
भगवतीचरण वोहरा, जिनका आज शहादत दिवस है, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के ऐसे अप्रतिम नक्षत्र थे, जिनके गर्वीले आत्मत्याग की आभा में शहीद-ए-आजम भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नजर आता था। अफसोस कि इसके बावजूद देश ने भगत सिंह के बलिदान को तो थोड़ा बहुत याद भी रखा, वोहरा के बलिदान को सिरे से भुला दिया। इसके बावजूद कि आंदोलन के लेखक, विचारक, संगठक, सिद्धांतकार व प्रचारक और काकोरी से लाहौर तक कई क्रांतिकारी कार्रवाइयों में शामिल होने के बावजूद वे न कभी पुलिस द्वारा पकड़े जा सके और न ही किसी अदालत ने उन्हें कोई सजा सुनाई। बावजूद इसके कि उन्होंने कभी भी पकड़े जाने के डर से उक्त कार्रवाइयों में अपनी भागीदारी नहीं रोकी और अपराजेय आदर्शनिष्ठा, प्रतिबद्धता, साहस और मनोयोग से आखिरी सांस तक भारतमाता की मुक्ति के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे। जो आदर-सम्मान की आशा रखे बिना उस मुत्यु के वरण को तैयार हों, जिसके लिए न कोई आंसू बहे और न कोई स्मारक बने।
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वोहरा का जन्म चार जुलाई, 1904 को आगरा के रेल अधिकारी शिवचरण वोहरा के पुत्र के रूप में हुआ था। उनके माता-पिता बाद में लाहौर में बस गए थे, जहां अभी भगवतीचरण की शिक्षा-दीक्षा पूरी भी नहीं हुई थी कि गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन की घोषणा की और वे उसमें कूद पड़े। उन्हें क्या मालूम था कि जिन महात्मा गांधी के आह्वान पर आज वे इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, आगे चलकर उनके ही साथ उन्हें ‘बम की पूजा’ बनाम ‘बम का दर्शन’ के विवाद में उलझना पड़ेगा।
असहयोग आंदोलन के वापस हो जाने पर उन्होंने लाहौर के उसी नेशनल कालेज से बीए किया, जहां वे ‘राष्ट्र की परतंत्रता और उससे मुक्ति के प्रश्न’ पर स्टडी सर्किल चलाते थे और भगत सिंह व सुखदेव जिसके प्रमुख सदस्य थे। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ वगैरह की शहादतों के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के प्रधान सेनापति चन्द्रशेखर ‘आजाद’ ने अपनी आर्मी का पुूनर्गठन कर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाया तो उसमें पंजाब से शामिल होने वालों में भी ये तीनों प्रमुख थे।
वोहरा ने नौजवान भारत सभा बनायी तो भगत सिंह को महासचिव बनाया और खुद प्रचारसचिव बने। वे अपने साथियों में ‘भाई’ के रूप में प्रसिद्ध थे और एक समय उन्होंने अपने कालेज के अध्यापक जयचंद्र विद्यालंकार का, जो खुद भी कां्रतिकारियों की जमात से जुड़े हुए थे, यह आरोप भी झेला कि वे सीआईडी के आदमी हैं और उससे वेतन पाते हैं। लेकिन उन्होंने यह कहकर इसका कोई जवाब नहीं दिया कि ‘मेरा काम जो उचित लगे, उसे करते जाना है, सफाई देना और नाम कमाना नहीं।
उन दिनों उनके पास लाहौर में तीन तीन मकान, लाखों की संपत्ति और हजारों का बैंक बैलेंस था, लेकिन उन्होंने विलासिता को ठुकराकर आजादी के लिए नाना कठिनाइयों वाला क्रांतिकारी रास्ता चुना। 1918 में जब वे 14 साल के ही थे, अभिभावकों ने उन्हें और इलाहाबाद की पांचवीं तक पढ़ी 11 वर्षीया दुर्गावती देवी को एक साथ ब्याह दिया। लेकिन दुर्गावती एक पल को भी उनके रास्ते की बाधा नहीं बनीं। वोहरा के असमय निधन के बाद भी दुर्गावती उनके साथियों की मददगार व सलाहकार ‘दुर्गा भाभी’ बनी रहीं।
वोहरा की दो बड़ी कार्रवाइयां विफल नहीं हो जातीं तो हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास कुछ और होता। इनमें से एक 23 दिसम्बर, 1929 को दिल्ली आगरा रेल लाइन पर वायसराय लार्ड इरविन की स्पेशल ट्रेन उड़ाने की कार्रवाई थी, जिसकी उन्होंने कोई महीने भर जमकर तैयारी की थी। उन्हें ट्रेन के नीचे बम का विस्फोट कराने में सफलता भी मिली थी। विस्फोट से ट्रेन का खाना बनाने व खाने वाला डिब्बा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और एक व्यक्ति की मौत हो गयी थी|
लेकिन वायसराय बालबाल बच गये थे। इस कार्रवाई के बाद महात्मा गांधी ने ईश्वर को धन्यवाद देते हुए ‘यंग इंडिया’ में ‘बम की पूजा’ शीर्षक लेख लिखकर क्रांतिकारियों को कोसा था। जवाब में वोहरा ने चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह से मशवरा करके ‘बम का दर्शन’ लिखा, जो आम लोगों में खासा लोकप्रिय हुआ।
28 मई, 1930 को विफल हुई दूसरी कार्रवाई वोहरा की जान पर तो आ ही बनी, ऐतिहासिक लाहौर षडयंत्र कांड में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सुनायी गयी मृत्युदंड की सजा पर अमल से पहले उन्हें छुड़ा लिए जाने की सारी संभावनाओं का अंत कर डाला। दरअसल, योजना यह थी कि उक्त तीनों को लाहौर जेल से न्यायालय ले जाते समय अचानक धावा बोलकर छुड़ा लिया जाये।
चूंकि उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच लाया ले जाया जाता था, इसलिए इस धावे के लिए अपेक्षाकृत बेहतर तकनीक वाले और ज्यादा शक्तिशाली बमों की आवश्यकता महसूस की गई। वोहरा बम बनाने में सिद्धहस्त थे और लाहौर की कश्मीर बिल्डिंग के जिस किराये के कमरे का वे इसके लिए इस्तेमाल करते थे, उसमें उन्होंने ऐसे नये बम बना भी लिए थे। लेकिन कहीं बम ऐन मौके पर दगा न दे जाए, इस संदेह का निवारण करने के लिए चाहते थे कि कम से कम एक बार उनका परीक्षण कर लिया जाए।
इस परीक्षण के लिए उन्होंने रावी तट चुना और विफल रहकर अपनी जान गंवा बैठे। मौत को कुछ ही पलों के फासले पर खड़ी देखकर भी वे विचलित नहीं हुए और साथियों से दो खास बातें कहीं। पहली-ये नामुराद मौत दो दिन टल जाती तो इसका क्या बिगड़ जाता? मतलब तब वे भगत, सुखदेव व राजगुरु को छुड़ा लेते। दूसरी-अच्छा हुआ कि जो कुछ भी हुआ, मुझे हुआ। किसी और साथी को होता तो मैं भैया यानी ‘आजाद’ को क्या जवाब देता?


