
भारत अपनी आजादी के 75वें साल में है, इस मुकाम पर मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय का लगातार अपमान, अलगाव और हाशिए से बहिष्करण की ओर बढ़ना भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। अल्पसंख्यक समुदायों में सरकारी तंत्र के प्रति डर और अविश्वास की भावना गहरी होती जा रही है। अगर यही स्थिति जारी रही तो अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि यह भारत को कहां ले जाएगा। सच्चर कमेटी रिपोर्ट को डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीत चुका है। साल 2006 में जब तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा सच्चर कमेटी की रिपोर्ट जारी की गयी थी तब और अब के भारत में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। यह महज समय बीतने का सामान्य बदलाव नहीं है। इस दौरान भारत की राजनीति और समाज का सफर बहुत उथल-पुथल भरा रहा है। अब यह पहले जैसी नहीं रह गयी है। इसने खुद को अलग तरीके से परिभाषित कर लिया है जिसे वे नया भारत या ‘न्यू इंडिया’ कहते हैं। इस नए भारत में अल्पसंख्यक समुदायों विशेषकर मुस्लिम समुदाय के समस्याओं या हकों की बात करना बहुसंख्यक समुदाय के हितों पर ‘आघात’ माना जाता है जिसे वे अपनी भाषा में ‘तुष्टिकरण’ कहते हैं। ऐसे में अब इस नए भारत में सच्चर कमिटी के रिपोर्ट का कोई वारिस ही नहीं बचा है। आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में उसके सबसे बड़े अल्पसंख्क समुदाय अलग-थलग पड़ चुके हैं।
सच्चर रिपोर्ट का महत्त्व
2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को समझने के लिए जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। 30 नवंबर 2006 को सच्चर कमेटी द्वारा तैयार इस बहुचर्चित रिपोर्ट ‘भारत के मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति’ को लोकसभा में पेश किया गया। संभवत आजाद भारत में यह पहला मौका था जब देश के मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक स्थिति को लेकर किसी सरकारी कमेटी द्वारा तैयार रिपोर्ट को संसद में पेश किया गया था। इसके बाद अब यह रिपोर्ट भारत में मुसलमान समुदाय की सामाजिक-आर्थिक हालत की सबसे प्रमाणिक दस्तावेज बन गई जिसका जिक्र भारतीय मुसलामानों से सम्बंधित हर दस्तावेज में सन्दर्भ के तौर पर अनिवार्य रूप से किया जाता है।
सच्चर समिति रिपोर्ट भारत में मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन को उजागर करने में पूरी तरह से सफल रही है। समिति में बताया था कि किस तरह से मुसलमान आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं,सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है और बैंक लोन लेने में मुश्किलात का सामना करना पड़ता है, कई मामलों में उनकी स्थिति अनुसूचित जाति-जनजातियों से भी खराब है।
रिपोर्ट में बताया गया था कि 6 से 14 वर्ष की आयु समूह के एक-चौथाई मुस्लिम बच्चे या तो स्कूल नहीं जा पाते या बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, मैट्रिक स्तर पर मुस्लिमों की शैक्षणिक उपलब्धि 26 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत के मुकाबले 17 प्रतिशत है और केवल 50 प्रतिशत मुस्लिम ही मिडिल स्कूल पूरा कर पाते हैं जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 62 है। इसी प्रकार से शहरी इलाकों में स्कूल जाने वाले मुस्लिम बच्चों का प्रतिशत दलित और अनुसूचित जनजाति के बच्चों से भी कम पायी गई। यहां 60 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे स्कूलों का मुंह नहीं देख पाते हैं और आर्थिक कारणों के चलते समुदाय के बच्चों को बचपन में ही काम या हुनर सीखने में लगा दिया जाता है।
इस रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व केवल 4.9 प्रतिशत है, इसमें भी ज्यादातर वे निचले पदों पर हैं, उच्च प्रशासनिक सेवाओं यानी आईएएस, आईएफएस और आईपीएस जैसी सेवाओं में उनकी भागीदारी सिर्फ़ 3.2 प्रतिशत थी। संपति और सेवाओं की पहुंच के मामले में भी स्थिति कमजोर पायी गयी थी। सच्चर कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम आबादी के 62.2 प्रतिशत के पास कोई जमीन नहीं है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 43 प्रतिशत है।
समिति द्वारा मुस्लिम समुदाय की स्थिति को सुधारने के लिए कई सुझाव दिए थे जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में स्कूुल, आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थान खोलना, छात्रवृतियां देना, बैंक शाखाएं खोलना, ऋण सुविधा उपलब्ध कराना, वक्फ संपत्तियों आदि का बेहतर इस्तेमाल, समान अवसर आयोग, नेशनल डाटा बैंक और असेसमेंट एंड मॉनिटेरी अथॉरिटी का गठन आदि। सच्चर रिपोर्ट के बाद जस्टिस रंगनाथ मिश्रा और अमिताभ कुंडू समिति की रिपोर्ट भी आर्इं हैं जो सच्चर रिपोर्ट के निष्कर्षों की तस्दीक करती है।
वर्तमान स्थिति
