Tuesday, June 28, 2022
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अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती महंगाई

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ग्लोबल मार्केट में सप्लाई पर असर पड़ने से इस समय पूरी दुनिया महंगाई की भीषण मार से जूझ रही है। अमेरिका में खुदरा महंगाई 40 साल में सबसे ज्यादा है तो भारत में भी यह रिजर्व बैंक के दायरे से बाहर निकल चुकी है। महंगाई से न सिर्फ आम आदमी परेशान होता है, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था ही इसके दबाव से सुस्त पड़ जाती है। महंगाई किसी महामारी से कम नहीं है, क्योंकि इससे निजी खपत में बड़ी गिरावट आ जाती है, जो आखिरकार रोजगार और उत्पादन पर भी असर डालता है। अगर महंगाई का असर लंबे समय तक रहे तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी सुस्त पड़ सकती है। अभी भारत की खुदरा महंगाई दर 7.79 फीसदी तक पहुंच गई है, जो बीते 17 महीने में सबसे ज्यादा है।

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रूस के प्राकृतिक गैस का प्रमुख उत्पादक होने के कारण प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से इनकी कीमतों में भारी वृद्धि हो गई है तथा निकट भविष्य में डीजल और पेट्रोल के दाम 15 से 22 रुपये लीटर तक बढ़ सकते हैं। सीएनजी के दाम में भी वृद्धि का रुझान दिखाई देने लगा है।

एविएशन टर्बाइन यूल की कीमतों में वृद्धि से अभी तक हवाई किराए में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है। दिल्ली-मुंबई टिकट, जो फरवरी के पहले सप्ताह के दौरान 4055 रुपये थी, वह अब 5000 रुपये से अधिक हो गई है, जबकि इसमें अभी और वृद्धि होने की संभावना है। रूस और यूक्रेन में तनाव के कारण स्टील, कोकिंग कोल, कॉपर, एल्यूमीनियम जैसी धातुओं की कीमतें भी बढ़ने लगी हैं। इस्पात के दाम में एक सप्ताह के दौरान लगभग 5000 रुपये प्रति टन की वृद्धि हुई है, जबकि कोकिंग कोल के भाव भी 20 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।

एक पखवाड़े के दौरान महंगाई की सर्वाधिक मार रिफाइंड और वनस्पति तेलों पर पड़ी है, जिनके भाव 30 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गए हैं। इसी प्रकार दालें 10-15 रुपये प्रति किलो तक महंगी हो गई हैं। 15 दिनों में दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हो गई है। चार महीने पहले 1800 रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाला गेहूं सरकारी बिक्री बंद होने के कारण अब खुले बाजार में 2300 रुपये तक पहुंच गया है।

आटा 25 रुपये से बढ़कर 30 रुपये, सरसों तेल 150 से बढ़कर 170-180 रुपये, रिफाइंड 140-160 से बढ़कर 175-220 रुपये और दालें 90-100 से बढ़कर 110 रुपये तक पहुंच गई हैं। चावल में 10 से 20 रुपये प्रति किलो तक वृद्धि हो गई है।

सरकारी और निजी क्षेत्र के नियोक्ता अपने कर्मचारियों को महंगाई के असर बचाने के लिए महंगाई भत्ते में इजाफा करते हैं। संगठित क्षेत्र में काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का लाभ मिलता है और उनके वेतन में इजाफा करके उनकी खरीद क्षमता को बढ़ाया जाता है। हालांकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले को महंगाई से जूझना ही पड़ता है।

ऐसे में जिन कर्मचारियों को महंगाई भत्ते का लाभ मिलता है, उनकी खरीद क्षमता पर महंगाई का खास असर नहीं दिखता। मसालों की कीमतों में भी भारी वृद्धि हुई है। धनिया लगभग 30 प्रतिशत तथा जीरा 25-30 रुपये महंगा हो गया है। इससे रसोई का बजट 20 प्रतिशत तक बढ़ गया है। कपास की कीमतों में लगभग 65 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है।

2021 में जो कपास 135 रुपये प्रति किलो थी, वह फरवरी में 219 रुपये प्रति किलो हो गई। रूस-यूक्रेन युद्ध का भारतीय कृषि पर भी असर पड़ता दिखाई दे रहा है। रूस विश्व का प्रमुख खाद सप्लायर है परंतु विश्व समुदाय की ओर से रूस पर लगाए विभिन्न प्रतिबंधों के कारण वहां से विश्व को खाद की आपूर्ति बाधित हो गई है और युद्ध शुरू होने के बाद से खाद की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।

इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में एल्यूमीनियम, लोहे, कॉपर का इस्तेमाल प्रमुखता से होने के कारण पिछले कुछ दिनों में ही फ्रिज, कूलर, पंखों आदि के दाम 10 से 15 प्रतिशत बढ़ गए हैं, जबकि व्यापारिक क्षेत्रों के अनुसार महंगाई की इतनी तेज रफ्तार आमतौर पर नहीं दिखाई देती तथा प्रतिवर्ष दामों में 2 से 5 प्रतिशत तक का ही उछाल होता रहा है।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि यूक्रेन संकट की वजह से वैश्विक स्तर पर बढ़ रही कच्चे तेल की कीमतों से भारतीय अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से प्रभावित होगी। केंद्र सरकार इस प्रभाव को कम करने के लिए तेल के वैकल्पिक माध्यम भी तलाश कर रही है।

महंगाई की दर अगर दायरे से बाहर निकल जाए तो अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाल सकती है। इससे निजी खपत घट जाएगी, जिसका असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ेगा और उत्पादन भी गिर जाएगा। यही कारण है कि रिजर्व बैंक ने अप्रैल के शुरूआती हफ्ते में जारी मौद्रिक नीति समिति के फैसलों में विकास दर अनुमान को घटा दिया है।

महंगाई का दबाव ऐसा रहा कि रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने 2022-23 के लिए खुदरा महंगाई की औसत दर का अनुमान पहले के 4.5 फीसदी से बढ़ाकर 5.75 फीसदी कर दिया। दूसरी ओर जीडीपी की विकास दर का अनुमान जो पहले 8 फीसदी से ज्यादा था, उसे घटाकर 7.2 फीसदी कर दिया है।

अगर महंगाई की दर 4-5 फीसदी के दायरे में रहती तो यह अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाने में कारगर साबित होती है। वेतनभोगी वर्ग को महंगाई के सापेक्ष भत्ता मिलता है, जिससे उनकी खपत पर ज्यादा असर नहीं पड़ता।

इस दौरान कंपनियों की कमाई भी बढ़ती जाती है और उनके स्टॉक के साथ बाजार मूल्य में भी इजाफा हो जाता है। इसका सीधा लाभ निवेशकों को मिलता है, जिससे वे और ज्यादा पैसे लगाने को लेकर प्रोत्साहित होते हैं।


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