Sunday, May 16, 2021
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नृत्य में ध्यान योग है

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व्यक्ति असाधारण संरचना है। शरीर प्रत्यक्ष है। अंत:करण अप्रत्यक्ष है। हमारे कर्म तप भौतिक हैं। इनके प्रेरक तत्व हमारे भीतर हैं। प्रेरणा दिखाई नहीं पड़ती। इसकी वा‘ गतिविधि दिखाई पड़ती है। जब हर्ष, उल्लास दुख-सुख के भाव बाहर प्रकट होते हैं, तब दिखाई पड़ते हैं। अंत:करण स्वभाव का केन्द्र है। इसी उपासना का नाम अध्यात्म है। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-‘स्वभावों अध्यात्म उच्यते।’ स्वभाव को अध्यात्म कहते हैं। स्वभाव आनंद का केन्द्र हो सकता है और दुख संताप का केन्द्र भी। भारत के मनीषियों व चिन्तकों ने अंत:करण के उल्लास-संवर्द्धन के लिए अनेक उपाय खोजे हैं। ईश्वर का आनंददाता कहा गया है भक्ति, भजन, ज्ञान संन्यास को भी आनंदमार्ग बताया है। यही सब अध्यात्म कहा जाता है। भारतीय दर्शन का अध्यात्म सुखदाता और आनंददाता हैं।

आनंद की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति नृत्य है। भारत का अध्यात्म भी नृत्य करता है। नृत्य परिपूर्ण अध्यात्मिक आनंद है। बोधगम्य होकर भी अबोध गम्य। नृत्य अद्वितीय कृत्य है। यह आनंदरस पूर्ण है। नृत्य व्यक्तिगत कृत्य है लेकिन आध्यात्मिक कृत्य भी है। मेघ आते हैं, कड़कते गजरते। भारतीय सौन्दर्य बोध में नाचते हुए। जलरस आकाश से झरता है। मोर अपनी पुलक में उछलते हैं। संवेदनशील पूर्वजों ने इसे नृत्य कहा है। ऋग्वेद का सोम रस भी नाचते हुए कलश में गिरता है। सोम पदार्थ है।

सोम देवता भी है। इसलिए अध्यात्म भी है। गीत और नृत्य उल्लास में उगते हैं। आंतरिक उल्लास अध्यात्म है। नृत्य समूची भाव उल्लास राशि को देह पर प्रकट करता है। जान पड़ता है कि नृत्य गीत से ज्यादा प्राचीन है। गीत का जन्म भाषा बोली के बाद हुआ। आदिम समाज में एक समय बोली भाषा थी ही नहीं। देह ही भाषा का काम करती थी। आज हाव-भाव प्रकट करने के लिए कंधे उचकाना आदि को ‘बाडी-लैंगवेज’ कहा जाता है। लेकिन आदिम काल में आंख या हाथ के संकेत ही भाषा का विकल्प थे।

प्रीति मुद मोद और प्रमोद के संकेत भी दैहिक थे। तभी किसी रसपूर्ण मुहूर्त में परिपूर्ण आनंद के पर्यायवाची अध्यात्म के प्रभाव में दैहिक कृत्य से नृत्य का जन्म हुआ। अस्तित्व नृत्यमगन है। अध्यात्म अस्तित्व की प्रीति है। इसने भारत के मन को लगातार मोहित किया है। अस्तित्व अपनी मूल प्रकृति में सत्चित आनंद है। सो नृत्य मगन है। श्रीकृष्ण भी नाचते थे। उन्होंने अर्जुन को बताया कि ‘ईश्वर सबके हृदय में बैठा है और सबको नचाता है।’ मेरे संशयी चित्त में कई बार प्रश्न उठा कि आखिर क्यों नचाता है हमको ईश्वर? जान पड़ता है कि नृत्य सर्वोत्तम उल्लास है अस्तित्व का। तुलसीदास ने भी गीता की ही परंपरा में लिखा है – सबहिं नचावत राम गोसार्इं। अस्तित्व का प्रेम निमंत्रण है-नाचो। अपनी परिपूर्णता में नाचो। अपनी धुरी में नाचो। देह परिधि से भीतर जाकर देखो, नाचता हुआ अन्त: क्षेत्र। निमंत्रणदाता वही है उल्लास है उत्साह का। नृत्य उत्सव में अस्तित्व के साथ एक होने का आनंद लो। यह आध्यात्मिक है।

नृत्य में ध्यान योग है। इस समय दूसरा कोई काम नहीं कर सकते। दूसरा कोई विषय सोच भी नहीं सकते। नृत्य में सोचविचार का अतिक्रमण होता है। सोच विचार का अतिक्रमण अध्यात्म है। नृत्य में बुद्धि, विचार और तर्क गिर जाते हैं। तब अंदर का आनंद ही देह पर प्रकट होकर नृत्य बनता है। नृत्य में गति है, इस गति पर भाव का उत्प्रेरण है। नर्तक भी एक प्राणी है इसलिए दिक्-काल के भीतर है लेकिन नृत्य की संपूर्णता में वह दिक्काल का भी अतिक्रमण भी करता है। तब नर्तक नहीं बचता, नर्तक स्वयं नृत्य बन जाता है। ऊर्जा का ऐसा रूपान्तण रसपूर्ण है। नृत्य अध्यात्म का भौतिक प्रस्तुतिकरण है।

