Friday, April 24, 2026
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कहीं कहानियों में याद बनकर न रह जाए गौरैया

  • विश्व गौरैया दिवस पर स्कूल-कॉलेजों में आयोजित किए जाएंगे कार्यक्रम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: गौरैया जो एक समय तक गांवों और शहरों के हर घर में फुदकती नजर आती थी। गर्मियों में पानी के आसपास चहल कदमी करती वो गौरैया अब कहीं-कहीं ही नजर आती है। पेड़ों के काटे जाने और घरों के आसपास का माहौल बदलने के कारण उनकी संख्या लगातार घटती जा रही है। अगर लोगों ने गौरैया को बचाने के लिए पहल नहीं की तो वह दिन दूर नहीं जब गौरैया सिर्फ किताबों और कहानियों में ही याद बनकर रह जाएगी।

बता दें कि गौरैया एक छोटी प्रजाति की चिड़िया है। यह एशिया, अमेरिका, यूरोप आदि देशों में पाई जाती है। इंसान जहां भी अपना घर बनाते हैं यह वहीं पर पहुंच जाती है। इसलिए इसको घरेलू चिड़िया यानी हाउस स्पैरो भी कहा जाता है। आज भारत ही नहीं दुनियाभर में गौरैया की संख्या कम हो रही है। शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह की प्रजातियां पाई जाती हैं।

इनमें हाउस स्पैरो, स्पेनिस स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसैट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो शामिल हैं। इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है। बताया गया कि गौरैया सामान्य रूप से घरों में घोंसले बनाती है। बहुमंजिली इमारतों के बनने के बाद गौरैया को घोंसले रखने की जगह नहीं मिल रही। पहले घर बड़े हुआ करते थे। पंछियों के आने के लिए झरोखे बनाए जाते थे, लेकिन अब शहर के साथ ही गांवों में घरों के निर्माण में भी बदलाव आ गया है।

प्रदूषण, विकिरण, कटते पेड़ आदि के कारण शहरों का तापमान तेजी से बदल रहा है। गौरैया बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार आदि पेड़ों को ज्यादा पसंद करती है। गौर करने वाली बात यह है कि गौरैया के संरक्षण को लेकर शहर में कुछ लोग आज भी जागरुक है। वे गौरैया के लिए लकड़ी के घर लगाते हैं और रोजाना उन्हें दाना डालते हैं।

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एनएएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. देवेश चंद्र शर्मा बताते हैं कि साल 2011 में कॉलेज के शिक्षक डॉ. विवेक त्यागी, डॉ. नवीन गुप्ता, डॉ. देवेश टंडन आदि ने मिलकर गौरैया मित्र क्लब का गठन किया था। इसके बाद लोगों को जागरूक करने का काम किया। वहीं एनवॉयरमेंट क्लब के अध्यक्ष सावन कन्नौजिया भी गौरैया को लेकर कई साल से काम कर रहे है।

2010 से मनाया जाता है गौरैया दिवस

गौरैया की लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। वजन 25 से 32 ग्राम तक होता है। गौरेया अधिकतर झुंड में ही रहती है। भोजन तलाशने के लिए गौरेया का एक झुंड अधिकतर दो मील की दूरी तय करता है। इसको बचाने के लिए साल 2010 से हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।

इन रखें ध्यान

  • गर्मी के दिनों में अपने घर की छत पर बर्तन में पानी भरकर रखें।
  • बालकनी, छत और पार्कों में गौरैया को खाने के लिए कुछ अनाज छतों और पार्कों में रखें।
  • गौरैया को कभी नमक वाला खाना नहीं डालना चाहिए, नमक उनके लिए हानिकारक होता है।
  • प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
  • बाजार में लकड़ी के घर बिक रहे हैं, इनको घर के बाहर सुरक्षित जगह पर लटका सकते हैं।
  • आंगन और पार्कों में कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी जैसे पौधे लगाएं।

मिट्टी के सकोरे वितरित कर महिलाओं को बनाया गौरैया सखी

एनवायरमेंट क्लब द्वारा चलाए जा रहे कहां गई मेरे आंगन की गौरैया अभियान के तहत व विश्व गौरैया दिवस की पूर्व संध्या पर देवलोक कालोनी में निशुल्क सकोरा वितरण किया गया। इस अवसर पर कॉलोनी की महिलाओं को मिट्टी के सकोरे वितरित कर उन्हें गौरैया सखी नियुक्त किया गया। क्लब संस्थापक सावन कन्नौजिया ने सभी से अपील करते हुए कहा कि प्रकृति की अभिन्न अंग नन्ही गौरैया को बचाने के लिए व्यक्तिगत स्तर से प्रयास होने चाहिए।

महिलाओं को गौरैया सखी के बैज लगाकर उनसे सकोरों में सुबह शाम पानी रखने का आह्वान किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित हुए सभी लोगों को गौरैया और पक्षियों के संरक्षण की शपथ दिलाई गई। इस अवसर पर सुषमा गुप्ता, अनिरुद्ध पुंडीर, सुहानी, पार्थ, वत्सल पटेल, सूरज, अंकित, देवांक, शुभम, सावन आदि उपस्थित रहे।

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