Tuesday, September 21, 2021
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सब्जियों की फसल में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपयोगिता

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सूक्ष्म पोषक तत्व कमी के निवारण के लिए पौधों के इनकी उपलब्धता बढ़ाने के लिए भूमि में यह सूक्ष्म तत्व लोहा, तांबा, मैग्नीज एवं क्लोरीन आदि का प्रयोग किया जाता है क्योंकि सघन खेती करने की वजह से भूमि में वर्तमान युग में पोषक तत्वों की अत्याधिक कमी होने लगी है। किसानों को उक्त सूक्ष्म पोषक तत्वों को जमीन में मोगर के लड्डू के रूप में खिलाना चाहिए ताकि जमीन की उपजाऊ शक्ति बनी रहे। इसके लिए उक्त सूक्ष्म तत्व के अतिरिक्त जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए ताकि जमीन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी न हो। प्रत्येक किसान को उसके खेत की मिट्टी को स्वास्थ्य परीक्षण कराकर विशेषज्ञों सिफारिश अनुसार खाद एवं उर्वरक का फसल में संतुलित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। समस्त पादपों को उचित वृद्धि और विकास के लिए 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पोषक तत्व का तात्पर्य यह है कि पौधों की उचित वृद्वि, विकास तथा फलने और फूलने के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता अनिवार्य रूप से होती है।

किसी तत्व विशेष की कमी पूर्ति उसी तत्व को प्रदान करने से हो सकती है, और अन्य तत्व द्वारा उसकी कमी की पूर्ति सम्भव नहीं हो सकती है। प्रत्येक पोषक तत्व का पौधों के विभिन्न जीवन चक्रों में अलग-अलग विशेष योगदान रहता है।

किसी एक भी तत्व का अभाव होने पर, पौधा अपना जीवन चक्र पूरा नहीं कर पाता। अत: अच्छे उत्पादन के लिए यह आवश्यक है कि सभी पोषक तत्व की समुचित मात्रा उपयुक्त समय पर पौधों को दी जाए तथा सब्जियों के पौधों में उन तत्वों की होने वाली कमी के लक्षणों को पहचाना जाए ताकि कमी होने पर उनकी आपूर्ति की जा सके। सूक्ष्म पोषक तत्व के मुख्य कार्य और कमी के लक्षण

जिंक

पत्तियों का मुड़ना, छोटा होना अर्थात लिटिल लीफ जिंक तत्व की कमी का प्रमुख लक्षण है। नई तथा पुरानी पत्तियों पर इसके लक्षण पौधे पर एक साथ दिखाई देते हैं। इसके अभाव में पौधों की वृद्धि का कम होना, कलियों का झड़ना एवं बीज उत्पादन का कम होना आदि लक्षण विकसित होते हैं।

फूलों का निर्माण और फलों का विकास प्राय: कम और देर से होता है। जिंक की कमी मुख्य रूप से मक्का, गेहूं, मटर, टमाटर और आलू पर अधिक होती है।

उपचार: जिंक की कमी की पूर्ति के लिए सामान्यत: 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करते हैं। इसको अंतिम जुताई के समय मृदा में मिलाना चाहिए अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ जिंक सल्फेट मिलाकर देने से अधिक लाभ होता है।

खड़ी फसलों में जिंक की कमी के लक्षण पौधों पर दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट तथा 0.25 प्रतिशत बुझा हुआ चूने का घोल बनाकर इस घोल में 500 ग्राम जिंक सल्फेट का छिड़काव करते हैं।

इसके लिए 100 लीटर पानी में 250 ग्राम बुझा हुआ चुना घोलकर फिर इसमें 500 ग्राम जिंक सल्फेट मिलाकर घोल तैयार कर खड़ी फसल की पत्तियों पर छिड़काव किया जाता हैं।

लोहा (आयरन)

लोहे की कमी के लक्षण मुख्यत: छोटी अवस्था की पत्तियों पर प्रकट होते हैं इसके अभाव में सब्जियों की पत्तियों में हरिमा-हीनता या क्लोरोसिस हो जाती है जिससे पत्तियों की शिराओं का रंग तो हरा ही बना रहता है, परंतु पत्तियों मध्य भाग पीला पड़ जाता है।

लोहे की अधिक कमी होने पर पत्तियों के अग्रभाग हो तथा किनारों की मृत्यु हो जाती है। इसका प्रभाव से टमाटर पर अधिक लक्षण दिखाई देते हैं।

उपचार: खेत की मिट्टी में लोहे की कमी होने पर 10 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फेरस सल्फेट खेत की आखिरी जुताई के समय मिलाना उचित रहता है। खड़ी फसल में लौह तत्व की कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट तथा 0.10 प्रतिशत साइट्रिक एसिड का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

