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जोखिम भरा है क्वैड पर दांव

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जोखिम भरा है क्वैड पर दांव


भारत पहले ही अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग’ (चतुष्कोणीय सुरक्षा वार्ता) का औपचारिक हिस्सा बन चुका है, इसलिए यह कोई चौंकाने वाली खबर नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 सितंबर को वॉशिंगटन में इस गुट की आमने-सामने होने वाली पहली शिखर बैठक में भाग लेंगे। मोदी इसके पहले इसी साल मार्च में चौगुट (क्वैड) की वर्चुअल शिखर बैठक में भाग ले चुके हैं। बहरहाल, इसमें कोई शक नहीं है कि पहली बार शिखर बैठक का होना इस समूह के स्वरूप लेने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मुकाम है। लेकिन हैरतअंगेज यह है कि इस समूह को सक्रिय करने की प्रक्रिया में गुट का नेता-यानी अमेरिका इसके असली मकसद को परदे के पीछे रखने की कोशिश में जुटा दिखता है। और बाकी तीन सदस्य देशों को भी यही रणनीति रास आ रही है।

ह्वाइट हाउस ने 24 सितंबर की शिखर वार्ता का एलान करते समय जो बयान जारी किया, उसमें चीन का उल्लेख नहीं किया गया। जबकि चौगुट के गठन की पृष्ठभूमि से परिचित हर व्यक्ति यह जानता है कि इस समूह का मकसद दुनिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करना है। अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों का यह विशेष उद्देश्य है, क्योंकि उपनिवेशवाद का दौर शुरू होने के बाद चीन पहली बार एक ऐसी गैर-पश्चिमी ताकत के रूप में उभरा है, जिससे दुनिया पर उन देशों के वर्चस्व के लिए चुनौती पैदा हुई है।

पिछली सदी में सोवियत संघ जरूर पश्चिम के लिए एक सैनिक चुनौती के रूप उभरा था, लेकिन आर्थिक या तकनीकी मोर्चे पर (अपवाद स्वरूप स्पुतनिक सदमे के एक मौके को छोड़कर) उसकी हैसियत कभी ऐसी नहीं बन पाई, जिससे पश्चिम अपने लिए खतरा महसूस करता। जबकि चीन के मामले में बात बिल्कुल उलटी है। चीन ने असल चुनौती आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में ही पेश की है।

अमेरिका को इस चुनौती का अहसास 2008 की आर्थिक मंदी के बाद हुआ, जब ये आम धारणा बनी कि उस झटके से दुनिया को चीन ने उबारा है। और उसके बाद से ही चीन को घेरने की उसकी रणनीति वजूद में आ गई। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में इस रणनीति को एशिया की धुरी नाम से पेश किया गया। डोनल्ड ट्रंप के युग में इसे इंडो-पैसिफिक नाम दे दिया गया। क्वैड इसी रणनीति का एक हिस्सा है।

हालांकि चार ‘लोकतांत्रिक’ देशों-अमेरिका, भारत, आॅस्ट्रेलिया और जापान का ऐसा गुट बनाने का सुझाव सबसे पहले 2005 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिन्जो आबे ने दिया था, लेकिन तब ये विचार आगे नहीं बढ़ सका। इसकी वजहें दो थीं-एक तो तब अमेरिका चीन को अपना मुख्य प्रतिस्पर्धी नहीं समझता था। दूसरी वजह यह थी कि भारतीय विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता के कुछ अवशेष बचे हुए थे, इसलिए तत्कालीन नेतृत्व किसी एक बड़ी ताकत के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने को लेकर
अनिच्छुक था।

क्या चीन की शक्ति को नियंत्रित करना अमेरिका की तरह भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए? ये सवाल अगर 30 या कम से कम 20 साल पहले पूछा जाता, तो उसका जवाब हां में हो सकता था। लेकिन आज चीन और भारत के बीच आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर फासला इतना बढ़ चुका है कि इस रणनीति से भारत को क्या लाभ होगा, यह समझ पाना मुश्किल है।