हम 2022 में हैं, आज सच्चर रिपोर्ट के आज डेढ़ दशक बाद मुस्लिम समुदाय की स्थिति में कोई खास फर्क देखने को नहीं मिलता है। साल 2008 के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम समुदाय सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति पर हुई प्रगति को जानने के लिए कोई अध्ययन भी नहीं हुआ है। इस दौरान तीन राज्यों महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय की स्थिति को लेकर रिपोर्ट जारी की गई हैं, जिनसे पता चलता है कि सच्चर रिपोर्ट के बाद से इन तीनों राज्यों में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।
पूसाल 2018 में प्रकाशित पूर्व आईपीएस अधिकारी अब्दुर रहमान की पुस्तक ‘डेनियल एंड डेप्रिवेशन: इंडियन मुस्लिम आफ्टर द सच्चर कमेटी एंड रंगनाथ मिश्रा कमीशन रिपोर्ट्स’ इस बात को सिलसिलेवार तरीके से रेखांकित करती है कि सच्चर कमेटी रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकारों द्वारा गंभीर प्रयास नहीं किए हैं। आज भी मुस्लिम समुदाय साक्षरता दर, स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष, स्नातकों के प्रतिशत, उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भागीदारी आदि के मामलों में बहुत पीछे है। इसी प्रकार से किसी भी अन्य सामाजिक समूहों की तुलना में मुसलमानों में भूमिहीनता का स्तर अधिक है। इसके अलावा देश के शीर्ष कॉपोर्रेट के बोर्डों और सबसे अमीर भारतीयों की सूची में मुस्लिम उपस्थिति दलितों और आदिवासियों की तरह ना के बराबर है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बात करें तो 2014 के भारतीय संसद में मुस्लिम अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
सच्चर रिपोर्ट की वैधता और अल्पसंख्यक के परिभाषा पर पर सवाल
हिंदुतात्वादी संगठनों द्वारा शुरू से ही सच्चर कमिटी का विरोध किया जाता रहा है। संघ विचारक और वर्तमान में भाजपा से राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा सच्चर रिपोर्ट को निशाना बनाते हुए ‘सच्चर कमेटी: कॉन्सपिरेसी टू डिवाइड द नेशन’ नाम से एक किताब भी लिख चुके हैं। इस पुस्तक में उन्होंने भी सच्चर कमिटी की रिपोर्ट की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया था। मध्यप्रेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो बाकायदा विधानसभा में इस रिपोर्ट को ‘सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली’ करार देते हुए इसकी सिफारिशों को लागू करने से इनकार कर दिया था। नरेंद्र मोदी भी गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर इस रिपोर्ट पर अपना तीखा विरोध दर्ज कराते रहे हैं।
हाशिये से बहिष्करण की ओर
पिछले सात सालों के दौरान सच्चर कमेटी के सिफारशों को लागू करने की बात बहुत पीछे छूट चुकी है। आज भारत में मुस्लिम समुदाय अपने वजूद की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। हाशिए से बहिष्करण का यह सफर सिर्फ राजनीतिक नहीं है बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और कानूनी स्तर पर भी है। दरअसल 2014 में केंद्र में बीजेपी की जीत के बाद से मुसलमान राजनीतिक ‘अछूत’ बन गए हैं और अब सत्ताधारी दल के साथ विपक्ष की पार्टियां भी उनकी बात नहीं करना चाहती हैं। एक ऐसा बदलाव है जिसने एक तरह से पहले से ही राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व की कमी से जूझ रहे मुस्लिम समुदाय को लगभग लावारिस बना दिया है।
साल 2019 में लोकसभा चुनाव में जीत के बाद केंद्र की सत्ता पर दोबारा काबिज हुई मोदी सरकार द्वारा एक के बाद एक कई ऐसे कानूनी और वैधानिक कदम उठाए गए, जो बहुसंख्यकवादी देश बनाने की दिशा में बुनियादी कदम है। इसमें मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 की समाप्ति, राम मंदिर निर्माण का कानूनी फैसला, नागरिकता संशोधन बिल और समान नागरिक संहिता की दिशा में तीन तलाक कानून और बाल विवाह अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव जैसे कदम शामिल हैं। आज बहुसंख्यकवादी राजनीति ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बहुत तीखा कर दिया है। ‘वे और हम’ की भावना ने समाज को इस कदर विभाजित किया है कि अब मुसलमानों को एक दुश्मन या अवरोध की तरह देखा जाने लगा है। आज हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा आयोजित ‘धर्म संसदों’ में मुसलामानों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने और उनका ‘सफाया’ करने का खुलेआम ऐलान किया जाने लगा है। 1947 और 2014 के बीच के समय को इस तरह से परिभाषित किया जा रहा है कि इस दौरान कांग्रेस की सरकारों द्वारा मुसलमानों का ‘तुष्टीकरण’ और हिंदुओं के साथ भेदभाव किया गया था।
सच्चर कमिटी की रिपोर्ट ने मुसलमानों, देश,राजनीतिक नेतृत्व और सरकारी एजेंसियों को पहचान के मुद्दों से आगे बढ़ के उनके वास्तविक मुद्दों पर आगे बढ़ने का एक मौका दिया था। दुर्भाग्य से इस मौके को गवां दिया गया है।