मैग्नीज

यह तत्व भी सब्जियों के लिए बहुत आवश्यक है। इसके अभाव में पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल का निर्माण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है, जिससे पौधे की पत्तियों का रंग हल्का पड़ जाता है तथा उनकी चमक धीरे-धीरे कम होने लगती है।

इस तत्व की अधिक कमी होने पर पौधे की नई पत्तियां भूरे तथा पीले रंग की हो जाती हैं। इस तत्व की कमी के लक्षण टमाटर, आलू, पालक, गोभी, मटर, प्याज और शकरकंद आदि फसलों पर अधिक देखा गया है।

उपचार: इस तत्व की कमी की पूर्ति के लिए बुवाई के पूर्व या खेत की अंतिम जुताई के समय 20 किलोग्राम मैग्नीज सल्फेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग करते हैं। खड़ी फसल में 0.5 से 1.0 प्रतिशत मैग्नीज सल्फेट (0.5 से 1.0 प्रतिशत) और बुझे हुए चूने का घोल बनाकर (0.25 से 1.0 प्रतिशत) के साथ पर्णीय छिड़काव करना चाहिए।

तांबा या कॉपर

पौधों में ताँबे की कमी का मुख्य प्रभाव पौधों की पत्तियों पर पड़ता है। जिससे पत्तियां पतली लंबी है पीली हो जाती हैं और पौधों की बढ़वार मंद पड़ जाती है। प्याज के कन्द मुलायम होकर पीले पड़ जाते हैं।

उपचार:

इसकी कमी को पूरा करने के लिए कॉपर सल्फेट (नीला-थोथा) 5 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई से पूर्व खेत की मिट्टी में मिलाना चाहिए। खड़ी फसल में 0.1 प्रतिशत कॉपर सल्फेट को घोलकर बुझा हुआ चुना 0.5 प्रतिशत के घोल के साथ, अर्थात 100 ग्राम कॉपर सल्फेट और 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

बोरोन

मिट्टी में बोरॉन तत्व की कमी होने पर पौधे की नई प्रतियां पतली होकर मुड़ जाती हैं। पौधे के अग्रभाग मरने लगते हैं तथा पौधे प्राय: छोटे ही रह जाते हैं। इसके अभाव में फलीदार सब्जियों की जड़े पर निर्मित ग्रंथियों की संख्या में कमी आ जाती है।

बोरोन तत्व के अभाव में फूलगोभी में उसके फूल भूरे और पत्तियों के किनारे पीले और हल्के लाल रंग के होने लगते हैं तथा तना खोखला हो जाता है। पत्ता गोभी मैं बोरॉन तत्व की कमी न्यूनता के कारण पौधे का छोटे कद का होना तथा पत्तियों का फटना और अंत में पत्तियों में सड़न तथा दुर्गंध आना जैसे लक्षण विकसित हो जाते हैं।

खीरे में इसके प्रभाव से पहले पत्तियों का रंग गहरा हरा होने लगता है तथा बाद में पत्तियां गुच्छों का रूप धारण करना आरम्भ कर देती है और अंत में शीर्षस्थ कालिकाएं मर जाती है। लौकी की सतह मोटी होकर फटने लगती है। प्याज, टमाटर, मूली शकरकंद और तरबूज आदि पर इसके प्रभाव देखे गए हैं।

मोलिब्डेनम

पौधों में इसके अभाव में पुरानी पत्तियों के अगले सिरे सूख जाते हैं तथा पत्तियां पतली होकर मुड़ जाती हैं। नई पत्तियां पतली होकर मर जाती हैं तथा आम तौर पर पीली पड़ जाती हैं। इसके अभाव में फूलगोभी में भी व्हिपेटल नामक बीमारी हो जाती है, जिसे पत्तियों का उचित विकास न होकर केवल मध्य सिरे का ही विकास होता है।

टमाटर के पौधों की नीचे की पत्तियों में मोल्टिंग में क्रॉसिंग तथा पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं। इस सूक्ष्म तत्व की कमी के लक्षण टमाटर, गोभी, पालक और चुकंदर आदि में देखे गए हैं।

उपचार: मोलिब्डेनम की कमी के निवारण के लिए 0.5 प्रतिशत सोडियम मोलिब्डेनम (500 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का घोल बनाकर पौधों की पत्तियों पर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए यदि छिड़काव संभव न हो तो 1.0 से 1.5 किलोग्राम सोडियम मोलिब्डेनम या अमोनियम मोलिब्डेनम का प्रयोग भूमि में करना चाहिए।

क्लोरीन

पौधों में क्लोरीन की कमी से पत्तियां जलकर गिर जाती हैं। टमाटर की गुणवत्ता गिर जाती है। चुकंदर, गाजर और गोभी आदि में शर्करा बढ़ोतरी हेतु यह अति आवश्यक तत्व है।
उपचार: इस तत्व की कमी की पूर्ति के लिए क्लोरीन युक्त उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है।


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