बल्कि अनेक रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वक्त पर भारत का हित इसमें है कि वह तनाव और टकराव से बचते हुए अपना ध्यान आर्थिक विकास पर केंद्रित करे। ठीक उसी तरह जैसे कभी चीन ने ‘अपनी क्षमता छिपाने और समय काटने’ की रणनीति अपनाई थी। जबकि क्वैड से जुड़ने का मतलब चीन के साथ पहले से ही जारी तनाव को और बढ़ाना और रक्षा के मोर्चे पर अपनी चुनौतियों में इजाफा करना है। यह दांव सिर्फ तभी फायदेमंद हो सकता था, अगर चौगुट में शामिल बाकी तीन देश रक्षा चुनौती का मुकाबला करने में भारत के साथ खड़ा होने का विश्वसनीय वादा करते और साथ ही भारत के आर्थिक विकास में प्राथमिकता के आधार पर मददगार बनने का इरादा दिखाते। लेकिन इसका कोई संकेत नहीं है।

लगभग डेढ़ साल से लद्दाख क्षेत्र में चीन की सेना उन जगहों तक आ कर जमी हुई है, जहां उसके पहले तक भारतीय फौज गश्त लगाती थी। जिन कुछ बिंदुओं पर तनाव घटाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं, वहां भी बफर जोन बनाने पर सहमति बनी है और ये जोन उस क्षेत्र में बने हैं, जहां पहले भारतीय सेना बेरोक आया-जाया करती थी। ध्यान देने की बात यह है कि इस पूरे संकट के समय में जुबानी समर्थन के अलावा अमेरिका, जापान या आॅस्ट्रेलिया ने भारत की कोई मदद नहीं की है। अगर पिछले 70 साल में अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर अमेरिका के इतिहास के देखा जाए, तो यह मानने की कोई वजह नहीं हो सकती कि भविष्य में भी वह भारत की मदद के लिए सक्रिय रूप से आगे आएगा।

हाल के वर्षों में भारत के अमेरिका के साथ गहराए रिश्तों के बावजूद अफगानिस्तान में हाल में पैदा हुए संकट के क्रम में अमेरिका ने भारत की चिंताओं की कोई परवाह नहीं की है। जबकि ये आम समझ है कि अफगानिस्तान का पड़ोसी देश होने, तालिबान के पिछले रिकॉर्ड के आधार पर उसको लेकर भारत में एक खास प्रकार की चिंता होने, और तालिबान के पाकिस्तान से निकट संबंधों के कारण अफगानिस्तान की घटनाओं से भारत के हित सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। मगर पिछले हफ्ते ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने एक भारतीय पत्रकार के सवाल पर यह दो टूक कह दिया कि अमेरिका अफगानिस्तान की घटनाओं को भारतीय चश्मे से नहीं देखता है।

अगर चीन के सिलसिले में ही देखें, तो जो बाइडेन प्रशासन इस बात पर जोर देने में कोई कसर नहीं छोड़ता कि चीन के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा है, लेकिन वह टकराव नहीं चाहता। यही बात कहने के लिए बाइडेन ने पिछले हफ्ते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को फोन किया। अब सामने आए ब्योरे के मुताबिक उस दौरान बाइडेन ने शी से व्यक्तिगत मुलाकात की पेशकश की, जिस पर शी ने ध्यान नहीं दिया। बाइडेन ने पिछले जनवरी में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से चीन के साथ संवाद बनाए रखने की लगातार कोशिश की है। मगर भारत का चीन से द्विपक्षीय संवाद लगभग टूटा हुआ है।

अफगानिस्तान की हालिया घटनाओं से अमेरिका की वैश्विक प्रतिष्ठा पर आंच आई है। चीन के रुख में आई एक नए प्रकार की सख्ती (जिसे पश्चिमी मीडिया में वूल्फ वॉरियर कूटनीति कहा जाता है) से इस धारणा को चुनौती मिल रही है कि अमेरिका को कोई चुनौती नहीं दे सकता। ऐसे मौके पर जब विश्व शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव के ऐसे लक्षण साफ हो रहे हैं, तब जाहिर है, बुद्धिमानी गुटीय रणनीति से दूर रहते हुए अपना हित साधने में होती। लेकिन भारत सरकार ने एक गुट के अधिक करीब जाने का फैसला किया है, जिसके क्या लाभ भारत को मिलेंगे, यह अभी साफ नहीं है। जबकि इस रणनीति के जोखिम सबके सामने हैं।


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