ब्रह्म को माया में लाने की कार्रवाई। आध्यात्मिक ऊर्जा आनन्द बनती है। शरीर मन और बुद्धि का हरेक अणु-परमाणु कम्पित होता है आनंद अतिरेक से। नृत्य सामान्य दृश्य नहीं होता। वैसे भी दृश्य और कृत्य में अन्तर होते हैं। दृश्य एक विषय है। हम उसे देखते हैं। भोक्ता होते हैं। नृत्य भी दृश्य होता है। लेकिन नृत्य करने में हम पहले कर्ता होते हैं, फिर क्रिया बनते हैं। आनंद अतिरेक के चरम पर हम कर्ता नहीं होते। तब नृत्य हमारा कृत्य नहीं होता। हम स्वयं को पुनजीर्वित करते हैं, प्रतिपल, हर नये पल। जान पड़ता है कि माता पृथ्वी भी पिता आकाश की प्रीति में आ‘ाद और प्रसाद रस के अतिरेक में सूर्यदेव के चक्कर लगाती हैं नाचते हुए ही।

नृत्य प्राचीन भारतीय अभिव्यक्ति और कला है। नृत्य भी अन्तत: मुक्त करता है। यूरोप आदि क्षेत्रों में कला का उद्देश्य रमण सुख है, मनोरंजन ही है। मनोरंजन में मर्यादा की रेखा होती नहीं। यह अधिकतम देह दर्शन तक जाता है। तब भव्य भी भदेस हो जाता है। लेकिन भारत में गीत संगीत और नृत्य का उद्देश्य लोक को आनंदरस से परिपूरित करना रहा है। आनंद रस आपूरित लोक इस रस को फिर फिर लौटाता है इसी लोक में। ऋतुएं भी यहां नाचते हुए आती हैं। वर्षा ऋतु स्वयं नृत्य विशारद है।

बादल नाचते हुए आते हैं। विद्युत नायिका जैसी देहयष्टि दिखाती है। लपालप लेकिन क्षणभंगुर। वर्षा भारत के मन को लहकाती और नचाती रही है। इसलिए यहां अनेक उत्सव हैं। उत्तर भारत में जलविहार उत्सव होते हैं। गांव के किसी तालाब या नदी तट पर नाच गाना और गलमिलौवल। श्रीकृष्ण जन्म के नृत्य उत्सव इसी ऋतु में है और नागपंचमी व रक्षाबंधन भी। लेकिन कजरीतीज गायन नर्तन का ही पर्व है। गणेश चतुर्थी, दुगार्पूजा और इसके बाद विजयपर्व सहित सभी उत्सव एकाकी मनुष्य को लोकमधु में डुबोते हैं। होली का रस ऐसा ही है।

लोक का हरेक अंश नृत्यमगन है। यहां कुछ भी स्थिर नहीं। परमाणु का अन्तर्जगत भी नाच में मस्त है। शिव सभी लोकों की नृत्यमगन आनंद आपूरित चेतना हैं और श्रीकृष्ण भी। शिव मनुष्य नहीं। विराट अस्तित्व की महाऊर्जा हैं। श्रीकृष्ण मनुष्य हैं। उनकी अनेक कथाएं हैं लेकिन वे पूर्ण दिखाई पड़ते हैं नृत्य में। श्रीकृष्ण एक हैं लेकिन एक ही समय अनेक के साथ नृत्य करते हैं। ऋग्वेद के सत्य की तरह।

सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से गाते हैं। नाचते कृष्ण भी एक हैं लेकिन नाचते हुए अनेक दिखाई पड़ते हैं। श्रीकृष्ण की परिपूर्णता नृत्य में प्रकट हुई और इसी परिपूर्णता का आख्यान गीता है। नृत्यशास्त्र के पंडित इस कला का इतिहास खोजते हैं। यूरोपीय विद्वान सब कुछ जानने का ढोंग करते हैं। भारतीय नृत्य 1920-30 ई0 के आसपास यूरोप पहुंचा। उन्हें अद्भुत और अद्वितीय लगा।

दुखी मनुष्य पूरा नहीं होता। अधूरा रहता है। अध्यात्म के साथ उसकी संगति नहीं। उसकी जीवन वीणा में संगीत नहीं। सुखी भी अधूरा है। गीत नहीं, प्रीति नहीं। सुख भी क्षणभंगुर है। आनंदित मनुष्य साधारण नहीं रह जाते। वे असाधारण होते हैं। उनके चित्त में गीत उगते हैं, नृत्य खिलते हैं। नृत्य के चरम में नर्तक संज्ञा नहीं क्रिया हो जाता है। अपने प्रारम्भिक चरण में कर्ता से जुड़ा हुआ।

उसके प्रयास का भाग। लेकिन नृत्य के चरम में कर्ता डूब जाता है। नर्तक नृत्य हो जाता है। डब्लूबी यीटस की समस्या है, नृत्य में हम नर्तक को कैसे पहचानें? समस्या बड़ी है भी। तब नर्तक होता ही नहीं। यीट्स ने भी भारतीय प्रतीति दोहराई है। भारतीय चिंतन का अध्यात्म बड़ा प्यारा है। लोक अस्तित्व का प्रतिनिधि है। अध्यात्म इसका केंद्र है। इसलिए अध्यात्म भी नाचता हुआ हमको नृत्य के लिए प्रेरित करता है।


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