Monday, April 20, 2026
- Advertisement -

कम्फर्ट जोन की कहानियां हैं वो फोन कॉल!

 

Ravivani 1


Sudhanshu Guptaकहानी को लेकर मन में बहुत से सवाल पैदा होते हैं। कहानी किसे माना जाए? क्या घटनाओं को कहानी कहा जाए या परिवेश कहानी है? बाहर जो घटित हो रहा है, उसे दर्ज़ करना ही कहानी है या कहानी में भीतर की दुनिया के लिए भी जगह है? कहानियों में जिस यथार्थ को चित्रित करने की बात हमेशा कही जाती है, क्या वह यथार्थ इतना ठोस होता है कि उसे कोई भी छू सके, महसूस कर सके और पकड़ सके? क्या आज के समय में यथार्थ तेजी से नहीं बदल रहा है? फिर किस यथार्थ को कहानी में दर्ज किया जाता है? क्या कहानी में विचार के लिए कोई जगह है? क्या कहानी में से विचार स्वयं ‘जेनरेट’ होना चाहिए या उसे ‘इंपोज’ किया जाना चाहिए? क्या कहानी में आदर्शों को स्थापित करना बेहतर है या मन की कंदराओं को चित्रित करना (बेशक वे आपके आदर्शों पर खरी न उतरती हों)?

वंदना बाजपेयी का नया कहानी संग्रह ‘वो फोन कॉल’ (भावना प्रकाशन) पढ़ते हुए भी ये सारे सवाल मन में बने रहे। वंदना बाजपेयी का इससे पहले भी एक संग्रह आ चुका है ‘विसर्जन’। ‘वो फोन कॉल’ पर बात करने से पहले चेखव का कहानियों के बारे में कहा गया एक कथन याद आता है। उन्होंने कहा था, अगर आप छोटी से छोटी घटना को कहानी में बदल सकते हैं तो आप बड़े लेखक हैं। और इसमें कोई संदेह नहीं है कि मध्यवर्ग का जीवन ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं के इर्दगिर्द घूमता है। वंदना बाजपेयी की कहानियों में भी मध्यवर्ग अपने सभी तनावों, इच्छाओं-आकांक्षाओं, सपनों और संघर्षों के साथ दिखाई पड़ता है। संग्रह की तेरह कहानियां मध्यवर्ग की ही कहानियां हैं। इनमें से तीन कहानियों-वो फोन कॉल, साढ़े दस हजार का मोबाइल और जिन्दगी की ईएमआई में मोबाइल किसी किरदार की तरह सामने आता है, जो बेहद अच्छी बात है। मोबाइल कभी दोस्त के रूप में सामने आते है और कभी खलनायक के रूप में। ‘साढ़े दस हजार का मोबाइल’ में वंदना मध्यवर्ग की झूठी शान और नीचे खिसककर निम्न वर्ग में ना पहुंच जाने के असुरक्षा बोध को चित्रित करती हैं। कहानी की नायिका लगातार सोचते रहने के बावजूद अपने लिए इतना महंगा मोबाइल नहीं खरीद पाती। उसे झटका उस वक्त लगता है जब उसके ही घर में काम करने वाली सहायिका इतनी कीमत का मोबाइल खरीद लेती है। वंदना ने मध्यवर्ग की दिक्कतों को, झूठी शान को इस कहानी में बड़ी सहजता से चित्रित किया है और मोबाइल इसकी धुरी है।

