Saturday, May 2, 2026
- Advertisement -

पिता-पुत्र के रिश्तों की कहानी है ‘त्वमेव सर्वम’

 

CINEWANI


महेश पांडेय

‘त्वमेव सर्वम’ 32 मिनट की लघु फिल्म पिता और पुत्र की हृदय स्पर्श और प्रेरित करने वाली कहानी है। जीवन रजक अब कलेक्टर बन गए हैं। मरण शैय्या में अस्पताल में पड़े अपने पिता को मिलने जा रहे हैं। पूरी फिल्म फ्लैश बैक में चलती है। वे याद कर रहे हैं कि कई सालों तक वह फटे हुए जूते पहनते रहे, जिससे उनके पांवों में जख्म तक हो जाते थे। जूते की दुकान में अपने हाथों से जीवन द्वारा अपने पिता को जूता पहनाना हो, अपनी इच्छा पूछे जाने पर कहना कि उसे एक इंजन वाली साइकिल (मोपेड) वैसी ही मोपेड चाहिए जो उनकी पड़ोसी की है।

पिता मूलचंद रजक(संजय मिश्रा)अपने पुत्र के हर फैसले पर उसके पीछे चट्टान की तरह खड़े रहते हैं। निम्न मध्यम वर्गीय किसान होते हुए भी अपने पुत्र जीवन सिंह रजक को रायसेन जिले के छोटे से गांव बारहवीं पास करने के बाद विदिशा के प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ाना हो। जीवन के वेटेनरी चिकित्सक, बीडीएस में चयन होने के बाद भी उसके द्वारा ना जॉइन करने के निर्णय में साथ देना, जब परिवार के अन्य लोग चाहते हैं कि जीवन रजक बीडीएस जॉइन कर ले। उसे लगता है कि वह डॉक्टर बनकर देश और अपने समाज के लिए वह नहीं कर पाएगा जो करना चाहता है। इस अति आदर्शवादी किस्म के सनक भरे फैसले पर भी पिता अपने पुत्र के साथ खड़ा रहता है। बाद में जीवन, राज्य सेवा के अफसर बनते हैं। बचपन मे बुखार से पीड़ित अपने पुत्र जीवन को कांधे में लादकर सरकारी अस्पताल पहुंचे मूलचंद अपने बेटे की इलाज के गांव के प्रधान का कलेक्टर को फोन लगवाकर डॉक्टर को बुलवाना हो और उनको इस संकट के क्षण में उपजी विवशता के क्षण में यह अहसास होना कि हर परिवार में डॉक्टर, कलेक्टर होना जरूरी है।

फिल्म में कुछ दृश्य हैं, जो आपके होंठों पर मुस्कान लाएगी तो कुछ आपके नेत्रों को सजल कर देंगे। प्राइमरी में पढ़ रहा जीवन जब कहता है 27 का पहाड़ा सुनाऊं मास्टर जी, फिर पहाड़ा सुनाने के बाद अन्य बच्चों द्वारा ताली बजाने पर खुश होना हो। बीएससी के बाद प्राइवेट मास्टर बनने के बाद अपनी पहली तनख़्वाह जीवन द्वारा नए जूते खरीद कर लाना और पुराने जूते को हटाकर नए जूते रखने का दृश्य। जीवन रजक जब अस्पताल पहुंचते है, तब तक मूलचंद रजक दुनिया छोड़कर जा चुके हैं और यह सुनने के लिए जीवित नहीं बचे कि जीवन कलेक्टर बन गया है। पुत्र के लिए पिता होना वह भी मूलचंद रजक जैसा पिता होना कितना जरूरी है, इस फिल्म को देखकर हमें अहसास होगा। इस फिल्म की पटकथा स्वयं जीवन सिंह रजक ने लिखी है वे अभी मप्र कैडर में आईएएस के रूप में कार्यरत हैं। इस लघु फिल्म की एक बात और अच्छी लगी कि पहली बार अति पिछड़ी जाति (धोबी)के उपनाम का प्रयोग किया गया है। फिल्म में कहीं भी जाति के नाम पर शोषण और भेदभाव का रोना धोना नहीं है। बल्कि एक सहृदय ब्राम्हण प्रोफेसर दिखाया गया है जो जीवन रजक को मार्गदर्शन और सहायता देता है। फिल्म को आप जियो सिनेमा में देख सकते हैं।

