Saturday, March 21, 2026
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आक्सीजन का स्तर बढ़ाने को पेट के बल लेटने की जरूरत : सीएमओ

  • दायें एवं बाएं करवट सोने से भी मिलती है राहत
  • गर्भवती, हृदय एवं स्पाइन रोगी पेट के बल सोने से करें परहेज

जनवाणी ब्यूरो |

सहारनपुर: कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच उपचाराधीन में आॅक्सीजन की कमी की समस्या सबसे अधिक देखी जा रही है। शरीर में आक्सीजन की कमी होने के कारण कई कोरोना पॉजिटिव को अस्पताल जाने की जरूरत भी पड़ रही है, लेकिन होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज अपने सोने की पोजीशन में थोड़ा बदलाव कर आॅक्सीजन की कमी को दूर कर सकते हैं। यह जानकारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. बीएस सोढ़ी ने दी। उन्होंने बताया स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने इस संबंध में पोस्टर के माध्यम से विस्तार से जानकारी दी है।

पेट के बल लेटने के लिए चार-पांच तकिए की जरूरत

यदि किसी कोरोना पॉजिटिव को सांस लेने में दिक्कत हो रही हो एवं आक्सीजन लेवल 94 से घट गया हो तो ऐसे में उसे पेट के बल सोने की सलाह दी जाती है। इसके लिए सबसे पहले पेट के बल लेटें, एक तकिया अपनी गर्दन के नीचे रखें, एक या दो तकिया छाती के नीचे रख लें एवं दो तकिया पैर के टखने के नीचे रखें।

इस तरह से 30 मिनट से दो घंटे तक सो सकते हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस बात पर भी विशेष जोर दिया है कि होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों की तापमान की जाँच, आक्सीमीटर से आॅक्सीजन के स्तर की जाँच, ब्लड प्रेशर एवं शुगर की नियमित जाँच होनी चाहिए।

सोने की चार पोजीशन फायदेमंद

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कोरोना पॉजिटिव मरीजों के लिए सोने की चार पोजीशन को महत्वपूर्ण बताया है, जिसमें 30 मिनट से दो घन्टे तक पेट के बल सोने, 30 मिनट से दो घन्टे तक बाएं करवट, 30 मिनट से दो घन्टे तक दाएं करवट एवं 30 मिनट से दो घन्टे तक दोनों पैरों को सीधाकर पीठ को किसी जगह टिकाकर बैठने की सलाह दी गयी है। यद्यपि, मंत्रालय ने प्रत्येक पोजीशन में 30 मिनट से अधिक समय तक नहीं रहने की भी सलाह दी है।

इन बातों का रखें ख्याल

  • खाने के एक घन्टे तक पेट के बल सोने से परहेज करें
  • पेट के बल जितना देर आसानी से सो सकतें हैं, उतनी ही देर सोने का प्रयास करें
  • तकिए को इस तरह रखें, जिससे सोने में आसानी हो

इन परिस्थियों में पेट के बल सोने से बचें

  • गर्भावस्था के दौरान
  • वेनस थ्रोम्बोसिस ( नसों में खून के बहाव को लेकर कोई समस्या)
  • गंभीर हृदय रोग में
  • स्पाइन, फीमर एवं पेल्विक फ्रैक्चर की स्थिति में
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