यह भी आज के समय का सबसे बड़ा सच है कि मध्यवर्ग ईएमआई के चक्कर में पड़कर जीवन की छोटी-छोटी खुशियों से भी महरूम होता जा रहा है। ईएमआई ने हमें बाजार के चंगुल में पूरी तरह फंसा दिया है। कभी मकान की ईएमआई तो कभी कार की ईएमआई और कभी किसी और सामान की। पूरी जिÞन्दगी मानो ईएमआई में ही बंटकर रह गई है। ईएमआई चुकाते-चुकाते पता नहीं चलता कि जीवन कब बीत गया। ‘जिन्दगी की ईएमआई’ कहानी में वंदना मोबाइल को एक खलनायक की तरह चित्रित करती हैं। एक मध्यवर्गीय परिवार चौबीसों घंटे ‘बाहरी खुशियां’ बटोरने में लगा है। हर ‘खुशी’ के लिए उसे ईएमआई देनी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में पति-पत्नी दोनों से बच्चे की निरंतर उपेक्षा होती रहती है। बच्चा (देवांश) मोबाइल के माध्यम से ही ब्लू व्हेल नामक एक खतरनाक खेल में उलझ जाता है। इस खेल में बच्चे को अलग-अलग किस्म के टास्क दिए जाते हैं। इस खेल का अंतिम पड़ाव आत्महत्या है। मां-बाप ईएमआई चुकाने में व्यस्त हैं और बच्चा ब्लू व्हेल में। लेकिन अंतिम पड़ाव आने से पहले ही मां बाप की आंखें खुल जाती है। इस कहानी तनाव लगातार बढ़ता रहता है, यही कहानी की खूबसूरती है।

मोबाइल की धुरी वाली ही तीसरी कहानी है शीर्षक कहानी-वो फोन कॉल। यहां मोबाइल एक दोस्त की तरह सामने आता है। रात के साढ़े बारह बजे रिया के पास किसी लड़की का फोन आता है। दोनों देर रात तक अपना-अपना दुख शेयर करती हैं। रिया को पता चलता है कि दूसरी लड़की मिस एक्स वाई जेड सामान्य लड़की नहीं है। वह लड़कों की तरफ आकर्षित नहीं होती, बल्कि उसे लड़कियां ही दोस्ती के लिए पसंद आती है। मिस एक्स वाई जेड उसे अपनी सारी कहानी बताती है। रिया देर रात तक उसकी काउंसलिंग करती है। यह एक अप्रत्याशित-सी घटना पर आधारित कहानी है लेकिन कहानी आपको जोड़ती है।

वंदना अपनी कहानियों के विषय अपने ही आसपास से उठाती हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियां हमें अपनी सी जान पड़ती है। ‘आखिर कितना घूरोगे’ में वंदना पुरुषों की स्त्रियों को लगातार घूरने की प्रवृत्ति पर चोट करती हैं तो ‘अम्मा की अंगूठी’ वह एक प्रौढ़ महिला की चीजों को खो देने की आदत पर बात करती हैं। ‘प्रिय बेटे सौरभ’ में बेटे को लिखे पत्रों के माध्यम से वह एक स्त्री के पूरे जीवन को दर्शाती है। ‘राधा का सत्याग्रह’ कहानी भी स्त्री पीड़ा की कहानी है। यह कहानी कहीं गांधी के सत्याग्रह की वकालत करती दिखाई देती है। ‘प्रेम की नई वैरायटी’ प्रेम के बदलते और मौजूदा स्वरूप की कहानी है। अन्य कहानियों में भी आपको अपनी ही दुनिया की कहानियां दिखाई देंगी। वंदना ने स्वयं लिखा है, कहानी क्या है…मेरा, आपका, हम सबका जीवन ही तो है। और जीवन महज वो रास्ता जिस पर हम चल रहे हैं, आप चल रहे हैं। हम जिंदगी में अक्सर उन रास्तों पर चले हैं जिस पर सब चल रहे हैं। ये हमारा कम्फर्ट जोन है।

