जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में शनिवार को एक नया अध्याय जुड़ा, जब हैदराबाद की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया। इस ऐतिहासिक मिशन को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया है।
विक्रम-1 अपने साथ भारतीय और विदेशी ग्राहकों के तकनीकी प्रदर्शन पेलोड, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से हस्तलिखित ‘वंदे मातरम’ संदेश वाला पोस्टकार्ड, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अंतरिक्ष यात्रियों के संदेश तथा एक सूक्ष्म कलाकृति पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) तक ले गया।
इस उपलब्धि के पीछे स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदना की वर्षों की मेहनत और दूरदृष्टि है। कभी गणित से डरने वाला यह छात्र आज भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग को नई दिशा देने वाले उद्यमियों में शामिल है।
कौन हैं पवन कुमार चंदना?
पवन कुमार चंदना का जन्म वर्ष 1991 में तेलंगाना के हैदराबाद में हुआ था। वह दुनिया के उन चुनिंदा युवा उद्यमियों में शामिल हैं, जिन्होंने एक ऐसी निजी कंपनी खड़ी की, जो ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करने का प्रयास कर रही है।
चंदना की कहानी संघर्ष और बदलाव की मिसाल है। जिस विषय से उन्हें कभी डर लगता था, वही गणित आगे चलकर उनके अंतरिक्ष करियर की सबसे बड़ी ताकत बना।
कभी गणित में आए थे सिर्फ 51 अंक
स्कूल के दिनों में चंदना का गणित कमजोर था। एक परीक्षा में उन्हें इस विषय में केवल 51 अंक मिले थे। हालांकि उनके पिता ने उनका हौसला बनाए रखा और उन्हें आईआईटी प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए प्रेरित किया।
कड़ी मेहनत के बाद गणित का डर धीरे-धीरे जुनून में बदल गया। उन्होंने पहली ही कोशिश में आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास की और वर्ष 2007 में आईआईटी खड़गपुर में दाखिला लिया। यहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक-एमटेक की डुअल डिग्री पूरी की।
जहां उनके कई साथी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में करियर बनाने की तैयारी कर रहे थे, वहीं चंदना का ध्यान रॉकेट और अंतरिक्ष तकनीक पर केंद्रित था।
इसरो से शुरू हुआ अंतरिक्ष का सफर
वर्ष 2012 में पढ़ाई पूरी करने के बाद पवन चंदना ने इसरो में नौकरी शुरू की। उन्होंने तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में करीब छह वर्षों तक काम किया।
इस दौरान उन्होंने भारत के प्रमुख प्रक्षेपण यानों GSLV Mk-II और GSLV Mk-III के लिए S-200 सॉलिड बूस्टर जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम किया। बाद में वह लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV) के उप-परियोजना प्रबंधक भी बने।
वर्ष 2016 में उन्हें इसरो में आंतरिक नवाचार पुरस्कार भी मिला। हालांकि उनके मन में भारत में निजी अंतरिक्ष कंपनी शुरू करने का सपना लगातार बना रहा।
इसरो की नौकरी छोड़ शुरू की स्काईरूट
वर्ष 2018 में पवन चंदना ने इसरो की सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया। उस समय भारत में निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में काम करने के अवसर सीमित थे।
उन्होंने इसरो के अपने सहयोगी नागा भरत डाका के साथ मिलकर जून 2018 में हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की।
शुरुआत आसान नहीं थी। चंदना के पास न तो बड़ा व्यावसायिक अनुभव था और न ही निवेशकों का नेटवर्क। उन्होंने लिंक्डइन के जरिए आईआईटी खड़गपुर के पूर्व सहपाठी और उद्यमी मुकेश बंसल से संपर्क किया, जिन्होंने कंपनी में शुरुआती निवेश किया।
स्काईरूट की बड़ी उपलब्धियां
जुलाई 2020 में स्काईरूट ने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सीवी रमन के नाम पर अपने रॉकेट इंजन रमन-1 का परीक्षण किया और ऐसा करने वाली पहली निजी भारतीय कंपनी बनी।
जब वर्ष 2021 में भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला, तो स्काईरूट तेजी से आगे बढ़ी। कंपनी ने इसरो के साथ समझौता किया और बड़ी फंडिंग जुटाई।
18 नवंबर 2022 को स्काईरूट ने विक्रम-एस लॉन्च किया, जो भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित सबऑर्बिटल रॉकेट था। इसने ‘मिशन प्रारंभ’ के तहत करीब 90 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचकर इतिहास बनाया।
इसके बाद कंपनी ने अपनी निर्माण क्षमता का विस्तार किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्काईरूट की नई विनिर्माण सुविधा का उद्घाटन किया। कंपनी ने धीरे-धीरे भारत की सबसे बड़ी निजी रॉकेट निर्माण इकाइयों में अपनी जगह बनाई।
कितनी है पवन चंदना की संपत्ति?
पवन कुमार चंदना ने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया है और उनकी निजी नेटवर्थ का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
हालांकि, स्काईरूट एयरोस्पेस का मूल्यांकन कंपनी की सफलता को दर्शाता है। कंपनी ने बड़े निवेश दौरों के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की है और निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रमुख भारतीय कंपनियों में शामिल हो चुकी है।

