेहद सुरक्षित प्रणाली अपना ली है। इसमें कई एशियाई मुल्क भी शामिल हैं। भारत में कुछ समय पहले सुलभ इंटरनेशनल ने बाहर से आयात करके दिल्ली में एक सीवेज क्लिनिंग मशीन पेश की थी, जिसकी कीमत तब 43 लाख थी। अब दिल्ली में ऐसी कितनी मशीनें हैं और इनसे कितना काम लिया जाता है-ये जानकारी नहीं है। मैक्सिको में सीवेज का पूरा सफाई का काम इकोलॉजिकल सेनिटेशन मॉडल पर होता है, ये मॉडल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से जुड़ा होता है। ये मानव अपशिष्ट को ट्रीट करता है। इसमें कूडे़ को पहले चरण में अलग अलग रखा जाता है। सूखा कूड़ा अलग और द्रव आधारित वेस्ट अलग।
दोनों का ट्रीटमेंट प्लांट्स में अलग तरीकों से होता है। फिर द्रव को ट्रीट करके एग्रीकल्चर के कामों में उपयोग करते हैं। अमेरिका में मशीनों का इस्तेमाल होता है। वहां इसके लिए समुचित सुरंगें और उपकरण हैं। इससे ही काम होता है। इस काम में मानव का इस्तेमाल बहुत कम है. यूरोप में भी यही सिस्टम है। वहां सीवेज और सीवर की सफाई पूरी तरह नई तकनीक आधारित और मशीनों के जरिए होती है। साथ ही आटोमेटेड है. लगातार नई तकनीक से इस प्रक्रिया को बेहतर करने का काम भी चलता रहता है।
मलेशिया 1957 में आजाद हुआ और उसके बाद से ही उसने अपनी सीवर सफाई व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू किया। धीरे-धीरे सीवर सफाई को मशीन और फिर चरणबद्ध आटोमेटेड सिस्टम से रिप्लेस कर दिया गया। अब यहां सीवर से जुड़ी सफाई का सारा काम मशीनें करती हैं। मलेशिया की सीवेज इंडस्ट्री काफी बेहतर स्थिति में है। वो लगातार रिसर्च के बाद बेहतर और नए उपकरणों को पुरानों से बदलती रहती है। फिर वहां की सरकार ने सीवेज कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को सब्डाइज्ड किया हुआ है। मलेशिया में अब कोई सफाई कर्मचारी सेप्टिक टैंक में नहीं उतरता। अगर उसको लगता है कि मशीनों से भी ये साफ नहीं हो पा रहा है तो वो नया सैप्टिक टैंक ही बना देते हैं। कुछ ऐसी ही प्रक्रिया जापान और सिंगापुर में भी है।


