Home संवाद ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर सोचने का समय

ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर सोचने का समय

0
ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर सोचने का समय


पिछले कुछ दिनों से देश में कोयले की कमी से बिजली संकट की चर्चा सुनाई दे रही है। लेकिन जिस बात की आशंकाएं जतायी जा रही थी, वैसे कुछ हुआ नहीं है। वास्तव में कुछ बिजली संकट है और कुछ शोर अधिक मचाया जा रहा है। देश में कोई ग्रिड फेल नहीं हुआ है और न ही ऐसे आसार हैं। सरकार ने भी इस दिशा में स्थिति साफ की है। चूंकि हमारे देश में कोयला बिजली पैदा करने का सबसे पुराना जरिया है। इसलिए कोयले की कमी और बिजली संकट को लेकर अधिक हाय-तौबा मचायी जा रही है। कोरोना के चलते कोयला उत्पादक देशों में काम बंद रहने से समुचित उत्खनन नहीं हो सका है। कोरोना की दूसरी लहर के बाद औद्योगिक गतिविधियां एकाएक बढ़ने से बिजली की मांग में तो एकाएक वृद्धि होने लगी किन्तु कोयले का उत्पादन उस अनुपात में नहीं बढने से आपूर्ति में रूकावट आ रही है। इस वजह से दुनिया के तमाम बड़े देशों में बिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था से अभिन्न रूप से जुड़ चुका हमारा देश भी इससे अछूता नहीं है।

जहां तक मौजूदा समस्या की बात है तो उसके पीछे कोरोना महामारी से उपजे हालात काफी हद तक जिम्मेदार ठहराये जा सकते हैं। जिस तरह उस द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के शक्ति संतुलन के साथ ही आर्थिक हालात बदले, उसी तरह की सम्भावना कोरोना के बाद उत्पन्न होने लगी है।

बीते दो साल में वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल गई है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश तक संकट में फंस गये हैं। लॉक डाउन के कारण आयात-निर्यात में आई बाधा की वजह से कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होने का असर उत्पादन पर पड़ने से अनेक आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो गया है।

लेकिन बीते कुछ दिनों से पूरी दुनिया जिस संकट से परेशान है वह है उर्जा अर्थात बिजली। कोयला आधारित ताप विद्युत गृहों में कोयले का भंडार घटने के कारण बिजली की उपलब्धता कम होने से चीन और ब्रिटेन जैसे देशों तक में बिजली कटौती के हालात पैदा हो गये हैं।

मौजूदा समस्या के मद्देनजर मुद्दा यह नहीं है कि कोयले का बफर स्टॉक भी भारत सरकार ने कम क्यों रखा? अहम सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयला महंगा होने के कारण निजी कंपनियों ने आयात बंद क्यों कर दिया? चीन, आस्ट्रेलिया के बजाय इंडोनेशिया पर ही आपूर्ति का भरोसा क्यों किया गया?

कोयले की कमी से निपटने के मद्देनजर बिजली संयंत्रों से बिजली के यूनिट ही बंद करने क्यों शुरू कर दिए? यानी आयात बंद होने से उत्पन्न स्थिति को संभालने की तैयारी न तो कोल इंडिया के पास थी और न ही पॉवर प्लांट्स के पास थी। यह दूरदर्शिता की कमी का प्रश्न है?

बड़ा सवाल यह भी है कि जब कोरोना-काल में भी कोयले की आपूर्ति 24 घंटे के अंतराल में हो जाती थी, तो निजी बिजली संयंत्रों ने भंडारण की क्षमता कम करके 7-10 दिन तक सीमित क्यों की? जबकि कोयला भंडारण 22-25 दिन का होना चाहिए।

बहरहाल आयात रोक देने, कोयला खदानों में अति बारिश के कारण बाधाएं पैदा होने, अचानक आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से बिजली संयंत्रों के 18 फीसदी अधिक कोयले की मांग करने के मद्देनजर कोल इंडिया पर ही बोझ आ गया, नतीजतन कंपनियां ‘संकट-संकट’ चिल्लाने लगीं।

कोल इंडिया में ही कोयले का उत्पादन बीते दो सालों के दौरान करीब 107 लाख टन कम हुआ है। यह भी एक गंभीर कारक है। उसकी जवाबदेही किसकी है? राज्य सरकारों ने लंबे वक्त से भुगतान लटका रखे हैं, तो इस तरह कारोबार कब तक चलेगा?

बिजली हम सबके लिए बुनियादी और घोर अनिवार्य वस्तु एवं सेवा है। जो भी संकट महसूस किया जा रहा है, उसके लिए दो पक्ष ही जिम्मेदार हैं-सरकार और बिजली बनाने वाला निजी क्षेत्र, जो कोयला आयात करता है। अक्सर 14 सितंबर तक मॉनसून विदा हो जाता है। इस बार बारिश खूब हुई है।

आज भी कई खुली खदानों में पानी भरा है। कोयले तक पहुंचने का रास्ता अवरुद्ध है, लिहाजा स्टॉक होने के बावजूद कोयले की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। कई प्रोजेक्टों में उत्पादन ही बंद है, क्योंकि खदानें जमीन के विवादों में फंसी हैं।
भारतीय भू-भाग पर पांच हजार लाख किलोवाट घंटा प्रति वर्गमीटर के बराबर सौर ऊर्जा आती है।

साफ धूप वाले दिनों में सौर ऊर्जा का औसत पांच किलोवाट घंटा प्रति वर्गमीटर होता है। एक मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिये लगभग तीन हेक्टेयर समतल भूमि की जरूरत होती है।

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि शोधकर्ताओं के अनुसार, वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण लागू किये गए लॉकडाउन से हवा की गुणवत्ता में जो सुधारा आया, उसके चलते मार्च से मई माह के बीच पृथ्वी को 8.3 प्रतिशत अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त हुई है।

भारत जैसे देश में साल भर पर्याप्त धूप रहने के बावजूद सौर उर्जा से बिजली बनाने का काम काफी पिछड़ गया। इसकी प्रमुख वजह देश में उसके उपकरण नहीं बनना भी है। भले ही सरकार ने सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाने पर सब्सिडी की व्यवस्था बनाई किन्तु उसके साजो-सामान का देश में ऊत्पादन हो सके इस दिशा में पर्याप्त कोशिशें नहीं हुई।

केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए वे सौर ऊर्जा के अधिकतम उपयोग की नीति बनाकर उसे युद्धस्तर पर अमल में लाने की कार्ययोजना बनाएं। कोरोना के बाद की दुनिया निश्चित तौर पर पहले से अलग और बेहतर रहेगी।

भारत के लिए आने वाले समय में अनंत संभावनाएं हैं जिन्हें भुनाने के लिए हमें सौर ऊर्जा के क्षेत्र में पेशेवर सोच के साथ आगे बढ़ना होगा। आने वाले समय में सौर ऊर्जा ही हमें कई संकटों से बचाने में सहायक सिद्ध होगी।


What’s your Reaction?
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0

Leave a Reply