Saturday, January 29, 2022
- Advertisement -
- Advertisement -
Homeसंवादव्यर्थ बातें

व्यर्थ बातें

- Advertisement -


एक दार्शनिक तपस्वी की बड़ी ख्याति और प्रसिद्धि थी। सम्राट के मन में जिज्ञासा जागी, ऐसे दार्शनिक से क्यों न मिला जाए? एक आदमी उस दार्शनिक के पास पहुंचा और उसके हाथ में एक रूक्का थमा दिया। दार्शनिक ने पूछा, ‘तुम कौन?’ वह बोला, ‘मैं सम्राट का कर्मचारी हूं। सम्राट ने ही यह रूक्का आपको देने के लिए कहा है।’ दार्शनिक ने कहा, ‘तुम्हें कैसे पता कि सम्राट ने ही दिया है। क्या सम्राट से तुम मिलकर आए हो?’ कर्मचारी ने झिझकते हुए कहा, ‘नहीं सम्राट ने खुद तो मुझे नहीं दिया, मंत्री ने मुझे यह कहते हुए मुझे रूक्का दिया था कि यह सम्राट ने दिया है। मुझे आदेश दिया गया था कि मैं आप तक इसे पहुंचा दूं।’ दार्शनिक ने कहा, ‘चलो उस मंत्री के पास चलते हैं’।

मंत्री के पास जाकर स्वामी जी ने पूछा, ‘क्या यह आपको खुद रूक्का सम्राट ने दिया है?’ मंत्री बोला, ‘हां सम्राट ने ही दिया है। क्यों क्या हुआ?’ ‘क्या सम्राट ने अपने हाथ से तुम्हें दिया?’ ‘नहीं, सम्राट ने नहीं तो नहीं दिया, उनके निजी सेवक ने लाकर मुझे दिया।’ वे उस सेवक के पास गए, पूछा, ‘यह रूक्का किसका है?’ ‘सम्राट का है।’ ‘तुम्हें पता है कि सम्राट का ही है?’ कहने का अर्थ यह है कि हम ‘किसका है’ इसी पचड़े में पड़े रह गए। ‘किसका है’ ‘किसने दिया’ इसी की खोजबीन करते रह गए। ऐसा लगता है कि आज के संसार की यही स्थिति हो रही है। रूक्के को खोलकर पढ़ा नहीं जा रहा है। मूल चीज को छू नहीं रहे हैं और बाहर की बातों में उलझ कर रह गए हैं।

What’s your Reaction?
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
+1
0
- Advertisement -

Leave a Reply

- Advertisment -spot_img
- Advertisment -
- Advertisment -

Most Popular

- Advertisment -
- Advertisment -spot_img
- Advertisment -

Recent Comments