Friday, July 31, 2026
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गेहूं बोने का उपयुक्त समय

रबी मौसम में गेहूं एक अत्यंत महत्वपूर्ण फसल है और इस समय गेहूं की बुआई का उपयुक्त दौर चल रहा है। किसानों की आय बढ़ाने और कम लागत में अधिक उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल ने कुछ आवश्यक सुझाव दिए हैं। संस्थान के अनुसार इस समय तापमान और वातावरण बुवाई के लिए एकदम अनुकूल है। संस्थान ने किसानों को यह भी सलाह दी है कि किसान बुआई का समय न चूकें, समय पर ही बुवाई करके अच्छी फसल लें। और अपने क्षेत्र के अनुसार उपयुक्त किस्मों का चयन करें। किसान बीज केवल विश्वसनीय और प्रमाणित स्रोतों से ही खरीदें।

गेहूं की बुवाई का उपयुक्त समय क्या है?

संस्थान के अनुसार गेहूं की अगेती बुआई नवंबर के पहले सप्ताह तक की जाती है, जबकि समय पर बुआई के लिए 20 नवंबर तक का समय उपयुक्त माना जाता है। देरी से बुआई करने पर पौधों की वृद्धि एवं दानों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, साथ ही गर्मी बढ़ने पर दानों के भराव पर भी असर पड़ता है। इसलिय समय पर ही बुवाई करें।

सामान्य सावधानियां और खेती की तकनीकी सलाह

ल्ल किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी की स्थिति के अनुसार ही किस्मों का चयन करना चाहिए। रोगों से बचाव के लिए दूसरे क्षेत्रों की किस्मों को न अपनाने की सलाह दी जाती है।

ल्ल धान कटाई के बाद खेत में पराली की उपस्थिति की स्थिति में हैप्पी सीडर या स्मार्ट सीडर मशीनों का उपयोग करके सीधे गेहूं की बुआई करना लाभकारी है। इससे मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहता है और पराली जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे पर्यावरण प्रदूषण भी नहीं होता।

ल्ल बुआई से पहले बीजों का उपचार करना बेहद जरूरी है जिससे लूज स्मट, फ्लैग स्मट, करनाल बंट और सीडलिंग ब्लाइट जैसे बीज एवं मृदा जनित रोगों से फसल की सुरक्षा की जा सके। इसके लिए कार्बोक्सिन 75 हढ, कार्बेंडाजिम 50 हढ या टेबुकोनाजोल 2ऊर जैसे फफूंदनाशकों का निर्धारित मात्रा में उपयोग करना चाहिए। ध्यान रहे कि उपचारित बीज केवल बुआई के लिए ही उपयोग किए जाएं, इन्हें पशु चारे या भोजन में प्रयोग न करें।
ल्ल खेती में उर्वरकों का प्रबंधन भूमि परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। सिंचाई समय पर और आवश्यकता अनुसार ही करें, अत्यधिक सिंचाई लागत बढ़ाती है और पौधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

बीज दर और उर्वरक प्रबंधन

समय पर बुआई के लिए 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त माना जा रहा है। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा क्षेत्र एवं सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार बदलती है। सामान्यत: सिंचित फसल के लिए 150:60:40 किलोग्राम ठढङ प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा बुआई के समय और शेष दो किश्तों में पहली और दूसरी सिंचाई के दौरान दें। फॉस्फोरस और पोटाश को बुआई के समय ही मिट्टी में मिला देना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण हेतु सलाह

कुनकी (फ्लरिस माइनर) और अन्य खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए बुआई के 0 से 3 दिन के अंदर पाइरोक्सासल्फोन 85 डब्ल्यू पी पेंडामेथालिन 30 एउ का छिड़काव करना प्रभावी होता है। इसके अलावा तैयार मिश्रण शाकनाशी जैसे ऐक्लोनिफेन + डाईफ्लुफेनिकन + पाईरोक्सासल्फोन का उपयोग भी लाभकारी है। कठिया गेहूं में पाइरोक्सासल्फोन आधारित शाकनाशियों से बचने की सलाह दी गई है। संस्थान की सलाह पर विशेष ध्यान दें।

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