Monday, August 15, 2022
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सुखी जीवन क्या है

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विवेक रंजन श्रीवास्तव
जीवन जीना एक कला है। हम अपने जीवन को कैसे सजाते-संवारते हैं, कैसे अपने उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित करते हैं, हमारे काम करने का तरीका क्या है, हमारी सोच कैसी है, ये सभी बातें जीवन जीने की कला के अंग हैं। ये सभी बातें हमारे जीवन को कलात्मक रूप देकर उसे संवार सकती हैं और उन पर ध्यान न देने से वे उसे बिगाड़ भी सकती हैं।

हम सब सदैव सुख प्राप्ति का प्रयत्न करते रहते हैं। सभी चाहते हैं कि उन्हें सदा सुख ही मिले, कभी दु:खों का सामना न करना पड़े, हमारी समस्त अभिलाषाएं पूर्ण होती रहें परन्तु ऐसा होता नहीं। अपने आप को पूर्णत: सुखी कदाचित ही कोई अनुभव करता हो। जिनके पास पर्याप्त धन-साधन, श्रेय-सम्मान सब कुछ है, वे भी अपने दु:खों का रोना रोते देखे जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है? क्या कारण है कि मनुष्य चाहता तो सुख है किन्तु मिलता उसे दु:ख है। सुख-संतोष के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते हुए हमें अनेकानेक दु:खों एवं अभावों का सामना करना पड़ता है।

इन समस्त दु:खों एवं अभावों से मनुष्य किस प्रकार मुक्ति पा सकता है? प्राचीन ऋषियों-मनीषियों एवं भारतीय तत्वदर्शी महापुरुषों ने इसके लिए कई प्रकार के मार्गों का कथन किया है जो प्रत्यक्ष रूप से भले ही प्रतिकूल व पृथक प्रतीत होते हों परंतु सबका-अपना अपना सच्चा दृष्टिकोण है। एक मार्ग वह है जो आत्मस्वरूप के ज्ञान के साथ-साथ भौतिक जगत् के समस्त पदार्थों के प्रति आत्मबुद्धि का भाव रखते हुए पारलौकिक साधनों का उपदेश देता है।

दूसरा मार्ग वह है जो जीव मात्र को ईश्वर का अंश बतलाकर जीवन में सेवा व भक्तिभाव के समावेश से लाभान्वित होकर आत्मलाभ की बात बतलाता है। तीसरा मार्ग वह है जो सांसारिक पदार्थों एवं लौकिक घटनाक्रमों के प्रति सार्थकता पूर्ण दृष्टि रखते हुए, उनके प्रति आसक्ति न होने को श्रेयस्कर बताता है। अनेक तरह के मतानुयायियों ने अपने-अपने विचार से ईश्वर का स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रकार का बतलाया है जिसके कारण मनुष्य भ्रम में पड़ जाता है।

जीवन जीना एक कला है। जी हां, जीवन का सही अर्थ समझना, उसको सही अर्थों में जीना, जीवन में सार्थक काम करना ही जीवन जीने की कला है। जीने के लिए तो कीट पतंगे, पशु-पक्षी भी जीवन जीते हैं, किंतु क्या उनका जीवन सार्थक होता है? मनुष्य के जीवन में और अन्य प्राणियों के जीवन में यही अंतर है।

इसलिए कहा गया है कि जीवन जीना एक कला है। हम अपने जीवन को कैसे सजाते-संवारते हैं, कैसे अपने उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित करते हैं, हमारे काम करने का तरीका क्या है, हमारी सोच कैसी है, ये सभी बातें जीवन जीने की कला के अंग हैं। ये सभी बातें हमारे जीवन को कलात्मक रूप देकर उसे संवार सकती हैं और उन पर ध्यान न देने से वे उसे बिगाड़ भी सकती हैं।

जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण यदि स्पष्ट नहीं है तो हमने जीवन को जिया ही नहीं। आम व्यक्ति जीवन को सुख से जीना ही ‘जीवन जीना’ मानता है। अच्छी पढ़ाई के अवसर मिलें, अच्छी नौकरी मिले, सुंदर पत्नी हो, रहने को अच्छा मकान हो, सुख-सुविधाएं हों, बस और क्या चाहिए जीवन में? पर होता यह है कि सबको सब कुछ नहीं मिलता। चाहने से कभी कुछ नहीं मिलता।

कुछ पाने के लिए मेहनत और संघर्ष करना जरूरी होता हैं और लोग वही नहीं करना चाहते। बस पाना चाहते है-किसी शॉर्टकट से और जब नहीं मिलता तो जीवन को कोसते हैं-अरे क्या जिंदगी है? बस किसी तरह जी रहे हैं-जो पल गुजर जाए वही अच्छा है। ‘सच मानिये आम आदमी आपसे यही कहेगा क्योंकि उसने जीवन का अर्थ समझा ही नहीं।

बड़ी मुश्किल से ही कोई मिलेगा, जो यह कहे कि ‘मैं बड़े मजे से हूं। ईश्वर की कृपा है। जीवन में जो चाहता हूं-अपनी मेहनत से पा लेता हूं। संघर्षों से तो मैं घबराता ही नहीं हूं।’और ऐसे ही व्यक्ति जीवन में सफल होते हैं। किसी ने ठीक कहा है, ‘संघर्षशील व्यक्ति के लिए जीवन एक कभी न समाप्त होने वाले समारोह या उत्सव के समान है।’

मनुष्य जीवन कर्म करने और मोक्ष की तरफ कदम बढ़ाने के लिए है। कदम उत्साहवर्द्धक होने चाहिएं। अपने जीवन के प्रति रुचि होनी चाहिए। जीवन में कष्ट किसे नहीं भोगना पड़ता। आनंद तो इन कष्टों पर विजय पाने में है।

कोई कष्ट स्थायी नहीं होता। वह केवल डराता है। हमारी सहनशीलता और धैर्य की परीक्षा लेता है।
अच्छा जीवन, ज्ञान और भावनाओं तथा बुद्धि और सुख दोनों का सम्मिश्रण होता है। इसका अर्थ है कि जहां हमें अच्छा ज्ञान अर्जित करना चाहिए, वहीं हमारे विचार और भावनाएं भी शुद्ध और निर्मल हों। तब हमारी बुद्धि भी हमारा साथ देगी और हमें सच्चा सुख मिलेगा।


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