Monday, January 24, 2022
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बढ़ते अमीरों के बीच बढ़ती गरीबी

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देश में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। विश्व असमानता रिपोर्ट के ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में देश की कुल राष्ट्रीय आय का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत लोगों के पास है। दूसरी ओर निचले तबके की आधी आबादी को कुल राष्ट्रीय आय का महज 13.1 प्रतिशत ही मिल पा रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में आर्थिक सुधार और उदारीकरण का लाभ आर्थिक रूप से संपन्न शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को ही मिला है। निचले तबके के लोग इससे और भी गरीब हुए हैं। विश्व असमानता रिपोर्ट फ्रांस की एक लैब के द्वारा तैयार किया जाता है। यह लैब विश्व में असमानता की गतिविधियों पर पैनी नजर रखता है। इस रिपोर्ट में कहा गया हैकि भारत में गरीबी और असमानता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2021 में भारत में एक प्रतिशत अमीरों के पास देश की कुल आय का 22 प्रतिशत्त है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत अमीरों के पास कुल आय का 57 प्रतिशत है, वहीं,वर्ष 2020 में शीर्ष 10 प्रतिशत और निचले तबके की 50 प्रतिशत आबादी की आय का अंतर 1 से 22 प्रतिशत रहा था।

वर्ष 2021 में भारत में वयस्क आबादी की राष्ट्रीय औसत आय 2,04,200 रुपये सालाना है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रीय औसत आय असमानता के आंकड़ों पर पर्दा डालने का काम करती है। इससे असमानता की वास्तविक स्थिति छुप जाती है और लोग औसत आय के आंकड़ों को देखकर खुश रहते हैं।

रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत दुनिया में सर्वाधिक असमानता वाले देशों में से एक है। ब्रिक्स देशों में दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में भारत की तुलना में आय की असमानता ज्यादा है। दक्षिण अफ्रीका में शीर्ष 10 प्रतिशत और नीचे के 50 प्रतिशत की आय में अंतर 63 प्रतिशत है, जबकि ब्राजील में यह अंतर 29 प्रतिशत है।

चीन और रूस में यह अंतर 14 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक स्तर पर कुल आबादी के 10 प्रतिशत अमीरों का अभी भी वैश्विक आय के 52 प्रतिशत पर कब्जा है, जबकि निचले तबके वाले 50 प्रतिशत के पास महज 8.5 प्रतिशत आय है।

देखा जाए तो भारत में असमानता की मौजूदा स्थिति वर्ष 2018 से एक समान बनी हुई है, क्योंकि वर्ष 2018 की विश्व असमानता रिपोर्ट में भी भारत के शीर्ष एक प्रतिशत का कुल आय के 22 प्रतिशत पर कब्जा था, जबकि वर्ष 2014 में शीर्ष 10 प्रतिशत अमीरों का राष्ट्रीय आय के लगभग 56 प्रतिशत आय पर कब्जा था।

ये आंकड़े यह दशार्ते हैं कि आय का वितरण अमीरों और गरीबों के बीच वर्ष 2018 से लेकर अब तक कमोबेश एक स्तर पर बना हुआ है। बावजूद इसके, यह मानने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत में संपत्ति के संदर्भ में असमानता की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है।

आज,निचले तबके के 50 प्रतिशत परिवारों के पास लगभग नहीं के बराबर संपत्ति है। मध्य वर्ग भी अपेक्षाकृत गरीब है और कुल संपत्ति का 29.5 प्रतिशत उनके पास है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत के पास 65 प्रतिशत और एक प्रतिशत के पास कुल संपत्ति का 33 प्रतिशत है।

देश में लोगों की औसत संपत्ति 4,200 डॉलर है, जो एक डॉलर की कीमत अभी के 75 रुपए मानने पर लगभग 3,45,000रुपए होती है,जबकि मध्य वर्ग की औसत संपत्ति 26,400 डॉलर है, जो रुपए में लगभग 19,80,000 रुपए है। शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास औसतन 2,31,300 डॉलर है, जो रुपए में लगभग 1,73,47,500 रुपए है और एक प्रतिशत के पास औसतन 61 लाख डॉलर है, जो रुपए में 45,75,00,000 रुपए है।

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में असमानता का स्तर ब्रिटिश काल से भी ज्यादा है। उस समय शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा था। आजादी के बाद यह हिस्सेदारी घटकर 35 से 40 प्रतिशत रह गई।

अस्सी के दशक के मध्य से उदारीकरण की नीतियों की वजह से दुनिया भर में आय और संपत्ति की असमानता बढ़ी है। आर्थिक सुधारों से सबसे ज्यादा लाभ शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को मिला है, जबकि मध्य और कम आय वर्ग के लोगों को इसका लाभ कम मिला और गरीबी की स्थिति एक जैसी बनी रही। उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।

कुछ राज्यों मसलन, बिहार, झारखण्ड, ओडिसा, मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि कुपोषण की समस्या स ेउल्लेखनीय रूप से ग्रसित हैं। गरीबी की वजह से इन राज्यों में कुपोषण के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 472 मिलियन बच्चे थे, जिसमें से 97 मिलियन बच्चे कुपोषण से ग्रसित थे।

मौजूदा समय में इस संख्या में और भी वृद्धि हुई है। कुपोषण की जद में आन ेके बाद बच्चों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता या उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है और बच्चा खसरा, निमोनिया, पीलिया, मलेरिया आदि बीमारियों की गिरफ्त में आकर दम तोड़ देता है। कुपोषित बच्चों की ज्यादा जनसंख्या वाले देशों के बीच भारत की स्थिति बहुत ज्यादा खराब है।

ग्रामीण भारत में लगभग 83.3 करोड़ लोग निवास करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के रूप में कृषि को छोड़कर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। कुटीर एवं मझौले उद्योगों के अभाव में लोगों की निर्भरता सिर्फ कृषि पर है, जिसके कारण कृषि क्षेत्र में छदम रोजगार की स्थिति बनी हुई है।

एक आदमी के काम को कई लोग मिलकर काम कर रहे हैं। खेती-किसानी से दो वक्त रोटी का इंतजाम करना आज मुश्किल हो गया है। दूसरी तरफ,लगभग 139 करोड़ आबादी वाले इस देश में अधिकांश लोगों के घर का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। जीवन-काल में ऐसे लोगों का आशियाना सड़क, फुटपाथ, पार्क, गाँव निर्जन इलाके, पेड़ आदि होते हैं।

आक्सफेम के टाइम टू केयर अध्ययन से भी पता चलता है कि भारतीय अरबपतियों के पास देश के कुल बजट से भी अधिक संपत्ति है। इन एक प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के पास देश की कम आय वाली 70 प्रतिशत आबादी यानी 97.3 करोड़ लोगों की तुलना में चार गुना से भी ज्यादा संपत्ति है।

ऐसे में जरूरत है कि विश्व असमानता रिपोर्ट पर संवेदनशीलता दिखाते हुए सरकार गरीबों एवं अमीरों के बीच चौड़ी होती हुई खाई को पाटने के लिए कारगर उपाय करे, अन्यथा आने वाले दिनों में यह खाई और भी व्यापक हो जाएगी, जो आम आदमी और भारत जैसे लोक-कल्याणकारी देश के लिए सही नहीं होगा।


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