Friday, April 23, 2021
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हाशिए पर धकेल दिए गए दिव्यांग

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भारतीय संविधान समानता के अधिकार के तहत विकलांग लोगों को समान सुविधाएं, सेवाएं और मौके दिए जाने की बात कहता है, लेकिन क्या वाकई ऐसा हो पाता है? आजादी के 72 साल बीत जाने के बाद में भी हमारे पास कोई सटीक आंकड़ा नहीं है जो बता सके कि हमारे देश में विकलांग (दिव्यांग) कितने हैं! पहली बार सरकारी तंत्र ने जल्दीबाजी कर 2001 में विकलांग लोगों की गणना को जनगणना से जोड़ा और उससे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कहा गया कि भारत की मात्र 2.1 प्रतिशत आबादी ही विकलांग है यानी लगभग 2 करोड़ 19 लाख। यह आंकड़े इस तथ्य के बावजूद हैं दिए गए हैं कि हम सब जानते हैं किस तरह गांव के चौपाल पर बैठ कर प्रधान से बतियाते हुए गांव की तथाकथित गणनाकर सटीक जनसंख्या के आंकड़े तैयार किए जाते हैं।

देश में आज लगभग 11 करोड़ के आपास विकलांग हैं। विकलांग से दिव्यांग बनने तक के सफर में न उन्हें कोई राजनैतिक शक्ति का संरक्षण मिला, न ही सामाजिक या आर्थिक ताकत हैं। और न ही सामाजिक बराबरी है। क्या नाम बदलने से ये तंत्र बदल गया? अगर नाम बदलने के बावजूद भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं मिल सकती तो फिर विकलांग से दिव्यांग होने का महत्व ही क्या है? अगर कोई दृष्टिबाधित व्यक्ति वोट देने जाता है तो चुनाव की अगली सुबह ही उसकी तस्वीर अखबारों के पहले पन्ने पर छपती है और सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है।

इन तस्वीरों को भारतीय लोकतंत्र की असली तस्वीर बताया जाता है, मगर अंधेरे में डूबी इन जिÞंदगियों को रोशन करने के लिए कितनी नीतियां बनाई जाती हैं? उनकी मुश्किलों को कम करने के लिए कितने नए रास्ते गढ़े जाते हैं? विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक पूरी दुनिया में लगभग तीन करोड़ 90 लाख दृष्टिबाधित हैंऔर उनमें भी सबसे ज्यादा लोग भारत में हैं। भारत में दृष्टिबाधित लोगों की संख्या डेढ़ करोड़ के करीब है। दृष्टिबाधित मतदाताओं की बड़ी संख्या चुनाव के दौरान लोकतंत्र के जश्न में दूसरों की तरह भागीदार बन पाने से वंचित रह जाती है। भारत सरकार को विकलांग व्यक्ति के कल्याणार्थ हेतु कदम उठाने चाहिए।

भारत सरकार को दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 के सभी प्रावधानों को अति शीघ्र जमीनी स्तर पर लागू किया किया जाना चाहिए। देश व समस्त प्रदेशों में दिव्यांग आयोग तुरंत बनाए जाएं और उसमें सभी पदाधिकारी दिव्यांग हों। केंद्र में, सभी प्रदेश सरकारों में त्रिस्तरीय ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, नगर निगम, नगर पालिका परिषद, नगर पंचायत, सरकारी, अर्द्ध सरकारी, सहकारी एवं अन्य व्यक्तिगत समितियां हाउसिंग सोसायटी कोआॅपरेटिव सोसायटी, गन्ना सोसायटी, विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा व राज्यसभा में विकलांगों का 4 प्रतिशत आरक्षण लागू कर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के अनुरूप सीट रिजर्व की जाएं, क्योकि जब तक विकलांग व्यक्ति विधानसभा, लोकसभा में अपना प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे तब तक सामाजिक न्याय स्थापित ही नहीं हो सकता।

देश में सभी राज्यों के सरकारी विभागों, निगमों एवं निजी सेक्टर में दिव्यांगों का नौकरी व रोजगार में 4 प्रतिशत कोटा सुनिश्चित करके अविलम्ब पूर्ण किया जाए एवं सरकार के सभी पदों पर दिव्यांगों को योग्यता के आधार पर अविलंब पदोन्नति दी जाए। दिव्यांगों का अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न बंद किया जाए। दिव्यांगों व दिव्यांगों के बच्चों को सरकारी व निजी शिक्षा वह भी उच्च शिक्षा संस्थानों में 4 प्रतिशत कोटा सुनिश्चित करते हुए समस्त प्रकार की फीस निशुल्क की जाए।

अनुसूचित जाति जनजाति के अनुरूप दिव्यांगों के लिए सभी जिला स्तर पर कोचिंग सेंटर निशुल्क चलाए जाएं। सार्वजनिक स्थलों, बसों, ट्रेनो, हवाई अड्डों एवं बंदरगाह आदि में स्वरोजगार हेतु दिव्यांगों को दुकानें दी जाएं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की शर्तों में सभी दिव्यांगों एवं उनके आश्रितों को अनिवार्य रूप से अविलंब सम्मिलित किया जाए व दिव्यांगों के लिए अंत्योदय कार्ड अनिवार्य रूप से लागू किया जाए। प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना एवं इंदिरा आवास योजना के लाभ हेतु शर्तों में दिव्यांगों को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए।

विकलांगों के कल्याणार्थ हेतु योजनाएं इतनी हैं कि सैकड़ों पन्ने बहुत आराम से रंगे जा सकते हैं, लेकिन सिवाय इसके कि वो कुछ एनजीओ के पदाधिकारियों की रोजी-रोटी चलाने और कुछ अधिकारियों के घर भरने के ही काम आ रही हैं। जमीन पर लगभग ऊंट के मुंह में जीरा जैसा काम हो रहा है। भारत में विकलांगता किसी अभिशाप से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा आदि राज्यों की हालत सबसे दयनीय है। कई योजनाएं तो इतनी हास्यास्पद हैं कि उनका चुटकुला बनाना ही चुटकुले का अपमान होगा।

जैसे उत्तर प्रदेश में असहाय विकलांग के लिए 500 रुपये माहवार पेंशन का प्रावधान है! यदि किसी अधिकारीपुत्र युवक को यह बात बतायी जाए तो वो मुस्करा कर कहेगा कि इतने का तो एक मीडियम पिज्जा भी नहीं आता! अन्याय यहीं नहीं रुकता। 500 रुपये की पेंशन को पाने के लिए भी सरकारी अस्पताल के दर्जनों चक्कर लगा कर विकलांगता प्रमाण-पत्र बनवाइए।

ये विकलांग प्रमाण-पत्र स्थायी विकलांगता की स्थिति में भी सिर्फ 6 साल 10 साल तक ही मान्य होगा। विकलांग से दिव्यांग बने लोगों को भी समाज में जीने का हक है। यह तभी मुमकिन है जब आम आदमी इन्हें आम बनने दे। वरना वह दिन दूर नहीं जब ये लोग अलग प्रांत जैसी मांग करेंगे, जहां इन्हें सुकून और शांति की जिंदगी मिल सके।


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