Wednesday, January 19, 2022
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बढ़ रही पेट्रोल-डीजल की कीमतें, उद्यमी परेशान

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  • बिजली कटौती होने से जनरेटर पी रहे डीजल बजट हो रहा फेल

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: पेट्रोल और डीजल की कीमतों ने आसमान छू लिया है। आम नागरिकों को लाभ देना तो दूर सरकार रोज दाम बढ़ाकर उद्योगों को बर्बाद करने पर तुली हुई है। एक तरफ पेट्रोल व डीजल के दाम बढ़ रहे हैं। वहीं, बिजली कटौती बढ़ने के कारण उद्योगों में डीजल की खपत बेतहाशा बढ़ गई है, जिससे बजट गड़बड़ा रहा है। बुधवार को पेट्रोल की कीमतों में 35 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि की गई।

कोरोना काल मार्च 2020 में पेट्रोल की कीमत 72.40 रुपये लीटर थी जो अब बढ़कर 103.24 रुपये प्रति लीटर हो गई है। यानि प्रति लीटर 32 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। वहीं इस महीने के 15 दिन में ही पेट्रोल की कीमतें साढ़े तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ गई है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रूड आयल की दरें 85 डालर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही है। कोरोना काल में जब सरकार को लोगों को राहत देनी चाहिये उस वक्त से लेकर अब तक प्रति लीटर 32 रुपये की वृद्धि ने लोगों की कमर तोड़ दी है।

दरअसल सरकार ने पेट्रोल और डीजल जिस तरह से टैक्सों की भरमार कर दी है। उससे राज्य सरकारें मजबूर हैं। कीमतें बढ़ाने के लिये। एक होटल व्यवसायी निशांत गुप्ता का कहना है कि बार बार पावर कट होने से जनरेटर चलाना पड़ रहा है और हजारों रुपये उसमें खप रहे हैं। अब जबकि डीजल के दाम 95.45 रुपये प्रति लीटर हो गया है, ऐसे में जनरेटर चलाना भारी पड़ रहा है।

वहीं, वाहन चालकों का कहना है कि सरकार इंटरनेशनल क्रूड आॅयल की कीमतों का नाम लेकर बेतहाशा वृद्धि कर रही है। जिस तरह से पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं। उसी तरह डीजल भी 95.45 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। इसका सीधा असर बाजार में लगातार बढ़ रही कीमतों पर दिख रहा है। डीजल के दाम बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही है। बाहर से आने वाली सब्जियां और खाद्यान्न के दाम पेट्रोल की कीमतों की तरह बढ़ रहे हैं।

हैरानी की बात यह है कि लगातार बढ़ रही तेल की कीमतों को लेकर विरोधी दल भी आवाज उठाने को तैयार नहीं है। ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष गौरव शर्मा का कहना है कि डीजल के दाम बढ़ने से जहां आम लोगों की जिंदगी दूभर हो गई है। वहीं, ट्रांसपोर्ट उद्योग बर्बाद होने की कगार पर पहुंच गया है, क्योंकि भाड़ा बढ़ाने को कोई तैयार नहीं है। जबकि खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं।

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