Wednesday, October 27, 2021
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Homeसंवादसामयिक: महामारी में जनतंत्र का संकुचन

सामयिक: महामारी में जनतंत्र का संकुचन

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सुभाष गाताडे
विश्वप्रसिद्ध रचना ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ के लेखक डैनियल डेफो, बहुआयामी किस्म के व्यक्ति थे, व्यापारी थे, पत्रकार थे, लेखक थे, पर्चे भी लिखते थे। लंदन के निवासी रहे डैफो ने उनके जमाने में आए प्लेग की महामारी-जिसमें हजारों लोग मर गए थे-बाकायदा एक लम्बा पर्चा लिखा है, ‘ए जर्नल आफ द इयर आफ द प्लेग’ जो वर्ष 1722 में प्रकाशित हुआ था। महामारी के दिनों में लोगों का व्यवहार, सामाजिक व्यवहार तथा प्रशासन के स्तर पर कैसे चीजें चलती हैं, इसके बारे में वह अपना अवलोकन प्रस्तुत करते हैं, वह अपने आप में दिलचस्प है। सरकारें किस तरह असली स्थिति से लोगों को अवगत कराने से बचती हैं, गलत आंकड़ें पेश करती हैं, इसका भी वह वर्णन करते हैं, किस तरह बीमारी के लिए ‘अन्य’ को जिम्मेदार ठहराती हैं, इसकी भी वह बात करते हैं। इस रिपोर्ट के अंश को पलटते हुए बरबस कोविड महामारी से निपटने में सरकारी प्रयासों की खामियों की याद आना स्वाभाविक है।
फिलवक्त यह तो पता नहीं कि क्या 17 वीं सदी के ब्रिटेन में भी ऐसे ‘अन्य’ कहे गए लोगों-समुदायों पर मुकदमे चलाए गए थे या नहीं या उन्हें निशाना बना कर प्रताडित किया गया था नहीं, लेकिन 21 वीं सदी के भारत में तो कोविड महामारी ने ऐसे नजारों को बहुत देखा, जब समुदाय विशेष पर इसका लांछन लगाया गया, उससे जुड़े लोगों को प्रताड़ना का शिकार बनाया गया। तबलीगी जमात को कोविड महामारी के सुपर स्प्रेडर के तौर पर चिन्हित करने की चंद माह पहले चली उस बहस की ओर मुड़ कर देखें, जब किस कदर लागों के एक हिस्से को निशाना बनाया गया और अब वह समूची बहस इतिहास का हिस्सा बना दी गई है। यह उसी उदासी का ही प्रतिबिम्बन है कि तबलीगी जमात के सम्मेलन में शामिल होने आए छत्तीस विदेशियों को रिहा करते हुए दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मैजिस्टेट ने दिल्ली पुलिस के बारे में जो तीखी बातें कहीं, उस पर मौन ही बना रहा।
फैसला देते हुए मजिस्टेट ने इस संभावना को रेखांकित किया कि मुमकिन हो कि ‘पुलिस ने इन लोगों को दुर्भावना से प्रेरित होकर पकड़ा हो तथा केंद्रीय ग्रह मंत्रालय के निर्देशों के तहत फंसाना चाहा हो।’ निश्चित ही यह कोई पहला मौका नहीं था कि अदालतों ने कोरोना संक्रमण के लिए संस्था विशेष या समुदाय विशेष से जुड़े लोगों को चुन चुन कर निशाना बनाने को लेकर अपनी घोर असहमति प्रगट की हो। मुंबई उच्च अदालत की औरंगाबाद पीठ ने तो ऐसे मसले पर सरकार की बुरी तरह भर्त्सना की : ‘एक राजनीतिक सरकार ने बली का बकरा बनाने की कोशिश की जब एक महामारी या आपदा चल रही थी और परिस्थितियां बता रही हैं कि ऐसी संभावना है कि इन विदेशियों को इसके लिए चुना गया।’ सवाल उठता है कि क्या एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने में उनकी कथित भूमिका को लेकर तथा उनके हाशियाकरण को लेकर कभी हुक्मरानों को या उनसे संबंधित तंजीमों को कभी जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा? क्या वह अपने इन कारनामों को लेकर कभी जनता से माफी मांगेंगे?
