जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: लोकसभा सचिवालय ने TMC के 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर जवाब मांगा है। ये नोटिस अभिषेक बनर्जी की ओर से दायर अयोग्यता याचिकाओं के संबंध में भेजे गए हैं। TMC का आरोप है कि इन सांसदों ने पार्टी से अलग होकर NCPI का साथ दिया है। पार्टी इसे स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना मानते हुए दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का आधार बता रही है। हालांकि, बागी सांसद अपने कदम को वैध विलय करार दे रहे हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि अहम मुद्दा केवल नोटिस जारी करना नहीं, बल्कि अयोग्यता की कार्यवाही को निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरा करना है।
25 अगस्त को जारी हुआ नोटिस
लोकसभा सचिवालय ने 25 अगस्त को 20 सांसदों को नोटिस भेजा। इसके साथ अभिषेक बनर्जी की ओर से 18 जून को दाखिल की गई अयोग्यता याचिका की प्रति भी भेजी गई है। यह याचिका लोकसभा सदस्यों के दलबदल के आधार पर अयोग्यता नियम, 1985 के नियम 6 के तहत दाखिल की गई थी। सांसदों से नोटिस प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर याचिका पर अपनी टिप्पणी और जवाब दाखिल करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताने के एक दिन बाद हुई। बनर्जी ने दलबदल के आधार पर दायर अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। बनर्जी ने अयोग्यता की कार्यवाही में कथित देरी को चुनौती देते हुए मामले का शीघ्र निपटारा करने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा- सवाल समयसीमा का है
सुप्रीम कोर्ट ने 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और सदन के महासचिव को अलग से नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि वह लोकसभा अध्यक्ष और महासचिव की ओर से पेश हो रहे हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मुद्दा नोटिस जारी करने का नहीं है, बल्कि यह है कि पूरी कार्यवाही निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी हो।
पहले भी जल्द कार्रवाई की मांग कर चुके हैं अभिषेक बनर्जी
अभिषेक बनर्जी ने इससे पहले भी 20 सांसदों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। उन्होंने इन मामलों में जल्द फैसला लेने की मांग की थी। इस सिलसिले में उन्होंने 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात भी की थी। इससे पहले 27 जुलाई को लिखित रूप से मामले में शीघ्र कार्रवाई की मांग की गई थी।
TMC संसदीय दल में बगावत से शुरू हुआ विवाद
यह विवाद TMC के संसदीय दल में बगावत के बाद शुरू हुआ। पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने घोषणा की थी कि वे नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हो गए हैं या उसका हिस्सा बन गए हैं। यह त्रिपुरा स्थित एक राजनीतिक संगठन बताया गया है। बागी सांसदों ने लोकसभा में अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग भी की थी। इसके बाद संसद में इन सांसदों को NCPI के समूह के रूप में माना गया। वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संसदीय गतिविधियों में भी हिस्सा लेते रहे हैं।
TMC का दावा- पार्टी छोड़ना दलबदल कानून के दायरे में
TMC का कहना है कि सभी 20 सांसद उसके चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं। ऐसे में किसी दूसरे राजनीतिक संगठन के साथ जाने का फैसला स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने के बराबर है। पार्टी के मुताबिक, इस आधार पर सांसदों को दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराया जा सकता है। वहीं, बागी सांसदों का तर्क है कि उनका कदम वैध विलय के दायरे में आता है और इसलिए उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती।
इन 20 सांसदों के खिलाफ दायर हुई याचिका
अभिषेक बनर्जी की याचिका में काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, रचना बनर्जी, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, पार्थ भौमिक, अरूप चक्रवर्ती, अधिकारी दीपक देव, सायनी घोष, बापी हलदार, मोहम्मद अबू ताहेर खान, कालीपद सरन खेड़वाल, असीत कुमार माल, जून मलिया, मिताली बाग, खलीलुर रहमान, माला रॉय, शर्मिला सरकार और यूसुफ पठान के नाम शामिल हैं।
अब 7 दिन में देना होगा जवाब
लोकसभा सचिवालय के नोटिस के बाद सभी 20 सांसदों को सात दिनों के भीतर अपना पक्ष रखना होगा। उनके जवाब के बाद दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही किस दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर नजर रहेगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद इस पूरी प्रक्रिया के जल्द पूरा होने की उम्मीद भी बढ़ गई है।

