Monday, October 3, 2022
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सोयाबीन खेती की समस्याएं और समाधान

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वर्तमान में सोयाबीन उत्पादन को सीमित करने वाली प्रमुख समस्यायें निम्न हैं :

-जड़ सड़न,पीला मोजैक जैसी बीमारियों का व्यापक प्रकोप
-नये-नये कीटों का प्रकोप
-भूमि में आवश्यक मुख्य तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन
-भूमि में कार्बनिक पदार्थ की कमी
-समुचित जल प्रबंध का अभाव
-खरपतवार की समस्या
-मौसम की प्रतिकूलता/जलवायु परिवर्तन

इन समस्याओं को चलते किसान सोयाबीन की खेती में अत्याधिक कठिनाई महसूस कर रहा है। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक खेती एवं अनुसंधान की उन्नत तकनीकों का महत्व और बढ़ जाता है, जिसे अपनाकर अधिक उत्पादन कर लाभ कमाया जा सकता हेै।

भूमि का चयन एवं तैयारी

-सोयाबीन अम्लीय क्षारीय तथा रेतीली भूमि को छोडकर हर प्रकार की मिट्टी में पैदा होती है।
-सोयाबीन की खेती उन खेतों में ही करें जहां जलभराव की समस्या न हो।
-रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद गर्मी में गहरी जुताई करें। ग्रीष्म कालीन जुताई से जमीन के नीचे आश्रय पाने वाले कीटों एवं बीमारियों के अवशेष नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि की जलधारण क्षमता एवं दशा में सुधार होता है।
-गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट तथा सिंगल सुपर फास्फेट को ख्ंोत में समान रूप से छिडकने के बाद बोनी के लिए जुताई करना श्रेष्यकर है ।
-खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाये एवं खरपतवार नष्ट हो जायें इस प्रकार जुताई करें। बुआई के पूर्व ख्ंोत के निचले हिस्से में जल निकास नाली का निर्माण अवश्य करें।
बुवाई का समय
-सोयाबीन की बुवाई 22 जून से 5 जुलाई के बीच उत्तम परिणाम देती है।
-इसमें परिस्थितिवश कुछ दिन आगे-पीछे होना कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता ।
-मानसून में देरी होने पर जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध हों, बुवाई समय से ही करें।

जातियों का चयन

सोयाबीन की जातियों का चुनाव उस क्षेत्र में वर्षा का औसत एवं भूमि के प्रकार को ध्यान में रखकर ही करें। औसत से कम वर्षा एवं हल्की से मध्यम भूमि वाले क्षेत्रों में शीघ्र पकने वाली जातियां एवं औसत से अधिक वर्षा वाले एवं मध्यम से भारी भूमि वाले क्षेत्रों में मध्यम अवधि की जातियॉँ लगाना उचित है।

उत्तम बीज व बीज दर

-सोयाबीन की बीज दर 60-80 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर निर्धारित हैं।
-जब बीज छोटे हों या ज्यादा फैलने वाली प्रजाति हो तो 60 किग्रा एवं बड़ा बीज हो तथा कम फैलने वाली प्रजाति हो तो 80 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज का प्रयोग करें।
-सोयाबीन बीज की अंकुरण क्षमता 70 प्रतिशत से अधिक हो एवं अनुवांशिक रूप से पूर्णतया शु़द्ध हो वही बीज प्रयोग करें।

उर्वरक एवं खाद

-भूमि की भौतिक दशा एवं गुणों को बनाये रखने के लिए 10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट या 5 टन फसलों का बारीक किया हुआ कचरा या भूसा और 5 टन कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर का उपयोग अच्छा परिणाम देता है।
-जहां पर मृदा परीक्षण के उपरांत जिंक एवं बोरान तत्व की कमी पाई जाये, वहां 5 किग्रा जिंक (25 किग्रा जिंक सल्फेट) एवं 1.0 किग्रा बोरान प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना लाभकारी है।
-गंधक की कमी होने पर फास्फोरस की पूरी मात्रा सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में देने पर यह कमी पूरी हो जाती है या जिप्सम 2-2.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपयोग करने से भी गंधक की कमी पूरी हो जाती है।
-इसके अलावा सामान्यतया: 25 किग्रा नत्रजन, 60 किग्रा फास्फोरस, 40 किग्रा पोटाश एवं 20 किग्रा गंधक की मात्रा की सिफारिश की गई है। जो कि 56 किग्रा यूरिया, 375 किग्रा सिंगल सुपर फास्फेट, 67 किग्रा म्यूरेट आॅफ पोटाश प्रति हेक्टेयर देने से पूरी हो जाती है।

बुवाई का तरीका

-सोयाबीन की बुवाई करते समय कतार से कतार की दूरी 45 सेमी हो।
-कम ऊंचाई वाली जातियों या कम फैलने वाली जातियों को 30 सेमी की कतार से कतार की दूरी पर बोयें।
-बुवाई का कार्य दुफन, तिफन या सीड ड्रिल से ही करें। बुवाई के समय जमीन में उचित नमी आवश्यक है।
-बीज जमीन में 2.5 से 3 सेमी गहराई पर पड़े।
-मेढ़-नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी-नाली विधि से बुवाई करने से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि पायी गयी है एवं नमी संरक्षण तथा जल निकास में भी प्रभावी पायी गयी है।

अंकुरण के बाद फसल सुरक्षा

-बुवाई के तीसरे दिन से एक सप्ताह तक अंकुरित नवजात पौधों को पक्षियों से बचायें।
-पौधों की प्रति हेक्टेयर संख्या
-सोयाबीन में अधिक फैलने वाली जातियों की 3 से 4 लाख के आसपास पौध संख्या एवं कम फैलने वाली जातियों की 4 से 6 लाख पौध संख्या प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है।
-वांछित पौध संख्या अधिक होने पर फसल के ढहने की सम्भावना रहती है एवं फूल तथा फल्लियॉँ प्रकाश के आभाव में सड़ जाती हैं तथा कीट नियंत्रण के लिए कीट नाशकों का छिडकाव भी असरकारक नहीं होता है।

जल प्रबंध

सोयाबीन की फसल में यदि उचित जल प्रबंध नहीं है, तो जो भी आदान दिया जाता है उसका समुचित उपयोग पौधों द्वारा नहीं हो पाता है। इसके साथ ही जड़ सड़न जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है एवं नींदा नियंत्रण कठिन हो जाता है जिसके फलस्वरूप, पौधों का विकास सीमित हो जाता है, एवं उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। अत: सामान्य तरीके से बुवाई के बाद 20-20 मीटर की दूरी पर ढाल के अनुरूप जल निकास नालियॉँ अवश्य बनायें, जिससे अधिक वर्षा की स्थिति में जलभराव की स्थिति पैदा न हो।

मेंढ़-नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी-नाली विधि की बुवाई, जल निकास में भी प्रभावी पायी गयी हैं। यदि एक सप्ताह से ज्यादा वर्षा का अंतराल हो जाये तो सिंचाई की सुविधा होने पर हल्की सिंचाई इन्हीं नालियों के माध्यम से करें। उचित जल प्रबंध से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि होती है।


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