क्या मीडिया का एक बड़ा हिस्सा-जो इस घृणित मुहिम में शामिल था और जिसने भारत के समावेशी सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की काफी कोशिश की, क्या उसे कभी अपनी इन हरकतों के लिए तथा इसके चलते अल्पसंख्यक समुदायों के अधिक हाशियाकरण को मुमकिन बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा?
निश्चित ही नहीं, कम से कम आने वाले भविष्य में। यह ऐसा वक्त है कि विशिष्ट समुदाय के इस खुल्लमखुल्ला ‘अन्यीकरण’ को, किसी धार्मिक संस्था के दानवीकरण को रफ़्ता-रफ़्ता  सामान्यीकृत किया जा रहा है और इस पर कोई सवाल भी नहीं उठ रहे हैं। आज आलम यह है कि यह लांछनाकरण जो पहले विशिष्ट समुदायों तक तक सीमित था या असहमति रखने वाले विद्वानों एक्टिविस्टों तक सीमित था, वह सिलसिला अब व्यापक जनांदोलनों तक भी पहुंच गया है जिन्होंने हुकूमत द्वारा पेश किए जा रहे वर्चस्ववादी आख्यान को चुनौती दी है। तीन दमनकारी फार्म बिलों के विरोध में खड़े ऐतिहासिक किसान आन्दोलन को देखें।
एक माह से अधिक वक्त बीत गया, जब लाखों किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर धरना दे रहे हैं, ताकि इन दमनकारी कानूनों को सरकार वापस ले, जिनके जरिए उन्हें लगता है कि इस हुकूमत ने एक तरह से उनकी तबाही और बरबादी के वॉरंट पर दस्तखत किए हैं। किसानों के इस शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए देश भर में भी समर्थन मिल रहा है। देश के कोने-कोने में इस मसले पर किसान और उनकी मित्र शक्तियां संघर्षरत हैं।
सरकार के अपने जो भी दावे हों कि यह तीनों कानून-जिन्हें महामारी के दिनों में पहले अध्यादेश के जरिए जारी किया गया था और जिन्हें तमाम जनतांत्रिक परंपराओं को ताक पर रखते हुए संसद में पास किया गया-किसानों की भलाई के लिए हैं, लेकिन यह सभी के लिए साफ हो रहा है कि इनके जरिए राज्य द्वारा अनाज की खरीद की प्रणाली को समाप्त करने और इस तरह बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए ठेका आधारित खेती का रास्ता सुगम करने, उन्हें आवश्यक खाद्य सामग्री की बड़ी मात्रा में जमाखोरी करने के रास्ते सुगम किए जा रहे हैं। लोगों के लिए यह भी साफ है कि यह महज किसानों का सवाल  नहीं है, बल्कि इसके जरिए मेहनतकश अवाम के लिए अनाज की असुरक्षा का सवाल भी खड़ा हो रहा है।
इसके बजाय कि सरकार इन आंदोलनरत किसानों के साथ एक सार्थक वार्ता करे उसकी तरफ से इस आंदोलन के दमन की तमाम कोशिशें चल रही हैं। एक दिन भी नहीं बीतता जब इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए सरकार की तरफ से कोई नया शिगूफा, कोई नई गाली उछाली जाती है। किसानों को ‘खालिस्तान समर्थक’ , माओवादी कहलाने से लेकर ‘अर्बन नक्सल और उन्हें राष्ट्रद्रोही या फर्जी किसान क्या क्या नहीं कहा जा रहा है। सवाल उठता है कि उस जनतंत्र का क्या स्वरूप बचता है, जब बहस मुबाहिसे को सचेतन तौर पर स्थगित किया जाता है, असहमति पर अधिकाधिक लांछन लगाया जाता है और निर्णयों को अधिकाधिक केंद्रीकृत किया जाता है? मौजूदा हुक्मरानों की तरफ से भारत के ‘नए इंडिया’ में प्रवेश की बात का ढिंढोरा अक्सर पीटा जाता है, अब यही कहना मुनासिब होगा, यह ‘नया इंडिया’ जनतंत्र के अधिकाधिक संकुचन की और रफ़्ता-रफ़्ता अधिनायकतंत्र की तरफ उन्मुख होने की यात्रा का प्रत्यक्षदर्शी बनता दिख रहा है।

 


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