- नगर पालिका कार्यालय में तथाकथितों से खूब हुई गलबहियां
जनवाणी संवाददाता |
मुजफ्फरनगर: सिकमी किरायेदारी व बढाये गए प्रीमियम को लेकर एक तरफ जहां व्यापारी समाज का हितैषी होने का ढोंग रचकर चेयरपर्सन के खिलाफ व्यापारियों को आगे करने वाले तथाकथित अपना हित साध रहे है।
वहीं पालिका के कुछ अफसर भी चेयरपर्सन के विरोध में उठने वाले स्वर को धार देने में सहायक नजर आने लगे हैं। कुछ ऐसा ही नजारा शुक्रवार को नगर पालिका कार्यालय में देखने को मिला, जहां बंद कमरे में एक अफसर से तथाकथित गल बहियां करते देखे गए।
गोपनीय गुफ्तगू नहीं तो और क्या कहा जाए कि इस दौरान पानी लेकर या अन्य काम से अंदर जाने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को भी अधिकारी के कोपभाजन का शिकार होना पडा।
दरअसल पिछले काफी समय से नगर पालिका के स्वामित्व वाली दुकानों के प्रीमियम बढोत्तरी व सिकमी किरायेदारी को लेकर नगर पालिका चेयरपर्सन अंजू अग्रवाल के विरूद्ध व्यापारियों ने मोर्चा खोल रखा है, जिसमें कुछ ऐसे भी लोग शामिल है, जिनका इस प्रकरण से दूर तक भी कोई लेना-देना नहीं है।
वह केवल अपनी राजनीति चमकाने के साथ-साथ इस फिराक में हैं कि कहीं से कुछ ‘फील गुड’ हो जाए। बस इसी उधेड़बुन में वह खुद को व्यापारियों का हितैषी होने का ढोंग रचकर पालिकाध्यक्ष के खिलाफ व्यापारियों को खडा करने में अहम भूमिका निभा रहें हैं।
नगर पालिका की 17 मार्किट की 509 दुकानों का पिछले काफी समय से किराए व प्रीमियम में बढोत्तरी नहीं हुई,शासन से पालिका को अपनी आय के स्रोत बढाने का फरमान जारी हुआ तो यह प्रकरण बोर्ड में रखा गया। इसी से नाराज व्यापारियों ने चेयरपर्सन के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया।
न्यायालय के आदेश की प्रतियां गायब होने से संदेह
दरसअल राजेन्द्र प्रसाद मार्किट, गर्बी मार्किट, गोल मार्किट, शिवचौक, गुरूतेग बहादुर मार्किट की बेशकीमती दुकाने नगर पालिका के स्वामित्व वाली सम्पत्ति है। इन दुकानों पर 1977 से किराया प्रीमियम वृद्धि नहीं की गई। शासनादेश को आधार बनाकर चेयरपर्सन ने यह मामला बोर्ड बैठक में रखा।
दुकानों से संबंधित पालिका के हित में न्यायाल ने भी आदेश किया हुआ है। पालिका के महत्वपूर्ण दस्तावेजों से न्यायालय के आदेशों की प्रतियां ही गायब कर दी गई, जिससे पालिका के अधिकारी व कर्मचारी संदेह के दायरे मे चल रहे हैं।
दुकानों पर बखेड़ा क्यों ?
जिन दुकानों को लेकर बखेडा है उन पर गौर किया जाए तो यह दुकानें बेशकीमती है। बाजारी कीमत के हिसाब से इन दुकानों का किराया बहुंत कम है और यह किराया भी पालिका को नहीं मिल रहा, जो इन पर काबिज है उन्होने दूसरे किराएदार रखकर किराया वसूलना शुरू कर दिया है।

