Wednesday, April 22, 2026
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कानून से ऊपर कोई नहीं

Nazariya 20

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             राजेश माहेश्वरी

उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के जिले लखीमपुर केस में शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बाद मुख्य आरोपी आशीष मिश्र ने अदालत में सरेंडर कर दिया है। आशीष जमानत पर जेल से बाहर थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता और आरोपी की पारिवारिक पृष्ठभूमि के मद्देनजर आरोपी की जमानत को रद्द कर डाला।

आशीष के जमानत मिलने पर हिंसा के शिकार परिवार, सामाजिक और किसान संगठनों ने इसका विरोध किया था। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल से ये बात पूरी तरह साफ हो गई है कि कानून अपना काम करेगा। वास्तव में भारतीय लोकतंत्र अभी भी भागीदारी वाला लोकतंत्र नहीं बन सका है।

हमारे यहां सत्ताधारी वर्ग में खुद को विशिष्ट व कानून से परे मानने की प्रवृत्ति हावी है। कुछ समय पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने लखीमपुर खीरी कांड के मुख्य अभियुक्त बताये जा रहे आशीष मिश्रा को जमानत दे दी थी। सवाल खड़े किये गये कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जमानत को चुनौती क्यों नहीं दी।

वह भी विशेष जांच दल द्वारा दो बार अपील दायर करने के बावजूद। ऐसे में अब देश की शीर्ष अदालत द्वारा केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे की जमानत रद्द करने को न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

अधिकांश मामलों में यह देखा जाता है कि रसूख वाले जब पकड़े जाते हैं, तो जेल से सीधे अस्पताल पहुंच जाते हैं। ऐसा लगता है कि रसूखदार कैदियों को वीआईपी सिंड्रोम हो जाता है। करीब सात वर्ष पूर्व हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा था कि रिम्स का कॉटेज क्या कैदियों के पर्यटन के लिए बनाया गया है।

तत्कालीन चीफ जस्टिस वीरेंद्र सिंह व जस्टिस पीपी भट्ट की डबल बेंच ने पूछा कि यदि ऐसी ही व्यवस्था रहेगी तो आम आदमी की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले जब भी प्रकाश में आते हैं तो आम आदमी खुद को असहाय महसूस करता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी जेल में जाते ही बीमार होकर इलाज के लिए किसी न किसी अस्पताल में भर्ती होकर आराम की जिंदगी बिताने लगते हैं।

ऐसा कई मामलों में देखा गया है कि रसूखदार आदमी जेल जाते ही बीमार जरूर होता है। लेकिन आम कैदियों के प्रति अदालतों और पूरी व्यवस्था का ऐसा लचीला व्यवहार देखने को नहीं मिलता है।

कानून का शासन अनेक संवैधानिक व्यवस्थाओं में महत्त्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में कार्य करके नागरिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं का रक्षक बना हुआ है। भारत में कानून के शासन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक रूप से पारदर्शिता और एक राय की जरूरत महसूस की जाती रही है।

ब्रिटेन के राजा या रानी को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं। उस पर कानून की सीमाएं नहीं लगाई जा सकती हैं। विदेशों में भेजे जाने वाले राजदूतों व विदेश विभाग के कर्मचारियों को भी कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, लेकिन भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग उद्योगपतियों, राजनेताओं या फिल्मी कलाकारों को भी ऐसी ही उन्मुक्तियां देने के पक्ष में अक्सर खड़ा नजर आता है। कानून का पालन सबके लिए बाध्यकारी है, इस बात पर सब अक्सर एक मत होते हैं, लेकिन कानून के पालन को लेकर नजरिये में अक्सर विरोधाभास नजर आता है।

यह सच है कि अक्सर कानून रसूखदारों पर असर नहीं दिखा पाता। लेकिन मामला केवल इतना ही नहीं है बल्कि समस्या यह भी है कि जटिल और बेतुके कानूनों, नियमों और प्रक्रियाओं की वजह से तमाम सरकारी अधिकारी लोगों को परेशान करते रहते हैं। उन्होंने इनको अपना हथियार बना लिया है।

वे शोषण, प्रताडना और वसूली के जरिए हमारे जीवन को लगभग नियंत्रित कर रहे हैं। इस स्तर पर भी बदलाव के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं लेकिन नए बनने वाले कानूनों में तो और भी पुरातन प्रावधान नजर आ रहे हैं। फिर चाहे हम कंपनी अधिनियम की बात करें या भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड संशोधन अधिनियम, यौन शोषण अधिनियम आदि। एक भ्रष्ट व्यवस्था में जहां न्याय धीमी गति से मिलता हो, वहां प्रावधान जितने दमनकारी होंगे, शोषण करना उतना ही आसान होगा।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में कानून व्यवस्था से ऊपर कोई नहीं है। आरोपी कितना भी धनी, चर्चित, ताकतवर या पहुंच वाला क्यों न हो यदि वह दोषी साबित होता है तो उसे कानूनी धाराओं के तहत सजा मिलनी तय है। उसकी सामाजिक, राजनीति या आर्थिक हैसियत कानून को प्रभावित नहीं कर सकती।

इस तरह रसूखदार लोगों को कानून तोड़ने की सजा मिलती है तो समाज में सकारात्मक संदेश भी जाता है कि देश में कानून का शासन है। हालांकि हमारी न्यायव्यवस्था की एक कमजोरी है कि यहां समय से न्याय नहीं मिलता है। दरअसल, जरूरी संसाधनों का अभाव होने से कोर्ट में मुकदमों के अंबार लगे हुए हैं।

जिससे फैसला आने में बीस से तीस साल तक की देरी होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अभियुक्त के प्रभावशाली होने के कारण जांच के चरण से कार्रवाई तक को प्रभावित करने की आशंका लगातार बनी रहती है। लखीमपुर मामले में शीर्ष अदालत द्वारा यह भी कहा गया कि जमानत याचिका को आधार देने वाली उत्तर प्रदेश की प्राथमिकी प्रभावी नहीं थी क्योंकि मामले में आरोप पत्र बाद में नये सिरे से दाखिल किये गये थे।

निस्संदेह, इस गंभीर मामले में न्याय होना चाहिए और न्याय होता दिखना भी चाहिए। बहरहाल, इस मामले में न्यायिक सक्रियता से उम्मीद बनती है कि पीड़ितों को न्याय मिल सकेगा। साथ ही राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं रह पायेगी। भारतीय न्यायिक व्यवस्था की प्रतिष्ठ को बहाल करने के लिये ऐसा होना जरूरी भी है।

 

dainik janwani 123

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