तो ये कहानियां ‘कम्फर्ट जोन’ की कहानियां हैं। ये कहानियां आपको किसी तरह के चिंतन या बेचैनी की तरफ नहीं ले जाएंगी। इन कहानियों में आपको किसी तरह की कलात्मकता या प्रयोगधर्मिता भी नहीं मिलेगी, विचार भी इन कहानियों में यदि कहीं है तो वह बहुत धीमे से आया है, बिना किसी शोर-शराबे के। इसलिए ये कहानियां बेहद सहज और सरल हैं। लगभग सभी कहानियों में आदर्श की स्थापना दिखाई देती है। वंदना बाजपेयी आदर्शों की परिधि कहीं नहीं लांघती, न भाषा में और न कथ्य में। इसे उनकी कमजोरी भी कहा जा सकता है और ताकत भी। पठनीयता इन कहानियों की खूबी है। वंदना इन कहानियों के जरिये एक बेहतर दुनिया की कल्पना करती हैं। लेकिन वंदना बाजपेयी को आदर्शों से परे जाकर भी जीवन को और कहानियों को देखना चाहिए। अगर वह ऐसा कर पाती हैं तो उनके पाठकों को निश्चित रूप से अधिक समृद्ध कहानियां पढ़ने को मिल पाएंगी।

सुधांशु गुप्त


janwani address 39

spot_imgspot_img
[tds_leads title_text="Subscribe" input_placeholder="Email address" btn_horiz_align="content-horiz-center" pp_checkbox="yes" pp_msg="SSd2ZSUyMHJlYWQlMjBhbmQlMjBhY2NlcHQlMjB0aGUlMjAlM0NhJTIwaHJlZiUzRCUyMiUyMyUyMiUzRVByaXZhY3klMjBQb2xpY3klM0MlMkZhJTNFLg==" f_title_font_family="467" f_title_font_size="eyJhbGwiOiIyNCIsInBvcnRyYWl0IjoiMjAiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIyMiIsInBob25lIjoiMzAifQ==" f_title_font_line_height="1" f_title_font_weight="700" msg_composer="success" display="column" gap="10" input_padd="eyJhbGwiOiIxNXB4IDEwcHgiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMnB4IDhweCIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCA2cHgifQ==" input_border="1" btn_text="I want in" btn_icon_size="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxNyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTUifQ==" btn_icon_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjMifQ==" btn_radius="3" input_radius="3" f_msg_font_family="394" f_msg_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_msg_font_weight="500" f_msg_font_line_height="1.4" f_input_font_family="394" f_input_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_input_font_line_height="1.2" f_btn_font_family="394" f_input_font_weight="500" f_btn_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjExIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMCJ9" f_btn_font_line_height="1.2" f_btn_font_weight="700" f_pp_font_family="394" f_pp_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjEyIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMSJ9" f_pp_font_line_height="1.2" pp_check_color="#000000" pp_check_color_a="var(--metro-blue)" pp_check_color_a_h="var(--metro-blue-acc)" f_btn_font_transform="uppercase" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjYwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGUiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjUwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGVfbWF4X3dpZHRoIjoxMTQwLCJsYW5kc2NhcGVfbWluX3dpZHRoIjoxMDE5LCJwb3J0cmFpdCI6eyJtYXJnaW4tYm90dG9tIjoiNDAiLCJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBvcnRyYWl0X21heF93aWR0aCI6MTAxOCwicG9ydHJhaXRfbWluX3dpZHRoIjo3NjgsInBob25lIjp7ImRpc3BsYXkiOiIifSwicGhvbmVfbWF4X3dpZHRoIjo3Njd9" msg_succ_radius="2" btn_bg="var(--metro-blue)" btn_bg_h="var(--metro-blue-acc)" title_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjEyIiwibGFuZHNjYXBlIjoiMTQiLCJhbGwiOiIxOCJ9" msg_space="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIwIDAgMTJweCJ9" btn_padd="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCJ9" msg_padd="eyJwb3J0cmFpdCI6IjZweCAxMHB4In0=" f_pp_font_weight="500"]

Related articles

sadhvi sail: कौन हैं साध्वी सैल? 7 भाषाओं में पारंगत और मिस इंडिया 2026 की विजेता

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत...

Delhi News: आरके आश्रम मार्ग स्टेशन से जुड़ेगा दिल्ली का मेट्रो नेटवर्क, सफर अब 88 किलोमीटर तक

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शनिवार...
spot_imgspot_img