निर्देशन मनोज तिवारी का है, निर्माता हैं रामपाल सिंह पठारिया और लेखक हैं डा. जीवन एस रजक। संजय मिश्रा और बिक्रम सिंह ने शानदार अभिनय किया है।


janwani address 9

spot_imgspot_img
[tds_leads title_text="Subscribe" input_placeholder="Email address" btn_horiz_align="content-horiz-center" pp_checkbox="yes" pp_msg="SSd2ZSUyMHJlYWQlMjBhbmQlMjBhY2NlcHQlMjB0aGUlMjAlM0NhJTIwaHJlZiUzRCUyMiUyMyUyMiUzRVByaXZhY3klMjBQb2xpY3klM0MlMkZhJTNFLg==" f_title_font_family="467" f_title_font_size="eyJhbGwiOiIyNCIsInBvcnRyYWl0IjoiMjAiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIyMiIsInBob25lIjoiMzAifQ==" f_title_font_line_height="1" f_title_font_weight="700" msg_composer="success" display="column" gap="10" input_padd="eyJhbGwiOiIxNXB4IDEwcHgiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMnB4IDhweCIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCA2cHgifQ==" input_border="1" btn_text="I want in" btn_icon_size="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxNyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTUifQ==" btn_icon_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjMifQ==" btn_radius="3" input_radius="3" f_msg_font_family="394" f_msg_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_msg_font_weight="500" f_msg_font_line_height="1.4" f_input_font_family="394" f_input_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_input_font_line_height="1.2" f_btn_font_family="394" f_input_font_weight="500" f_btn_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjExIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMCJ9" f_btn_font_line_height="1.2" f_btn_font_weight="700" f_pp_font_family="394" f_pp_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjEyIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMSJ9" f_pp_font_line_height="1.2" pp_check_color="#000000" pp_check_color_a="var(--metro-blue)" pp_check_color_a_h="var(--metro-blue-acc)" f_btn_font_transform="uppercase" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjYwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGUiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjUwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGVfbWF4X3dpZHRoIjoxMTQwLCJsYW5kc2NhcGVfbWluX3dpZHRoIjoxMDE5LCJwb3J0cmFpdCI6eyJtYXJnaW4tYm90dG9tIjoiNDAiLCJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBvcnRyYWl0X21heF93aWR0aCI6MTAxOCwicG9ydHJhaXRfbWluX3dpZHRoIjo3NjgsInBob25lIjp7ImRpc3BsYXkiOiIifSwicGhvbmVfbWF4X3dpZHRoIjo3Njd9" msg_succ_radius="2" btn_bg="var(--metro-blue)" btn_bg_h="var(--metro-blue-acc)" title_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjEyIiwibGFuZHNjYXBlIjoiMTQiLCJhbGwiOiIxOCJ9" msg_space="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIwIDAgMTJweCJ9" btn_padd="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCJ9" msg_padd="eyJwb3J0cmFpdCI6IjZweCAxMHB4In0=" f_pp_font_weight="500"]

Related articles

बच्चों में जिम्मेदारी और उनकी दिनचर्या

डॉ विजय गर्ग विकर्षणों और अवसरों से भरी तेजी से...

झूठ का दोहराव सच का आगाज

जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सारा बारबर द्वारा किए...

लोकतंत्र का आईना या मीडिया का मुखौटा

जब आंकड़ों की चकाचौंध सच का मुखौटा पहनने लगे,...

वेतन के लिए ही नहीं लड़ता मजदूर

मजदूर दिवस पर श्रमिक आंदोलनों की चर्चा अक्सर फैक्टरी...
spot_imgspot_img