Tuesday, March 2, 2021
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बंगला 80 के दुकानदार अवैध, मुआवजा नहीं

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  • मेट्रो स्टेशन के लिए हटाए जाएंगे दुकानदार और रिहायशी किरायेदार
  • सीईओ केजेएस माही और डीईओ धनपत राम ने की थी ध्वस्तीकरण की बड़ी कार्रवाई

शेखर शर्मा |

मेरठ: हिल स्ट्रीट स्थित ओल्ड ग्रांट के जिन दुकानदार व रिहायशी किरायेदारों को उजाड़ा जाना है उनको कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। ये बात कैंट और मेट्रो प्रशासन ने साफ कर दी है। इतना ही नहीं जिनको उजाड़ा जाना है उनको किसी दूूसरे स्थान पर बसाने की बात भी एक सिरे से खारिज कर दी गई है।

दरअसल, कैंट प्रशासन मेट्रो योजना के चलते जिनको उजाड़ने पर तुला है, उन सभी को अवैध किराएदार मानता है। जिसकी वजह से किसी प्रकार के मुआवजे को लेकर उनकी दावेदारी को कैंट प्रशासन ने एक सिरे से खारिज कर दिया है।

बंगला 80 मेें रहने वाले जिन रिहायशी और व्यावसायिक लोगों को तामझाम उठाकर ले जाने के नोटिस रक्षा संपदा कार्यालय से भेजे गए हैं कैंट प्रशासन उन सभी को अवैध मानता है। डीईओ प्रशासन का कहना है कि बंगला ओल्ड ग्रांट का है। इसमें किए गए सभी निर्माण पूरी तरह से अवैध हैं। पूर्व में भी इन्हें इसको लेकर कई बार नोटिस जारी कर चुके हैं। इनका ध्वस्त किया जाना तय है।

ओल्ड ग्रांट का 80 जीएलआर में सब्जलता देवी व राकेश गोयल के नाम दर्ज है। हालांकि जहां तक कुछ पुराने किराएदारों की बात है तो उनकी कई पीढ़ियां यहां रहती आयी हैं। कैंट प्रशासन उन्हें वैध नहीं मानता। केवल जिनका नाम जीएलआर में दर्ज है वो ही वैध रिहायशी माने गए हैं। यूं कहने को यहां विवाह मंडप व हिल स्ट्रीट पर मार्केट बना दी गई है।

इन सभी को कैंट प्रशासन ने अवैध माना है। बंगला 80 में अवैध निर्माण को लेकर साल 2002 में नोटिस दिए जाने के बाद तत्कालीन रक्षा संपदा अधिकारी धनपत राम व सीईओ कैंट केजेएस चौहान ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कर चुके हैं। ये सभी अवैध निर्माण बिजेन्द्र उर्फ पप्पू बिल्डर के इस बंगले को खरीदने के बाद किए गए हैं।

कैंट प्रशासन की पहली कार्रवाई भी तभी हुई थी जब पप्पू बिल्डर ने यहां विवाह मंडप तैयार कराया था। उसको ध्वस्त करने के लिए सीईओ व डीईओ जेसीबी मशीनें लेकर जा धमके थे। जमकर हंगामा हुआ था।

मार्केट बिका था, अफसर थे मौन

बाद में जब कठोर मिजाज वाले माने जाने वाले अफसरों का यहां से तबादला हो गया तो मार्केट बनाया गया। ओल्ड ग्रांट के इस बंगले में मार्केट बना भी और उसकी दुकानें बेची भी गई, लेकिन तत्कालीन कैंट अफसर चुप्पी साधे रहे। उनके मुंह बंद कर दिए गए। यदि उस वक्त अफसरों ने सख्ती दिखाई होती तो जिन किरायेदारों पर अब संकट मंडरा रहा है, उन्हें इस हालात से बचाया जा सकता था।

कैंट प्रशासन ने बैनामा किया खारिज

जिनको उजाडे जाने की बात कही जा रही है, कैंट अफसरों ने उनकी दुकानों के बैनामे को भी खारिज कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि ओल्ड ग्रांट के इस बंगले में जो भी निर्माण है वो अवैध है। इतना ही नहीं इस बंगले में चेज आॅफ परपेज, सब डिविजन आॅफ साइड तथा अवैध निर्माण जितनी भी बुराइयों होती हैं सभी मौजूद हैं। अवैध निर्माण का वैध बैनामा कैसे हो सकता है।

इधर के रहे न उधर के

वहीं, दूसरी ओर जिन पर उजाडेÞ जाने की तलवार लटकी है उनका कहना है कि वो इधर के रहे न उधर के। जिस बिल्डर ने बैनामा किया है उसने रकम वापस करने के नाम पर हाथ खडेÞ दिए हैं। कैंट प्रशासन ने भी राहत के लिए ना कर दी है।

90 हिल स्ट्रीट में अवैध निर्माण पर चुप्पी या फिर सहमति
मेरठ: हिल स्ट्रीट स्थित ओल्ड ग्रांट के बंगला 90 में चल रहे अवैध निर्माण पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बजाय अफसरों की चुप्पी को उनकी सहमति माना जा रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि जिस बंगले में अवैध निर्माण को लेकर कुछ दिन पहले कैंट बोर्ड ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की थी, वहां दोबारा अवैध निर्माण चल रहा है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब ओल्ड ग्रांट के इस बंगले में अवैध निर्माण किया जा रहा हो। इससे पहले इस बंगले में साल 2002 में सोफिया मार्केट के नाम से अवैध रूप से पूरी मार्केट बना दी गई थी। कैंट के तत्कालीन बोर्ड के कुछ बिकाऊ सदस्यों के बूते पर अवैध निर्माण करने वाले कैंट प्रशासन की कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट से स्टे हासिल करने में सफल हो गए। बाद में जिन अफसरों को खतरा समझा जाता था उनको यहां से तवादला हो गया। बाद में यहां आए अफसरों ने इन अवैध निर्माणों पर बजाय कार्रवाई के अवैध निर्माण करने व कराने वालों से ही हाथ मिला लिए। सोफिया मार्केट अब कैंट अफसरों को मुंह चिढ़ाता नजर आता है। इसी बंगले में एक बार फिर से अवैध निर्माण नए सिरे से शुरू कर दिया गया है। हैरानी तो इस बात की है कि इसी अवैध निर्माण पर कुछ समय पूर्व कैंट बोर्ड का हथौड़ा चल चुका है। उसके बावजूद दोबारा से अवैध निर्माण का शुरू कराया जाने पर अफसरों का कार्रवाई पर चुप्पी साध लिया जाना सीईओ व डीईओ कार्यालय के बडे अफसरों की सहमति माना जा रहा है। अवैध निर्माण इन अफसरों की साख पर भी सवाल उठा रहा है।

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